स्वतंत्रता संग्राम की वीरागंनाएँ

रानी लक्ष्मीबाई (जन्म सन् 1835, मृत्यु सन् 1858)
      “भारतीय इतिहास मे ऐसी अनेक वीर महिलाएँ हुई है, जिन्होने बहादुरी तथा साहस के साथ युद्ध भूमि मे शत्रु से लोहा लिया। इसमे झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। रानी वीरता, साहस, दयालुता, अद्वितिय सौन्दर्य का अनुपम संगम थी। दूंढता, आत्मविश्वास व देशभक्ति उनके हथियार थे। जिससे अंग्रेजो को मात खानी पड़ी।”

      लक्ष्मीबाई को बचपन में सब प्यार से मनु बुलाते थे। मनु की आयु चार-पाँच वर्ष की थी उनकी माँ का देहान्त हो गया। मनु के पिता पुणे के पेशवा बाजीराव के दरबार मे थे। मनु की देख-भाल के लिए उनके पिता उन्हे अपने साथ पेशवा बाजीराव के दरबार मे ले जाते थे। अतः मनु का बचपन पेशवा बाजीराव के पुत्रो के साथ बीता। मनु उन्ही के साथ पढती थी। पेशवा बाजीराव के बच्चो को अस्त्र-शस्त्र चलाने की शिक्षा दी जाती थी। उन बच्चो को देखकर मनु की भी शस्त्र विद्या मे रूचि उत्पन्न हुई। मनु ने बहुत लगन से तीर-तलवार चलाना, बन्दूक चलाना और घुड़सवारी करना सीखा। घुड़सवारी, तीर-तलवार चलाना मनु के प्रिय खेल थे। वे इसमे इतने निपुण हो गई की लोग इस नन्ही बालक को देखकर आश्चर्य करते थे। वे स्वभाव से बहुत चंचल थी इसी कारण लोग प्यार से उन्हें ‘छबीली’ भी कहते थे। मनु का साहस और कोशल देखकर बीजाराव के पुत्र राना घोडू पतं और तात्या टोपे भी आश्चर्य चकित रह जाते। मनु का विवाह झाँसी के महाराजा गंगाधर राव के साथ हुआ। विवाह के बाद उन्हें नाम दिया गया – रानी लक्ष्मीबाई। रानी लक्ष्मीबाई के किले के अन्दर ही व्यायामशाला बनवायी और शस्त्र चलाने तथा घोडे की सवारी का अभ्यास करने की व्यवस्था की। घोडो की पहचान मे वे बहुत निपुण मानी जाती थी।
      एक बार रानी के पास एक सौदागर घोडे बेचने आया। उन घोडो मे दो घोडे एक जैसे दिखते थे। रानी ने उनमे से एक घोडे का दाम एक हजार रूपये तथा दूसरे का दाम पचास रूपये लगाया। सौदागर ने कहा – “महारानी दोनो घोडे एक जैसे है फिर यह फर्क क्यो ?” रानी ने उत्तर दिया  “एक घोड़ा उन्नत किस्म का है जबकि दूसरे की छाती मे चोट है।”
      रानी लक्ष्मीबाई नारी मे अबला नही सबला रूप देखती थी। उन्होने स्त्री सेना का गठन किया जिनमे एक से बढकर एक वीर साहसी स्त्रियाँ थी। रानी ने उन्हें घुड़सवारी व शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिलाकर युद्ध कला मे निपुण बनाया।
      रानी के जीवन में बहुत से उतार चढ़ाव आए। रानी को एक पुत्र उत्पन्न हुआ, परन्तु यह आनन्द अल्पकाल तक नही रहा। कुछ ही महीनो बाद शिशु की मृत्यु हो गयी। जब राजा गंगाधर राव गंभीर रूप से बीमार हुए तो दुर्भाग्य के बादल और भी घने हो गए। उनके जीवित बचने की कोई आशा नही थी। दरबार के लोगो को सलाह पर उन्होंने अपने परिवार के पाँच वर्षीय बालक को गोद लेकर दत्तक पुत्र बना लिया। बालक का नाम दामोदर राव रखा गया। बालक को गोद लेने के दूसरे दिन ही बालक की मृत्यु हो गई। रानी पर दुःखो का पहाड़ टूट पड़ा। इस विपत्ति के समय झाँसी राज्य को कमजोर जानकर अंग्रेजो ने अपनी कूटनीतिक चाल चली।

      अंग्रेजो ने रानी को पत्र लिखा कि राजा के कोई पुत्र न होने के कारण झाँसी पर अब अंग्रेजो का अधिकार होगा। इस सूचना पर रानी तिलमिला उठी। उन्होने घोषणा कि की झाँसी का स्वतंत्र अस्तित्व है। स्वामीभक्त प्रजा ने भी उनके स्वर मे स्वर मिला कर कहा हम अपनी झाँसी नही देगे। अंग्रेजो ने झाँसी पर चढाई कर दी। रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी की। उन्होने किले की दीवार पर तोपो लगा दी। रानी की कुशल रणनीति और किलेबन्दी देखकर अंग्रेजो ने दाँतो तले उगालियाँ दबा ली। अंग्रेज सेना ने किले पर चारो और से आक्रमण कर दिया। आठ दिन तक घमासान युद्ध हुआ। रानी ने अपने महल के सोने व चाँदी का सामान भी तोप के गोले बनाने के लिए दे दिया।

      रानी ने संकल्प किया कि अन्तिम साँस तक झाँसी के किले पर फिरगिंयो का झंडा नही फहरने देगी। लेकिन सेना के एक सरदार ने गददारी की और अंग्रेजी सेना के लिए किले का दक्षिणी द्वार खोल दिया। अंग्रेजी सेना किले मे घुस आई। झाँसी के वीर सैनिको ने अपनी रानी के नेतृत्व मे दृढता से शत्रु का सामना किया। शत्रु की सेना ने झाँसी की सेना को घेर लिया। किले के मुख्यद्वार के रक्षक सरदार खुदाबक्स और तोपखाने के अधिकारी सरदार गुलाम गौस खाँ विरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। ऐसे समय मे रानी को उनके विश्वासपात्र सरदारो को कालपी जाने की सलाह दी। रानी अपने सेना को छोड़कर नही जाना चाहती थी। लेकिन उनके सेनानियो ने उनसे अनुरोध करते हुए कहा “महारानी, आप हमारी शक्ति है। आपका जीवित रहना हमारे लिए बहुत जरूरी है। यदि आपको कुछ हो गया तो अंग्रेज सेना झाँसी पर अधिकार कर लेगी।” समय की गम्भीरता को देखते हुए, अपने राज्य की भलाई के लिए रानी झाँसी छोड़ने को राजी हो गई। उन्हे वहाँ से सुरक्षित निकालने के लिए एक योजना बनाई गई। इस योजना मे झलकारी बाई ने प्रमुख योजना बनाई।

झलकारी बाई
      झलकारी बाई रानी की स्त्री सेना मे सैनिक थी। वह रानी की अंतरंग सखी होने के साथ-साथ रानी की हमशक्ल भी थी। अपने प्राणो की परवाह किये बगैर जिस प्रकार उसने रानी की रक्षा की यह अपने मे एक अदभुत कहानी है। वह रानी के एक सेना नायक पूरन कोरी की पत्नी थी। रानी उनकी ब्रद्धिमत्ता एवं कार्यक्षमता से इतनी प्रभावित हुई कि उन्होने झलकरी बाई को शस्त्र तथा घुड़सवारी का प्रशिक्षण दिलाकर उन्हें सेन्य संचालन मे दक्ष कर दिया। झलकरी बाई रानी के प्रति पूर्णतः समर्पित थी। उनमे देश प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी थी। जब रानी को किले से सुरक्षित निकालने की योजना बनाई गई तो झलकरी बाई ने रानी के वेश मे युद्ध करने के लिए रानी को प्रस्तुत किया। रंग रूप मे रानी से समानता होने के कारण अंग्रेजो को भ्रमित करना आसान था। वे रानी की पोशाक पहनकर युद्ध करती हुई बाहर आ गई। उनके रण कोशल व रंगरूप को देखकर अंग्रेज भ्रम मे पड़ गए। उन्हेंने वीरतापूर्वक अंग्रेजो का सामना किया और उन्हे युद्ध मे उलझाए रही। इसी बीच रानी को निकलने का मौका मिल गया। दुर्भाग्य से एक गददार ने उन्हे पहचान लिया और अंग्रेज अधिकारी को सच्चाई बता दी। वास्तविकता जानकर अंग्रेज सैनिक रानी का पीछा करने निकल पड़े।

      झलकरी बाई की सच्चाई जानकर एक अंग्रेज स्टुअर्ट बोला – “क्या यह लड़की पागल हो गई है?” एक दूसरे अधिकारी हयूरोज ने सिर हिला कर कहा – “नही स्टुअर्ट, यदि भारत की एक प्रतिशत स्त्रियाँ भी इस लड़की की तरह देश-प्रेम मे पागल हो जाँए तो हमे अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति सहित यह देश छोड़ना होगा।”
      जनरल हयूरोज ने झलकरी बाई को बंदी बना लिया परन्तु एक सप्ताह बाद छोड़ दिया। अपनी मातृभूमि एवं महारानी लक्ष्मीबाई की रक्षा के लिए अपने प्राणो की बाजी लगाने वाली झलकरी बाई शौर्य एवं वीरता के कारण देशवासियो के लिए आदर्श बन गई।

अपना यश, किर्ति लिए,
जब आहुति देती है नारी
तब  तब पैदा होती है
इस धरती पर झलकारी ।।
      उधर झाँसी छोड़ने के बाद रानी अपने कुछ सैनिको के साथ अपना घोड़ा कालपी की तरफ दौड़ा रही थी। पीछा करते सैनिको ने रानी को देखते ही उन पर गोलियाँ दागनी शुरू कर दी। एक गोली रानी की जाँघ मे जा लगी। उनकी गति मंद पड़ते ही अंग्रेज सेनिको ने उन्हे घेर लिया। दोनो दलो मे भयंकर संघर्ष हुआ। रानी घायल और थकी हुई थी, परन्तु उनकी वीरता और साहस मे कोई कमी नही आयी। रानी को विवशतावश युद्ध क्षेत्र छोड़ना पड़ा। परन्तु हर पल उन्हे अपने साथियो और सैनिको की सुरक्षा की चिन्ता थी। इस संघर्ष के दौरान एक अंग्रेज घुड़सवार ने रानी की सखी व सैनिक मुन्दर पर हमला कर उसे मार दिया। यह देखकर रानी क्रोध से तमतमा उठी। उन्होने उस घुड़सवार पर भीषण प्रहार किया और उसे मृत्यु के घाट उतार दिया।
      कालपी की ओर घोड़ा दौड़ाते हुए अचानक मार्ग मे एक नाला आया। नाले को पार करने के प्रयास मे घोड़ा गिर गया। इस बीच अंग्रेज घुड़सवार निकट आ गए। एक अंग्रेज ने रानी के सिर पर प्रहार किया और उनके हदय मे संगीन से वार किया। गम्भीर रूप से घायल होने पर वे वीरतापूर्वक लड़ती रही। अंततः अंग्रेजो को रानी व उनके साथियो से हार मानकर मैदान छोड़ना पड़ा। घायल रानी को उनके साथी बाबा गंगादास की कुटिया मे ले गए। पीड़ा के बावजूद रानी के चेहरे पर दिव्य तेज था। अत्यधिक घायल होने के कारण रानी वीरगति को प्राप्त हो गई  और क्रान्ति की यह ज्योति सदा के लिए लुप्त हो गई।
आज भी उनकी वीरता के गीत गाये जाते है –

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