हमे हमेशा सत्य बोलना चाहिए । हम सत्य कब बोलते है जानिये

       आपने ज्यादातर लोगों का यह कहते सुना होगा कि सत्य कौन बोलता है और सत्य बोलना कठिन है लेकिन मेरा मानना यह है कि सत्य बोलना घण्टा मुश्किल नही होता हम सब सत्य बोलते है लेकिन जब हमारे मन मे किसी चीज के प्रति लालच आ जाता है तो हम सत्य नही बोलते, हम उस से बचने लग जाते है ये सब बेकार की बाते है कि लोग सुनना नही चाहते।सत्य कड़वा होता है ये होता है वो होता है अगर ध्यान से देखे तो हम बस अपने फायदे के लिए सत्य नही बोलते, मैं हर उस मामले मे सत्य बोल दूंगा जहाँ मेरा कोई नुकसान या फायदा नही है ,लेकिन जिस मामले मे मेरा फायदा और नुकसान है मैं वहाँ कभी सत्य नही बोलूंगा। जैसे बहुत बार हम लोग केवल अपनी छवि को अच्छा बनाए रखने के लिए सत्य नही बोलते, हमे डर रहता है कि कही हमारा सत्य सुन कर हमारी छवि हमारे पसन्दीदा लोगो के बीच खराब ना हो जाए। हम कह देते है कही उसको बुरा ना लगे ,लेकिन असल मे हमे डर इस बात का होता है कि कहि वो आदमी हमे छोड़ कर ना चला जाए और इसलिए हम अपनी छवि हमेशा दूसरों के लिए उनके अनुसार बनाए रखते है और अंदर ही अंदर दुःखी रहते है ।

      आप सत्य कब बोलते है आइये इस उदाहरण से समझिये –
      जैसे आप देखें की कोई एक्सीडेंट् आपके सामने हुआ और उस दुर्घटना में सम्मलित दोनों पक्षों को न आप जानते हैं और न ही किसी प्रकार का कोई संबंध है तब उस स्थिति में आप सत्य के पक्ष में होंगे ।

      पर यदि उन दो पक्षों में से किसी एक को आप जानते मानते या ईर्ष्या करते हैं या किसी पक्ष से आपको डर लगता है तब आप सत्य के पक्ष में नहीं खड़े हो पाएँगे ।

      अर्थात् सत्य के पक्ष में खड़ा न होने का कारण आपकी बुद्धि नहीं बल्कि उसपर पड़ रही वासनाएं हैं और वे वासनाएं आपका स्वत: स्वभाव नहीं है । राग द्वेष को शिथिल करिए और आप हर समय सत्य के पक्ष में खड़े दिखेंगे ।

      आपकी बुद्धि के कारण नहीं बल्कि राग द्वेष के प्रभाव के कारण आप सत्य के पक्ष में नहीं टिक पाते । राग द्वेष को शिथिल करिए और आप कुछ दिन में देखेंगे की सत्य बोलना आपका अपना स्वभाव बन चुका है ।
      आइये हम आपको सत्य बोलने मे कितनी ताकत है एक दृष्टान्त के माध्यम से समझाते है।


      एक बार सन्त नामदेव जी किसी स्थान से गुजर रहे थे कि सामने से एक चोर आता दिखाई दिया जो चोरी करने के लिए कही जा रहा था। सन्त जी को देखते ही चोर घबराया और भयभीत होकर एक तरफ खड़ा हो गया परन्तु नामदेव जी ने उस चोर को देख ही लिया। वे उसके पास जाकर कहने लगे – ‘भाई मेरे! यह धन्धा छोड़ क्यो नही देते ? ऐसा कोई नेक काम करो जिससे तुम्हे डरना न पड़े, किसी को देख दिल मे भय उत्पन्न न हो।’
      तब चोर ने कहा – ‘महाराज! यदि मै यह धन्धा छोड़ दूँ तो खाऊँ कैसे और बाल-बच्चो का पालन-पोषण कैसे करूँ? पढ़ा-लिखा तो मै हूँ नही, कोई कला-कौशल भी नही जानता, धन भी मेरे पास नही जिससे व्यापार इत्यादि कर सकूँ। अतः अब सब और से निराश व विवश होकर ही मुझे ऐसा कार्य करना पड़ता है।’
      उसकी यह बात सुन सन्त नामदेव जी पुनः कहने लगे – ‘अच्छा भाई! तुम यह धन्धा भले ही जारी रखो परन्तु साथ ही हमारी भी एक बात मान लो।’ चोर ने पूछा – ‘कौन सी बात?’
      सन्त नामदेव जी ने कहा – ‘आज से तुम सत्य बोलने का नियम बना लो, प्रण कर लो कि आज के बाद झूठ कभी नही बोलूँगा।’ सन्त नामदेव जी की यह बात सुन कर चोर पहले तो टाल-मटोल करने लगा। अन्त में उसने स्वीकृति देते हुए हां कर दी। नामदेव जी ने उन्हे आशीर्वाद दिया – ‘प्रभु तुम्हे सत्य बोलने मे सहायता दे।’ इतना कहकर वह आगे चल दिए।
      इधर चोर ने भी अपने धन्धे के लिए आगामी रास्ता नापा। कुछ ही दूर जाने पर शहर के राजा साहब जो कि भेष बदल कर नगर का भ्रमण कर रहे थे चोर से मिले। उन्होने चोर से राम-राम कहते हुए पूछा – भाई तुम कौन हो और इस समय कहाँ जा रहे हो?
      चोर ने डरते हुए धीरे से कहा – ‘मै चोर हूँ और चोरी करने जा रहा हूँ।’ राजा साहब यह विलक्षण और स्पष्ट सा उत्तर पाकर स्तब्ध से रह गए कि यह कैसे हो सकता है कि एक चोर स्वयं इस बात को स्वीकार करे कि वह चोर है और साथ ही अपने चोरी करने के मन्तव्य को भी स्पष्ट वर्णित करे कि मै चोरी करने जा रहा हूँ। लेकिन उधर चोर भी वचनबद्ध था क्योकि उसने सन्त जी को सत्य बोलने का वचन दे रखा था।  
      राजा साहब ने परीक्षा लेने के विचार से सोचा कि देखते है वास्तव मे यह चोर है या कोई और। दिल मे यह बात सोचकर राजा साहब ने चोर से कहा – भाई! अच्छा हुआ जो तुम मिल गये – एक-एक दो ग्यारह होते है। तुम भी चोर हो मै भी चोर हूँ। आओ, आज हम मिलकर देश सम्राट के महल मे जाकर चोरी करते है। मै महल के गुप्त द्वार का रास्ता जानता हूँ। तुम अन्दर जाना – मै बाहर पहरा दूँगा।  
      चोर ने कहा – लेकिन मुझे यह कैसे ज्ञात होगा कि महल के कौन से स्थान मे अथवा कौन से सन्दूक मे खजाना धरा होगा?  
      इस पर राजा साहब कहने लगे – ‘मै सब कुछ तुम्हे बताता हूँ, तुम केवल अन्दर जाने के लिए तत्पर हो जाओ।’ चोर ने कुछ सोच कर स्वीकृति दे दी। तब राजा साहब चोर को लेकर राजमहल को और चल पड़े। महल के निकट पहुँचने पर राजा साहब ने गुप्त द्वार का मार्ग बताते हुए कहा – ‘ये सीढ़िया चढ़कर बाये हाथ के कमरे के साथ वाले कमरे मे लोहे का एक बड़ा सन्दूक है। उसके अन्दर एक और दूसरा छोटा सन्दूक है। जिसमे किमती हीरे है। तुम उस सन्दूक के ताले तोड़ कर उसमे से हीरे ले आना फिर भी आधा-आधा बाँट लेगे।
      चोर उनके कहने पर गुप्त द्वार के अन्दर प्रविष्ट हो गया और ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उसे छोटे सन्दूक मे से तीन चमकते हुए हीरे मिल गये। पहले चोर ने तीनों हीरो को उठा लिया। जब चलने लगा तब सोचा कि एक हीरा तो उस चोर को दूँगा तथा दूसरा मै लूँगा मगर इस तीसरे हीरे का आधा-आधा भाग कैसे होगा? यदि एक हीरा मै अपने पास छिपा कर रखता हूँ तो मुझे असत्य बोलना पड़ेगा कि सन्दूक मे दो हीरे थे। ‘झूठ मे कभी बोलूँगा नही’ ऐसा वचन तो मै महात्मा जी को दे चुका हूँ। यह विचार आते ही उसने तीसरा हीरा तत्क्षण उसी सन्दूक मे पूर्ववत् रख दिया और दो हीरे लेकर बाहर आ गया। 
      महल के बाहर आने पर उसने दूसरे चोर (राजा साहब) को दो हीरे लाने की बात बताते हुए एक हीरा उनके हाथ पर धर दिया तथा दूसरे को अपनी जेब में रख कर चलता बना। चोर के चले जाने पर राजा साहब ने सन्दूक खोल कर देखा तो वहाँ एक हीरा ज्यो का त्यों पड़ा पाया। सोचने लगे कि यह अजीब चोर है जो कि चोरी भी करता है और सत्य भी बोलता है – कितना ईमानदार आदमी है। 
      दूसरे दिन राजा साहब ने मुख्यमंत्री को बुलाकर महल मे चोरी होने की सूचना दी और कहा – ‘मन्त्री जी! रात को कोई चोर गुप्त द्वार से आकर सन्दूक मे से हीरे चुरा ले गया है। अतएव उसे पकड़ने का शीघ्र प्रबन्ध करे।
      राजाज्ञा पाते ही मंत्री ने थानेदार को चोर पकड़ने का आदेश दिया। आखिर पुलिस उस चोर को गिरफ्तार कर राजदरबार मे ले आयी। राजा साहब चोर को देखकर मन ही मन अति प्रसन्न हुए। चोर से पूछने लगे ‘कल रात महल मे कोई गुप्त द्वार से आकर हीरे चुराकर ले गया है, तुम्हे इस विषय मे कुछ ज्ञात है?’ 
      चोर को उस सन्त नामदेव जी को दिया गया अपने सत्य बोलने का वचन स्मरण हो आया। तब उस ने हाथ जोड़ कर कहा – ‘हुजूर! चोरी तो मैने ही की है। जो दण्ड आप दे मै हर प्रकार की सजा भुगतने को तैयार हूँ परन्तु मेरे साथ एक अन्य साथी भी था। उसने ही मुझे गुप्त द्वार से अन्दर जाने का मार्ग बालाया था।’
      राजा साहब ने पूछा – ‘वह कौन था?’ चोर ने उत्तर दिया – ‘महाराज! मै उसको नही जानता। कारण, कल रात ही प्रथम बार उसके साथ मेरी भेंट हुई थी और कल ही वह मेरा साथी बना।’ राजा साहब ने कहा – ठीक है। तदुपरान्त राजा साहब ने प्रधानमंत्री को आदेश दिया – मन्त्री जी वह संदूक ले आओ।
      आज्ञा पाकर मंत्री सन्दूक लेने गया। भीतर जाकर सन्दूक खोल कर देखा कि उसमे एक हीरा पड़ा है। जिसे देखकर उसके मन मे लालच आ गया और वह ईमान की धूरी पर से विचलित हो गया। सोचने लगा – चोरी तो रात को हुई है और चोर ने अपनी चोरी को स्वीकार भी कर लिया है फिर क्यो न मै यह हीरा अपने पास ही रख लूँ। यह कुविचार आते ही मंत्री ने सन्दूक मे से हीरा निकाल कर अपनी जेब मे रख लिया और खाली सन्दूक लाकर राजा साहब के समक्ष रख दिया। खाली सन्दूक देखकर राजा साहब प्रधानमंत्री की इस कुचाल को तुरंत भांप गये और चोर से कहा – ‘कल रात का सारा वृत्तान्त सुनाओ।’
      आज्ञा पाकर चोर ने रात वाली सम्पूर्ण घटना अक्षरशः सत्य-सत्य इस प्रकार सुनाई – ‘महाराज! गुप्त द्वार मे से महल मे गया। सन्दूक मे तीन हीरो मे से दो हीरे उठा ले आया। और एक हीरा इस विचार से वही छोड़ आया कि तीसरे हीरे के दो हिस्से किस प्रकार हो सकेगे। कही एक हीरे के लिए आपस मे झग़डा न हो जाए। अतएव, मै दो हीरे ले आया।’ राजा साहब ने चोर की बात काटते हुए प्रश्न किया – ‘कहाँ है वे दो हीरे?’
     चोर ने कहा – ‘महाराज! एक हीरा जो मेरे हिस्से मे आया (जेब से निकालकर) वह यह है और दूसरा हीरा मेरे साथी के पास है जिसे मै भलीभाँति नही जानता।’
      इतने मे ही राजा साहब ने दूसरा हीरा अपनी जेब से निकालकर अन्य राज दरबारियों को दिखाते हुए कहा – ‘कल रात को इसका दूसरा साथी मै ही था जो भेष बदल कर नगर का परिभ्रमण कर रहा था।’ फिर मुंख्यमंत्री की और उन्मुख होकर कहा – ‘तीसरा हीरा प्रधानमंत्री जी! अब तुम निकालो।’
      ऐसा सुनते ही प्रधानमंत्री के चेहरे का रंग फीका पड़ गया और कांपते हुए तीसरा हीरा अपनी जेब मे से निकाला।
      तदुपरान्त राजा साहब ने प्रसन्न हो चोर से कहा – मुझे तुम जैसे सत्यवादी और ईमानदार व्यक्ति की ही आवश्यकता है। आज से तुम मेरे प्रधानमंत्री हुए।
      तात्पर्य यह है कि संत नामदेव जी एक बात मानने से उसके जीवन मे कितना बड़ा परिवर्तन आ गया वो तो आप पढ़ ही चुके है। वह एक बात क्या थी? केवल सत्य बोलना। इसी सत्य बोलने के कारण वह एक गरीब चोर से देश सम्राट की प्रसन्नता को पा गया और उसको यश, किर्ति, मान-सम्मान, धन-दौलत स्वयंमेव प्राप्त हो गये। उसको देश का प्रधानमंत्री बना दिया गया और स्वयं राजा हर कार्य मे उसकी सलाह लेने लगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published.