सेठ को गाय का उपदेश

      विधाता द्वारा रचित इस सृष्टि मे सबसे श्रेष्ठ पद तो मनुष्य को ही प्राप्त है परन्तु यदि मानव अपने उददेश्य से विमुख हो जाता है तो उसकी अपेक्षा जो पशु अर्थात् गाय-भैंस आदि घास-भूसी पदार्थ खाकर भी बदले मे अमृत तुल्य (दूध) मनुष्यमात्र को देते है तथा जो छत्तीस प्रकार के व्यंजन खाकर भी मालिक को याद नही करता तथा मायासक्त ही बना रहता है तो ऐसा मनुष्य पशुओ से भी गया गुजरा है। इसी विषय पर एक कथा दी जा रही है। जो इस प्रकार है –


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      एक बार का वृत्तान्त है की कोई एक धनी-मानी पुरूष अपने प्रांगण मे पलंग पर बैठा हुआ था। पास मे ही गौ माता खूँटी से बँधी खड़ी थी। उसके भोजन के लिए आदेश देने पर नौकर ने मालिक के हाथ धुलवाये तथा अनेक प्रकार के भोजन थाल मे लगाकर आगे मेज पर रख दिये। इतने मे गाय थोड़ी पीछे हटी और उसने जो लात मारी तो सेठ के पलंग को जा लगी। धनी क्रोध मे आकर कहने लगा – पीछे हट पशु! तू भी क्या ख़र माल है। सेठ के इस प्रकार गाय पर क्रोध करने से सेठ के पिछले शुभ-संस्कार संचित हो उठे तथा दैविक प्रेरणा से गौ को वाक् शक्ति प्राप्त हुई। मानो स्वयं ईश्वर ने गाय द्वारा सेठ को उपदेश देकर उसका सुधार करना चाहा।
   
  गाय बोली – ऐ सेठ जी! तनिक सावधान होकर बोलिये! आप जो मुझे ख़र पशु और स्वयं को श्रेष्ठ बतला रहे हो तनिक हदय मे विचार तो करें मै आपको इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण बताती हुँ, सुनो! सेठ जी!! जबकि मै ख़ल-भूसा व बनैला आदि असार वस्तु खाकर भी उसके प्रतिफल अमृत तुल्य दूध देती हुँ, जो कि मानवमात्र मे नव-जीवन का संचार करता है। इसके अतिरिक्त मेरे मल-मूत्र का भी मनुष्य अपने पवित्र कार्यो को करने मे प्रयोग करते है तथा मरने के पश्चात मेरे शरीर की खाल व हड्डियाँ इत्यादि काम मे लाई जाती है। मेरी अपेक्षा आप नित्यप्रति बढ़िया से बढ़िया पदार्थ खाते है। अब आप ही सोच लिजिये आपके नाना प्रकार के भोजन खाने पर भी शरीर मे कितनी गन्दगी बनती है जिससे सभी लोग घृणा करते है तथा मरने के पश्चात भी घर के सम्बन्धी,रिश्तेदार व अन्य जन घृणा करने लगते तो है ही तथा भय तक भी खाने लगते है। अस्तु, आप स्वयं ही अब निर्णय दे दिजिये कि हम दोनों मे से फिर श्रेष्ठ पद का अधिकारी कौन हुआ ?
      धनी सेठ के हदय पर गाय की वास्तविकता से भरी इन बातों का गहरा प्रभाव पड़ा। भीतर से उसकी अन्तरात्मा जाग उठी तथा कुछ ज्ञान भी हो आया परन्तु अहंकार रूपी दैत्य बड़ा प्रबल होता है। वह तत्क्षण सेठ के सिर पर चढ़ बैठा। उसने जब सेठ को सन्मार्ग की और झुकते देखा तो तुरंत ही एक कुविचार उसके मस्तिष्क मे पैदा हुआ। तब सेठ अहंकार के वशीभूत होकर कहने लगे – ऐ गाय! जो कुछ तुमने मेरे प्रति कहा है सब ठीक है परन्तु तुम यह भी जानती हो कि सृष्टि मे सभी जीवो मे मैं ही श्रेष्ठ हूं क्योकि ईश्वर ने मुझे वह उत्तम बुद्धि प्रदान की है जो कि सृष्टि के शेष जीवों मे नही पाई जाती। इसलिए तुम पशु हो और मै मनुष्य। 
      गाय बोली – सेठ जी! अब ध्यान देकर मेरी दुसरी बात भी सुनो। जिस प्रकार की एक धनी व्यापारी अपने दो व्यक्तियो को कुछ धन देकर व्यापार करने के लिए कही अन्य देश मे भेजता है। उनमे से एक व्यक्ति शरीर द्वारा परिश्रम करके तथा थोड़ा धन व्यय कर सामान भी अधिक मात्रा मे खरीद लाता है। विपरीत इसके दूसरा मनुष्य धनी व्यापारी के लाखो रूपये खर्च करके भी अच्छा व्यापार नही करता। वह अपने समय व धनी पुरूष के धन को व्यर्थ में गवाँ देता है। अब आप ही इस बात का उत्तर देवे की वह मालिक किसको अच्छा समझेगा।
      सेठ जी यह ज्ञान भरा उपदेश सुनकर पूर्ववत् मौन रहे क्योकि वह भी दूसरे व्यक्ति की भाँति लाखों रूपये अर्थात् श्वास रूपी रत्न खर्च कर चौरासी की कैद मे जाने का सामान इकट्ठा कर रहे थे। सेठ जी को मौन देख गाय बोली – सेठ जी! इसी प्रकार उस परमात्मा रूपी व्यापारी ने भी मनुष्य व पशुओ को इकट्ठा ही इस संसार मे भेजा है। जो अज्ञानी जीव परमात्मा से श्वास रूपी धन प्राप्त कर उसे विषय-विकारो और अपनी इच्छाओ की पूर्ति में ही समाप्त कर देते है एवमं जिस वस्तु का व्यापार करने के लिए उसे इस जगत् मे भेजा है उस उद्देश्य को विस्मृत कर मायावी रंग-रलियो में ही अपने अमोलक धन को खो बैठते है तो अन्त मे उन्हें चौरासी लाख योनियों की कारावास (कैद) मे जाना ही पड़ेगा। अब आप ही सत्य-सत्य बताये कि क्या यह धन व ऐश्वर्य के सामान आपको कारावास मे ले जाने के उपकरण नही बन रहे ?
      गाय के दोबारा पूछने पर सेठ जी पर तो मानो दुःखो का पहाड़ ही टूट पड़ा। उसने प्रत्युत्तर पाने की आशा न जानकर गाय ने पुनः चेतावनी देते हुए कहा – सेठ जी! यदि आप इसका भी उत्तर नही देते तो अब इसकी तुलना मे दूसरा वृत्तान्त भी सुनो – आपको तो परमात्मा की तरफ से सब प्रकार के उपयोगी साधन, ऐश्वर्य के सामान और सबसे उत्तम बुद्धि प्राप्त है। जबकि मै परमात्मा से कुछ भी लेकर नही आई अपितु मै तो विधाता की और से भेजे हुए मनुष्यो की सेवा करती हुँ तथा अपने बछड़ों से दूध बचाकर अपने मालिक के नाम पर जन-साधारण को वह अमृत-दूध पान कराती हूँ। अब आप स्वयं ही विचार करे कि आप इन श्वास रूपी अमोलक धन का व्यय कर एवं उत्तम बुद्धि प्राप्त करके क्या लाभ उठा रहे हो ? ऐसे यथार्थ वचनो को सुनकर सेठ जी और भी लज्जित हो गये।
      ‘इसलिए अब सेठ जी! अब सावधान हो जाओ और अब इस बुद्धि व धन का अभिमान मत करो क्योकि आपने इस संसार मे आकर प्रभु-भक्ति न कर आत्मज्ञान प्राप्त न किया अपितु मन के मतानुसार शारीरिक इच्छाओ की पूर्ति मे ही संग्लन रहे। अतएव अब आपको ईश्वर के दरबार मे प्रताड़ना सहन करनी ही होगी।’
      दैवयोग से सेठजी के संचित पूर्व शुभ संस्कार जागृत हो उठे। यह उपदेश सुनकर सेठ जी जोर-जोर से करूण-क्रन्दन करने एवं मन ही मन स्वयं को धिक्कारने लगे। नौकर से कहा कि – भोजन का थाल आगे से उठा लो। इतना कहकर स्वयं को कोसने लगे – ‘ऐ मूर्ख मन व शरीर! मैने तुझे दूध मक्खन व मलाई आदि खिला-खिला कर पाला पोसा और परन्तु तूने मेरा कोई अभीष्ठ कार्य सिद्ध न किया। जिस प्रकार कोई व्यक्ति तदूर को आग से प्रज्वल्लित तो कर दे लेकिन उसमे रोटियाँ न बनाए तो उसके समान मूर्ख कौन होगा ? इसी प्रकार मैने भी सब कुछ साधन प्राप्त होते हुए भी मन में चगुंल मे फँसकर मालिक की बन्दगी न की और व्यर्थ ही समय गँवा दिया।’ इसी प्रकार वह काफी देर तक स्वयं को कचोटता रहा। गाय की ज्ञान भरी बाते सुनकर उसके मन मे संसार से उपरामता हो आई। उसके पश्चात उसको यह विचार आया कि जब तक मै सन्त सदगुरू की जो कि पूर्ण ब्रह्मवेत्ता हो शरण नही अपनाता तब तक मेरा मनोरथ सिद्ध न होगा।
      अगले दिन वह सन्त सत्पुरूषो की खोज करने निकला। वहाँ से कुछ दूरी पर प्रसिद्ध व पूर्ण महापुरूष एक महात्मा जी रहते थे। उनकी शरणागति प्राप्त कर एवं उनसे विधिवत् सच्चे नाम की दीक्षा लेकर तथा भक्ति का श्रेष्ठ मार्ग अपनाकर अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने मे प्राणपन से जूट गये।                     

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