सिक्खो के प्रथम गुरू श्री गुरूनानक देव जी का एक अद्भुत प्रंसग

सत्पुरूषो का कथन है कि जहां नेकी और सच्चाई का पथ काँटों से भरा है किन्तु उसका परिणाम फूलो की सेज है तो वहाँ उसके विपरीत बुराई और झूठ कपट का मार्ग उसकी अपेक्षा प्रत्यक्ष रूप मे तो अधिक सुन्दर, मनमोहक फूलो से सजा हुआ प्रतीत होता है, लेकिन अन्त मे इसका परिणाम शूलों के रूप मे ही प्राप्त होता है।

      जिस समय प्रथम पादशाही श्री गुरूनानक देव जी अपने अनुपम रूहानी उपदेशों से दुनिया को चिताने के लिए और भक्ति व परमार्थ के पथ पर अग्रसर करने हेतु सृष्टि भ्रमण कर रहे थे। उसी समय का यह नीचे लिखा गया एक प्रंसग दिया जा रहा है जिसका वृत्तान्त इस प्रकार है – 
      किसी नगर मे एक बनिया रहता था उसके दिल मे भक्ति पथ पर चलने की एवं पारमार्थिक कार्य करते रहने की तीव्र अभिलाषा लगी रहती थी। इसके अतिरिक्त वह सच्चे रूहानी सतगुरू की छत्र-छाया मे रहकर अपना जीवन व्यतीत करना चाहता था। इसलिए दिनों दिन उसके मन मे अब पूर्ण गुरू को प्राप्त करने की उत्कण्ठा उग्र रूप धारण करने लगी। उन दिनो मे मृत्युलोक मे श्री बाबा गुरूनानक देव जी महाराज का अवतरण हो चुका था और वे सृष्टि पर रूहानियत का प्रचार कर रहे थे। इस बनिये ने कही से सुन लिया कि जगत् के प्राणियो को मोह-माया की दलदल से निकालकर भव से तराने वाले आज के युग मे पूर्ण रूहानी राहनुमा श्री गुरूनानक देव जी संसार मे प्रकट हुए है। इसके मन मे दबी हुई भावनाएँ प्रबल हो उठी और उनके दर्शन करने की उत्कण्ठा दिन-प्रतिदिन तीव्र होती चली गई।  
      संयोगवश उसी नगर मे श्री गुरूनानक देव जी महाराज अपने दोनो शिष्यो बाला और मर्दाना सहित घूमते-घूमते आ निकले। उनके पधारने पर श्रद्धालु-प्रेमी जनों मे बढ़ोतरी होने लगी तथा कई दिनो तक सत्संग प्रवाह बहने लगा। सत्संग से लाभ प्राप्त करने वाली भक्त मंड़ली मै यह बनिया भी सम्मिलित था। गुरू जी की शरण मे आकर इन बनिये ने उनको विधिपूर्वक सतगुरू मे धारण किया तथा उनसे गुरू दीक्षा ली। अब तो यह प्रतिदिन सत्संग मे आने लगा। इसके पड़ोस मे एक और भी बनिया रहता था जिसके साथ इसकी घनिष्ठ मित्रता थी। इस गुरूभक्त बनिये के मुख से सत्संग की महिमा व सन्त-दर्शन का महान् प्रताप सुनकर उसके दिल मे भी गुरू के पवित्र दर्शन करने की इच्छा उत्पन्न हुई। अस्तु दूसरे दिन वह पड़ोसी बनिया प्रेमी बनिये के साथ गुरू दर्शन के लिए चल पड़ा। 
      मार्ग मे एक वेश्या का घर पड़ता था। पडोसी बनिये की ज्योही दृष्टि उधर पड़ी कि उसका निर्बल मन डावाॅडोल हो गया। इस स्थान को देखकर उसके मन के शुद्ध विचार किनारे कर गये। इसप्रकार वह मलिन वासनाओ का शिकार बन गया और मन ही मन कहने लगा कि इस लुभावने स्थान को छोड़कर वहाँ फीके सत्संग मे जाकर मैने क्या लेना है। यही सोचकर वह मित्र बनिया तो वही पर ही रूक गया। पड़ोसी मित्र को इस प्रकार मायावी दलदल मे धँसता हुआ देखकर भक्त बनिये ने बहुत समझाया – ‘मित्र! बैकुण्ठ में जाते जाते एकाएक यह क्या नरक मे घुसने का विचार मन में ठान लिया है तुमने? ऐसा न करो।’ परन्तु अब उसकी सुनता कौन? क्योकि पडौसी बनिये का मन तो विषयो की और झुक चुका था। अन्ततः अपने कथन का कुछ प्रभाव न पड़ता देख भक्त बनिया अकेला ही गुरू-दर्शन व सत्संग का लाभ प्राप्त करने के लिए चल दिया।   
      इसके बाद दोनों का यही प्रतिदिन का नियम बन गया था। भक्त बनिया तो नित्य सत्संग मे जाकर आत्मिक लाभ प्राप्त करता और दूसरा मित्र नित्य प्रति वेश्या के पास जाता। इस प्रकार दोनो ही घर से साथ-साथ निकलते। जितना समय एक मित्र सत्संग मे व्यतीत करता तो दूसरा मित्र उतना ही समय विलासिता मे नष्ट कर देता। भक्त बनिया अपने मित्र के इस अभद्र कार्य को देखकर अफसोस करता और उसे सतमार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता कि ‘मित्र! नेकी व सच्चाई सहित भक्ति मार्ग पर कदम बढ़ाओ। क्यो, नही तुम मनुष्य जन्म का सच्चा लाभ प्राप्त कर लेते?’ अस्तु उसके बार-बार कहने पर भी मित्र बनिये के मलिन-विचारो मे तनिक भी परिवर्तन न आया।   
      एक दिन का वृत्तान्त है कि जब यह दोनों घर से साथ साथ अपने-अपने लक्ष्य स्थानों की तरफ रवाना हुए तो वे दिन श्राद्धो के थे। नियमानुसार भक्त बनिया अपने मित्र से कहने लगा कि – देखो मित्र! आज श्राद्ध का दिन है इसलिए कम से कम आज तो चाहे मित्रता के नाते ही मेरा कहा मान लो और पाप की और पग न बढ़ाकर मेरे साथ सत्संग मे चले चलो। सत्संग मे इतनी शक्ति है कि वहाँ जाने से पापी के पापी मनुष्य के भी बुरे कर्मफल नष्ट हो जाते है। एक बार मेरे अनुरोध करने पर ही सत्संग का लाभ तो देख लो ना… कि उस शुभ स्थान पर जाने से जीवमात्र की आत्मा को कितना अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है।    
      इधर यह बनिया तो अपने हठ पर ही अड़ा रहा। भक्त बनिये की इसके समक्ष दाल न गल सकी। फलतः वह चुप हो गया। इस पर मित्र बनिया भक्त बनिया से कहने लगा – अच्छा मित्र! तो तुम भी एक बात ध्यान से सुन लो। देखो, तुम नित्यप्रति महापुरूषो के दर्शन प्राप्त करते हो तथा सत्संग श्रवण करते हो। सो आज श्राद्ध के दिन देखते है कि हमारे द्वारा किये गए कर्मो का हमे क्या क्या फल मिलता है? इसलिए लौटते समय अमुक स्थान पर हम दोनो परस्पर मिलेगे। यदि तुम मेरे पहुँचने से पूर्व वहाँ पहुँच जाओ तो तुम मेरी प्रतीक्षा करना और यदि मे पहले लौट आया तो मै तुम्हारी राह देखूँगा। इस प्रकार दोनो मित्रो मे निश्चित स्थान पर मिलने की बात नियत हो गई। पश्चात दोनों मित्र अपने अपने स्थान पर चल दिये। 
      जब वह दूसरा बानिया वेश्या के घर पर पहुँचा तो उस दिन वेश्या घर पर न थी जिस कारण उसे वह न मिल सकी। कुछ देर प्रतीक्षा करने पर भी जब वह न लौटी तो तब वह बनिया प्रतिदिन से कुछ समय पूर्व ही उस स्थान पर आकर अपने मित्र की प्रतीक्षा करने लगा। भक्त बनिया जितना समय सत्संग मे नित्य दिया करता था। आज पहले से भी अधिक समय उसका वहां पर लग गया। जिससे दूसरे बनिये को उसकी बहुत देर तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। प्रतीक्षा की घंडिया लम्बी होती है जिस कारण वे काटनी कठिन होती है।
      प्रकृति के नियमानुसार प्रत्येक व्यक्ति के हाथ-पाँव व मन सदैव ही किसी न किसी कार्य में व्यस्त रहना जानते है। इस बनिये के हाथ में एक छड़ी थी। प्रतीक्षा मे बैठे-बैठे उस छड़ी से वह भूमि को कुरेदने लगा। उस स्थान पर भूमि कुछ खोखली सी थी अतएव छड़ी द्वारा कुरेदने से शीघ्र ही वहां पर एक गडढ़ा सा बन गया। खोदते-खोदते अचानक उसकी छड़ी किसी वस्तु से जा टकटाई। तब यह उस गड्ढ़े मे झांकने लगा। देखने पर ज्ञात हुआ कि नीचे एक मिट्टी का घड़ा दबा पड़ा है और जिसका मुँह कपड़े से बन्द है। उसने वह घड़ा बाहर निकाला और कपड़ा हटाकर जब देखा तो उसमे सोने की एक अशरफी ऊपर ऊपर पड़ी हुई दृष्टिगत हुई। स्वर्ण मोहर को देखकर इस बनिये ने हदय मे यह अनुमान लगाया कि इस घड़े मे सब अशर्फियाँ ही भरी होगी। यह सोचकर जब उसने घड़े को पलटकर देखा तो उसे यह देखकर बहुत अफसोस आया, क्योकि उसमे केवल एक ही अशरफी थी नीचे घड़ा कोयले से भरा हुआ था। एक अशरफी को पाकर ही वह मन मे खुश होकर रह गया कि चलो, एक मोहर तो हाथ लग ही गई। 
      इतने मे वह भक्त बनियां भी वहां आ पहुँचा। जब दूसरे बनिये ने देखा कि वह तो लँगड़ाता हुआ चला आ रहा है तो पूछने पर ज्ञात हुआ कि बबूल का बड़ा सा कांटा उसके पांव मे चुभ गया था जिस कारण पांव से खून बहने लगा और वेदना होने के कारण वह लँगड़ाता हुआ आया है। यह सुनकर विलासी बनियां भक्त बनिये का उपहास उड़ाते हुए कहने लगा कि – लो भाई! आज तो स्वयंमेव निर्णय हो गया कि सत्संग का क्या फल है और कुकर्मो का परिणाम क्या है? मुझे तो आज स्वर्ण मोहर प्राप्त हुई और तुम्हे क्या मिला? बबूल का कांटा जिसने तुम्हारे पांव को लहूलुहान कर डाला है। बस! इसी से तुम कहते थे कि सत्संग का फल महान् और शुभ होता है? अहहा…हा…हा…     
      मित्र का यह व्यंग्य सुनकर भक्त बनिया विचार मग्न हो गया कि यह क्या आश्चर्य जनक विपरीत हुई है जो इतने दिनो तक तक निरन्तर पापकर्मो मे रत रहने पर भी उसको फलस्वरूप मोहर मिली और मुझे सत्संग व सन्त दर्शन के पुण्य का फल यह शूल-यातना मिली। भक्त के मन मे संशय और भम्र ने घर कर लिया। अन्त मे बहुत कुछ कहने सुनने के उपरान्त दोनो ने यह सोचा कि चल कर गुरू जी से ही इसका कारण पूछना चाहिए कि ऐसा क्यो हुआ?   
      अतएव दोनों उसी समय श्री गुरूनानक देव जी के पास आये और अपना संशय उनके समक्ष प्रस्तुत किया। गुरूनानक देव जी ने अन्तर्मुख होकर दोनों बनियो के भूत भविष्य और वर्तमान समय की स्थिति को भांप कर उत्तर दिया – ‘सुनो प्यारे! इस बनिये ने पूर्वजन्म में किसी साधु को दान मे एक अशरफी दी थी। सो इसके शुभ कर्म के बदले मे इसको इस जन्म मे अशर्फियो से भरा हुआ घड़ा मिलना था परन्तु प्रतिदिन के कुकर्मो के परिणामस्वरूप प्रत्येक स्वर्ण-मोहर कोयला बनती गई संयोगवश आज यह पापकर्म करने से बच गया है। अतः वही एक अशरफी जो कि इसको प्राप्त हुई है कोयला बनने से बची रही, अन्यथा वह भी कोयला बन जाती। 
      इसके बाद श्री गुरूनानक देव जी भक्त बनिये से कहने लगे – ‘सुनो, तुम पूर्व जन्म मे अत्यधिक अन्यायी व सूदखोर थे। तुम्हारे पापों के प्रतिकार मे इस जन्म में तुम्हे सूली का दण्ड मिलना था, परन्तु तुम चूँकि इस जन्म मे भक्ति और परमार्थ के पथ की और प्राणपन से झुकते चले आये अतएव तुम्हारे पिछले पापकर्म सदगुरू की कृपा व सत्संग से धीरे-धीरे कटते चले गए। फिर भी किये हुए बुरे कर्मो का कुछ न कुछ तो फल प्रत्येक स्थिति में मिलना ही था। इसलिए शुभ कर्मो की और अग्रसर होने के कारण आज तुम्हे सूली के स्थान पर मामूली काँटे की पीड़ा सहन करनी पड़ी। तुम्हारे पुण्य प्रताप व सत्संग श्रवण करने से एवं सदगुरू की छ्त्रछाया मे जीवनयापन करने से तुम्हारी सूली की सजा समाप्त हो गई है।’
      यह सुनकर दोनों बनिये गुरू जी के चरणो मे गिरकर रोने लगे और अपने अपराधो के लिए उनसे क्षमा मांगने लगे। श्री गुरूनानक देव जी ने उन्हे अपने चरणों से उठाकर समझाया, कि जब अज्ञानी मनुष्य की दृष्टि स्त्री पर पड़ती है तो उनका मन चंचल हो उठता है तथा वह मलिन इच्छाओ का शिकार बन कर अपना दुर्भल मनुष्य जन्म अकारण गंवा देता है। शुभ कर्मो की अपेक्षा अश्लील कर्म करने लगता है, उसकी बुरी गति होती है। अतः जिसे भक्ति और परमार्थ तथा रूहानियत को पाने की अभिलाषा हो तो उसे चाहिए कि इन दुर्व्यसनों तथा बुरी संगत से स्वयं को दूर रखे तभी वह सच्चे आनन्द को प्राप्त कर सकता है।   
      श्री गुरूनानक देव जी के प्रभावशाली व ज्योतिर्मय वचन सुनकर विलासी बनिया मन ही मन अपने कुकृत्यों पर बहुत पछताया। पश्चात उसने विधिपूर्वक गुरुदीक्षा ली और दोनों मित्रो ने श्री गुरुनानक देव जी के उपदेश पर हदय से अमल करने का वचन दिया। अपने दिए गए वचन के अनुसार अब दोनों बनिये सत्संग व परमार्थ मे अपने शेष जीवन को लगाकर अपने मनुष्य जन्म को सफल कर गए।  
      भावार्थ – यह है प्रताप महापुरुषो की संत्सगति मे जाकर उनसे उपदेश ग्रहण करने का कि मनुष्य के जघन्य पाप भी सत्संग के महान् गौरव से क्षीण पड़ जाते है। जो जीव महापुरूषो के वचनों पर आचरण करते है। वे चौरासी लाख योनियों की भंयकर यातनाओ से छुटकारा पा लेते है जबकि अज्ञानी जीव जो मनमति अनुसार अपने बुरे कर्मो की और प्रवृत्त हो जाते है उनका इन दुःखो से बच सकना तीन काल मे असम्भव हो जाता है। परन्तु सत्संग श्रवण करने से एवं महापुरूषो की अपार कृपा होने पर श्रद्धालु जीवों के भारी से भारी कष्ट भी लघु रूप धारण कर लेते है जैसा की ऊपर वर्णित हो चुका है। इतना विशाल गौरव एवं लाभ है सन्त महापुरूषो की सेवा करने व उनकी संगति मे जाने का।                        

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