हनुमान जन्म कथा

हनुमान का जन्म


       जब अंजना अपने पुत्र के लिए भगवान शिव से प्रार्थना कर रही थी, तो शिव ने प्रसन्न होकर अंजना माता को पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया । तथा भगवान शिव ने सोचा कि पृथ्वी पर श्री विष्णु भगवान जी अवतार लेने वाले है । तो उन्होने सोचा की क्यो न मै भी भगवान विष्णु का सेवक बनकर उनके भार को कम कर सकूँ । इसी विचार से उन्होंने भी अवतार लेने की सोची । तथा उन्होने वायु देव को बुलाया और कहाँ हमारा अंश लेकर माता अंजना तक पहुँचाओ । उधर राजा दशरथ संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहे थे । उन्हें अग्नि के देवता ने उनकी तीन पत्नियों के लिए पवित्र हलवा का कटोरा दिया । वायु देव के आदेश से, एक बाज ने कुछ हलवा छीन लिया और वहां गिरा दिया जहाँ अंजना ध्यान कर रही थी, और अंजना ने भगवान का प्रसाद समझ कर उसे खा लिया और इस तरह भगवान शिव के 11 वें रूद्रावतार हनुमान का जन्म चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्र नक्षत्र व मेष लग्न के योग मे हुआ । तथा भगवान शिव ने वायु देवता को भी पिता बनने का सम्मान प्रदान किया । तथा तभी तो हनुमान को भगवान राम का भाई भी कहाँ जाता है ।

हनुमान नाम कैसे पड़ा

      जब हनुमान का जन्म हुआ हो । तो इनका नाम मारूति रखा गया । तथा यह बचपन मे बहुत नट-खट थे । जब यह छोटे थे तो यह अपने आँगन में अक्सर सूर्य उदय के समय सूर्य की लाल-लाल लालिमा को देखा करते थे । तथा यह उसे फल समझा कर खाने के बारे मे सोचते थे । एक दिन की बात है कि माता अंजना अपने पुत्र मारूति को गोद मे लेकर रो रही थी । तथा उनकी आँखो में से आँसू टपक कर मारूति के ऊपर गिरे । मारूति की आँखे खुली तो देखा कि माता दुःखी है । मारूति ने दुःखी होने का कारण पूछा, तो माता ने नही बताया, परन्तु मारूति के बार-बार पूछने पर माता ने बताया कि कल सूर्य उदय होते ही मेरी मृत्यु हो जायेगी ।
      मारूति ने कहा, ‘माता यह आप क्या कह रही है ।’ अंजना ने कह, ‘पुत्र यह सत्य है । श्राप के कारण कल मेरी मृत्यु हो जायेगी । मारूति ने कहा, माता कैसा श्राप ? माता ने कहा – तो सुनो ।
      मै देवलोक में एक अति सुन्दर पुजिंकस्थली नाम की अपसरा थी । देवलोक मे मेरी जैसी सुन्दरी दूसरी कोई न थी । एक बार दुर्वासा ऋषि देवराज इन्द्र की सभा मे उपस्थित हुए । मै ऋषि दुर्वासा और सभा मे बैठे लोगों का ध्यान आकृषित करने के लिए बार-बार अन्दर-बाहर आ जा कर नृत्य करने लगी । इससे सभा मे बैठे लोगों का ध्यान भंग हो गया । और वे मेरी तरफ आकर्षित होने लगे । इससे दुर्वासा ऋषि को बहुत क्रोध आया, और बोले – ‘पुजिंकस्थली जिस रूप पे तुझे इतना घमण्ड है । मै तुझे श्राप देता हूँ, तू वानरी हो जा। फिर मैने दुर्वासा ऋषि से बहुत क्षमा माँगी । तो उन्होने कहा’ मै अपने श्राप को वापिस नही ले सकता । परन्तु मै तुम्हे इच्छानुसार रूप धारण करने का वर देता हूँ । और जब तुम पृथ्वी पर जाकर एक महाबली पराक्रमी वानर को जन्म दोगी तो उसके कुछ वर्षो बाद ही तुम्हे नक्षरतः के दिन मुक्ति मिल जायेगी । और वह समय आ चुका है । इसलिए मै इतनी दुःखी हूँ ।
      तब मारूति ने कहा, ‘बस इतनी सी बात के लिए परेशान हो ।’ आपकी मृत्यु तो तभी होगी न जब कल सूर्य उदय होगा । मै तो कब से इसे खाने की सोच रहा था ? अब मै कल सूर्य उदय होने ही नही दूँगा । अर्थात् मै इसे सूर्य उदय होने से पहले ही चट कर जाऊँगा । इतना कहते ही उन्होने आसमान मे उड़ान भर दी ।
      जब वे सूर्य के करीब पहुँचे तो उनका दो असुरो ने रास्ता रोका, और कहा, ‘कहाँ जाते हो ?’ मारुति ने कहा – इस फल को खाने । वे बोले मूर्ख बालक ! इस पर हमारा अधिकार है । फिर क्या था । मारूति ने उन दोनो की पिटाई करनी आरम्भ कर दी । किसी तरह से दोनो जान बचकर भागे । और सीधे इन्द्रलोक में पहुँचे और उन्हे सारा वृत्तान्त बताया । इन्द्रदेव तुरन्त वहाँ पहुँचे और देखा की वह सूर्य देव को मुँह मे लेने लगा और चारो तरफ अंधेरा छाने लगा । इन्द्र ने तुरन्त अपने हथियार वज्र से उनकी ठोड़ी पर प्रहार कर दिया जिससे सूर्य उनके मुँह से बाहर निकल गये । और वह बेहोश होकर पृथ्वी पर गिरने लगे । तभी पवन देवता ने उन्हे पकड़ लिया । और क्रोध मे उन्हें लेकर एक गुफा मे गए और वहाँ जाकर उन्होंने अपनी गति रोक दी। जिससे पूरी पृथ्वी पर सब कुछ नष्ट होने लगा । यह सब देख कर सभी देवता परेशान होकर ब्रह्मदेव की शरण मे गये और उन्हें सारा वृत्तान्त सुनाया । ब्रह्मदेव तुरन्त सभी देवताओ को लेकर पवन देव के पास पहुँचे । पवन देव ने बताया कि इन्द्र ने मेरे छोटे से पुत्र पर वज्र से प्रहार किया है । तभी ब्रह्मा ने मारूति को होश मे लाया । और उसे वरदान दिया कि उस पर कोई भी अस्त्र कुछ भी हानि नही पहुँचा पायेगा । तथा वहाँ पर जितने भी देवता थे सभी ने उन्हे वरदान दिया और इस तरह से वह अपार शक्ति के मालिक बन गये । इस तरह से उन्हे कई नामों से पुकारा जाता है । जैसे – हनुमान, महावीर, बंजरबली, पवनपुत्र, संकटमोचन आदि ।
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