हदय को पवित्र कैसे करे ?

      प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी भी श्रेणी का हो। उसकी यह इच्छा तो होती ही है कि भगवान मुझे दर्शन दे तथा मेरे हदय मे विराजे। लेकिन अपने हदय मे अपने इष्टदेव, भगवान को विराजमान करने से पहले क्या कभी हमने अपने दिल मे झांका है कि हमारा दिल किस तरह का है? इसी पर आज मै विचार प्रकट करूँगा।
      साधारणतयः जब भी कोई मनुष्य किसी रिश्तेदार, सम्बन्धी अथवा मित्र को अपने घर मे आने का निमन्त्रण देता है तब वह उस अतिथि को बिठाने के लिए अपने मकान को अच्छी तरह झाड़-पोछ़ कर घर का एक एक कोना, अन्दर-बाहर, आगे-पीछे, साफ-सुथरा करता है। तब उस अतिथि को बिठाने के लिए विशेष स्थान निर्धारित कर स्वच्छ अथवा नया बिस्तर बिछाता है। धूप दीप से घर को सुगन्धित करता है। अपनी तरफ से कोई कसर नही छोड़ता। ऐसे घर मे आकर अतिथि भी उसके आदर सत्कार से प्रसन्न होता है।
      अब देखना इस बात को है कि जब एक साधारण मनुष्य के आदर-सत्कार के लिए हम अपने मकान को इस तौर पर चमकाते है। मगर जब हम अपने हदय मन्दिर मे अपने इष्टदेव, मालिक को बुलाते है, तो क्या हमने कभी इस बात पर भी ध्यान दिया है कि हमारा दिल जिस मे हम उन्हे बिठाना चाहते है क्या उनके बैठने योग्य है ? जरा हमे अपने दिल मे यह झाँकना चाहिए कि हमारे दिल की क्या अवस्था है ? 
      यहाँ तो विषय वासनाओ रूपी कूड़े-कर्कट के ढ़ेर पड़े है, मोह-ममता के जाले मकान की छतों पर बने पड़े है, क्रोध की अग्नि ने हदय की सब दीवारों को काला कर रखा है, निन्दा, ईष्या, द्वेष की सडांध से दिमाग फटने लगता है, लोभ-लालच के चूहो व छिपकलियो ने जगह-जगह पर अपने घर बनाए हुए है – ऐसी तो हमारे दिल की अवस्था है।
      और भी सुनिये – काम, क्रोध, लोभ, मोह बिस्तर बिछा कर हमारे दिल मे निश्चिन्तता से नींद कर रहे है और अहंकार ने तो कमाल ही कर दिया है, क्या ? कि दिल के दरवाजे पर ‘अन्दर आना मना है’ का बोर्ड लगा रखा है। 
      ऐसी स्थिति मे अगर हम यह कहे कि ‘मेरे मन मन्दिर मे मालिक आइये। यह बात कहाँ उचित होगी। यदि ऐसी अवस्था मे इष्टदेव मालिक आ भी जाए तो हमारे दिल के फाटक पर अहंकार द्वारा लगाए गए बोर्ड को देखकर तत्काल फौरन वापस चले जायेगें तथा हमारी यह गलती हम पर प्रकट नही करेगे।

      अगर हम उनको सच्चे दिल से आमन्त्रित करना चाहते है तो हमारे लिए सर्वप्रथम यह जरूरी है कि सबसे पहले अहंकार के द्वारा लगाए गए बोर्ड़ को हटाकर ‘नम्रता व दिनता’ के स्वागत रूपी बोर्ड को मन मन्दिर के फाटक पर लगाना चाहिए फिर अपने हदय को सदगुरू मालिक की निष्काम सेवा से खूब साफ सुथरा करके चमकावे। काम, क्रोध, लोभ, मोह का बोरी-बिस्तर गोल करके उन्हें दिल से दूर भगा देवे और सतगुरू के बताए हुए नाम व शब्द का प्रतिदिन अभ्यास करे ताकि जन्म जन्मान्तरो की विषय-वासनाओ की बदबू जो हमारे दिल में भरी पड़ी है। वह दूर होकर नाम की सुगन्ध फैल सके, फिर सदगुरू मालिक को बैठाने के लिए दिल मे श्रद्धा व प्रेम का आसन बिछावे। जब वह मन मन्दिर में आवे तो सच्चाई रूपी हार उनके गले मे डाला जाए और उनकी पवित्र आज्ञा को मानने का तिलक करके मस्तक पर लगाने के लिए तैयार करे तथा उनके किए गए असीम उपकारों का स्मरण कर अन्तःकरण मे गदगद हो जावे। तदुपरान्त अनन्य प्रेम-भक्ति रूपी खीर बना कर श्री भोग के लिए तैयार करे, फिर अपने मालिक को अपने मन-मन्दिर मे आने की प्रार्थना करे।
      मगर हम अपने दिल की हालत को न देखकर मात्र शरीर को ही तेल साबुन से नहलाते और उजले वस्त्र धारण कर लेते है लेकिन अपने मन की मलिनता को नही देखते।
      इसी को स्पष्ट करने के लिए हम यहाँ एक दृष्टान्त प्रस्तुत कर रहे है –


      एक बार की बात है कि कोई एक महात्मा जी विचरते-विचरते गांव मे किसी के घर भिक्षा मांगने के लिए गए। जब उन्होंने ‘नारायण हरि’ की अलख जगाई तो आवाज सुनकर घर की मालकिन भिक्षा देने के लिए बाहर आई। महात्मा जी को देखकर सादर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोली – ‘महाराज! कृपा कर आप मुझे मानसिक शान्ति प्रदान कीजिए।’
      प्रत्युत्तर मे महात्मा जी ने कहा – ‘देवी! आज नही, कल शान्ति का उपदेश करेगे।’
      इस पर उस स्त्री ने तुनक कर कहा, ‘बहुत अच्छा महाराज! तो फिर आप भिक्षा भी कल आकर ले लेना।’ महात्मा जी ‘अच्छी बात’ कह कर भिक्षार्थ हेतु दूसरी और चले गये।
      अगले दिन जब महात्मा जी अपने आश्रम से मधूकरी (भिक्षा) के लिए चलने लगे तो उन्होने अपने कमण्डल मे थोड़ा सा गोबर डाल लिया और उसी देवी के द्वार पर ‘नारायण हरि’ की अलख जगाई। इधर आज इस देवी ने भी मानसिक शान्ति प्राप्त करने की खुशी मे महात्मा जी के लिए बहुत अच्छी खीर तैयार की, जिसमे उसने बादाम, पिसते भी डाले थे। जब महात्मा जी ने ‘नारायण हरि’ कहकर आवाज लगाई तो वह देवी खीर का कटोरा लेकर बाहर आई और कहने लगी – ‘महात्मा जी! भिक्षा लीजिए।’
      महात्मा जी ने अपना कमण्डल आगे कर दिया। जब देवी उसमें खीर डालने लगी तब उसकी दृष्टि कमण्डल के भीतर जा पड़ी क्या देखा कि कमण्डल तो गोबर से सना हुआ है, रूक कर बोली – ‘महाराज! ये कमण्डल तो गन्दा है।’
      साधु ने कहा – हाँ, गन्दा तो है – इसमे गोबर पड़ा है लेकिन देवी करना क्या है। तुम इसमे ही खीर डाल दो।

      देवी ने प्रत्युत्तर मे कहा – न महाराज! इसमे डालने से तो खीर खराब हो जायेगी। मुझे दीजिए, मै यह कमण्डल साफ कर लाती हूँ।
      महात्मा जी ने (आश्चर्यमयी मुद्रा बना कर) पूछा – ‘तो क्या तुम इसमे खीर तब डालोगी जब यह बर्तन साफ हो जायेगा?’
      देवी ने हाँ कहकर महात्मा जी के हाथ से कमण्डल ले लिया और उसे अच्छी तरह साफ करके उसमे खीर डाल दी।
      उचित अवसर देखकर महात्मा जी बोले – ‘देवी! बस, हमारा यही उपदेश है कि आप पहले अपने मन का मलिन बर्तन साफ किजिये तभी सच्ची शान्ति प्राप्त हो सकेगी।’
      यह सुनकर वह बड़ी हैरान हुई – क्योकि अभी तक महात्मा जी ने स्पष्ट रूप से कोई उपदेश न दिया था। अतः उसने पुनः पूछा – महाराज! आपने मुझे कौन सा उपदेश दिया है?
      तब महात्मा जी बोले – देवि! जब तक मनुष्य के मन मे वासनाओ का कूड़ा-कर्कट और अशुद्ध विचारो का गोबर भरा पड़ा है तब तक उसमे उपदेश का अमृत रस कैसे डाला जा सकता है ?
      जिस प्रकार तुमने हमारे कमण्डल मे से गोबर को पानी से निकाल फैका है तथा उसमे अमृत रुपी खीर भर डाली है। ठीक इसी प्रकार तुम्हे अपने मन मे से कूड़ा-कर्कट तथा विषय वासनाओ से भरा गोबर नाम रूपी अमृत से निकाल फैकना है। तभी इसमे ईश्वर का पवित्र नाम बस सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.