सन्त नाभादास की जीवनी

भक्त नाभादास जिन्होंने ‘भक्तमाल’ की रचना की है, के सम्बन्ध मे कहा जाता है कि वे एक डोम कुल के सदस्य थे और जन्म से ही नेत्रहीन थे। माता-पिता ने इन्हे अर्थहीन जानकर जंगल मे छोड़ दिया। मगर ‘जाको राखे साईयाँ मार सकै न कोय’ के अनुसार इनकी भी दैविक शक्ति से रक्षा हुई। जो इस प्रकार है –     

      दैवयोग से इस जंगल मे से सन्त ‘उगरदास जी’ व कुछ साधुओ का गुजरना हुआ। उन्होने देखा कि इस सुनसान जंगल मे एक नेत्रहीन बालक बैठा है। इनके मन मे बच्चे को देखकर अत्यधिक दया आई। उन्होने इस बालक से पूछा – तू कौन है?’
       नाभा जी ने सुना तो उत्तर दिया – ‘महाराज! क्या बताऊँ की मै कौन हूँ। अगर आपका प्रश्न शरीर के विषय मे है तो यह पाँच भौतिक तत्वो का एकत्र हुआ पुतला है। जब तक यह चलता रहता है तब तक ठीक है और फिर इसके समाप्त होते ही प्रत्येक तत्व का अंश अपने-अपने भण्डार मे मिल जाता है। भावार्थ यह है कि शरीर असत् है – फिर मे आपको इसका क्या नाम बताऊँ? कदाचित् आपका प्रयोजन आत्म-सम्बन्धित है तो वह निर्लेप है, अनामी है, निराकार है। फिर, महाराज! मै इस बारे मे आपको क्या उत्तर दूँ?
      सन्तो ने जब बालक से यह उत्तर सुना तो विचार आया कि यह तो कोई पिछले जन्म का संस्कारी जीव है। इसलिए उन्होने बालक को अपने साथ चलने के लिए कहा। उनके कथन को स्वीकार कर नाभा जी सन्तों के साथ उनके निवास स्थान पर जा पहुँचे। जब नाभादास जी को आश्रम पर लाया गया तो सन्त उगरदास जी ने इनको अनाथ बालक जानकर अपने एक सेवादार को कहा कि दोनों समय इस बालक को भोजन पहुँचा दिया करे। इसके अतिरिक्त इसका और भी कोई शारीरिक कार्य करना हो तो उसे भी तुम कर दिया करो। इस तरह इसे दोनों समय लंगर से भोजन मिल जाता। क्योकि शरीर की विवशता के कारण कोई काम तो यह कर नही सकता था। इसलिए नाभा जी ने उस सेवक से कहा – ‘भाई! आप मेरे लिए लंगर से अब भोजन मत लाया करो। जब मै गुरूदेव के आश्रम की कोई सेवा ही नही कर सकता तो फिर में क्यो किसी पर बोझ बन कर रहूँ।’
      सेवादार ने पूछा – ‘भाई! पेट तो भरना ही है। जब रोटी न खाओगे तो काम कैसे चलेगा?’  
      नाभा जी ने प्रत्युत्तर मे कहा – ‘साधु महात्माओ की जूठन, रोटी के टुकड़े व दाल जो बच जाती है आप वही मेरे लिए ले आया करो। मै उस पवित्र भोजन को खाकर अपना निर्वाह कर लिया करूँगा। लंगर की रोटी किसी और के काम आ सकती है और मै दरबार की कोई सेवा भी तो नही कर सकता, इसलिए तुम मुझे एक झाड़ू दे दो और जगह बता दो। कुछ थोड़ी बहुत गुरू-दरबार की सेवा करके मै भी अपनी देह को पवित्र कर लिया करूँगा।’
      एक दिन की बात है कि महात्माओ ने इनकी आँखो को देखा तो ज्ञात हुआ कि इनके नेत्रो के पपोटे परस्पर मिले हुए है अगर इनको प्रयास द्वारा किसी तरह खोल दिया जाए तो सम्भव है इन्हें दिखाई देने लगे। चुनांचे उन्होने नाभा जी के पपोटे मे चीरा दे दिया। फलतः इनको थोड़ा थोड़ा नजर आने लगा। भगवद्कृपा से कुछ समय पश्चात इनके नेत्रो मे पूरी तरह ज्योति भर आई। अब नाभा जी नेत्रहीन न होकर नेत्रवान बन चुके थे।    
      नेत्रो मे ज्योति आ जाने पर भी नाभा जी सन्तो के सीत प्रसाद को बहुत श्रद्धा व प्रेम से खाते। नाभाजी के दिल मे जो इस बात का दुःख था कि मेरी आँखे होती तो मै भी गुरु दरबार की सेवा करता..। अब आँखे ठीक हो जाने पर नाभा जी दिन रात सेवा मे जुट गये। सन्त महात्माओ का सत्संग श्रवण कर व उन पर आचरण करके अपने हदय रुपी दर्पण को उज्जवल करते रहते। जिससे नाभा जी के दिल मे अत्यधिक पवित्रता आ गई।
      श्री उगरदास जी इनकी सेवा भावना से अतिशय प्रसन्न थे। इसलिए उन्होंने सन्त कलह देव जी की आज्ञा से मन्त्र दीक्षा देकर नाभा जी को अपना शिष्य बना लिया। एक दिन वार्त्तालाप के मध्यान्तर उगरदास जी ने नाभा जी से कहा – ‘बेटा! तुम पर साधु-सन्तों की दुर्लभ कृपा हुई है। अतः अब तुम इन्ही स्वनामधन्य सन्तो के गुण और स्वरूप को तथा उनके हार्दिक पवित्र व शुभ विचारो का वर्णन करो। क्योकि सन्त चरित्र का गायन करना, यही एक मात्र ही तो भवसागर से पार हो जाने का अतिउत्तम साधन है।’       
      यह सुनकर नाभा जी ने हाथ जोड़कर विनय कि – ‘गुरूदेव! सन्तों की महिमा अनन्त है मै भगवान के गुणवाद तो शायद गा भी सकूँ परन्तु सन्तों के अदभुत अगम चरित्रों का पार पाना मेरे लिए असम्भव है।’    
      प्रत्युत्तर मे गुरूदेव जी ने समझाते हुए कहा – ‘बेटा! जिन्होने तुम्हे इस स्थान पर पहुँचाया और तुम्हे नेत्र भी प्रदान किए वही करूणामय प्रभु तुम्हारे हदय मे बैठ कर तुम्हे दिव्यदृष्टि प्रदान करेगे। जिससे तुम सरलता से इस कार्य को कर सकोगे। साधु-सन्तो के प्रति तुम्हारी उच्चतम भावनाएं है, अतएव हम चाहते है कि तुम यह शुभ कार्य ‘भक्तमाल’ ग्रन्थ की रचना का तुम्हारे द्वारा ही सम्पूर्ण हो। अस्तु तुम इस महान् कार्य को आरम्भ कर दो।’
      अपने गुरूदेव का मंगलमय आर्शीवाद पाकर श्री नाभा जी भक्तमाल की रचना करने को तत्पर हो गये। परिणाम स्वरूप इन्होंने इस ग्रन्थ की रचना मे आशातीत सफलता प्राप्त की।
      तात्पर्य यह है कि यद्यपि सन्त नाभादास जी नेत्रों से सूरदास थे लेकिन गुरू दरबार के प्रति अगाध श्रद्धा व सेवा की निष्कामभावना रखने का यह उत्तम परिणाम निकला, कि उनकी शारीरिक व्याधियां काफूर हो गई। सतगुरू की अपार कृपा द्वारा वे प्रेम-भक्ति के धनी बन गए और उनकी दिव्य दृष्टि खुल गई। जिसके फलस्वरूप उन्होने सन्त महात्माओ के चरित्रो का सुन्दर भाषा मे गुणानुवाद किया है। जिसे आज जनसाधारण अति चाव से पढ़ते है सुनते है। इतना पराभाव है अपने इष्टदेव सन्त सतगुरू की शरण अपनाने व उनकी पवित्र सेवा करने का। सन्त सतगुरू जीव को कितना ऊँचा उठाते है, उसे इस लोक व परलोक मे कितना आत्मिक सुख प्रदान करते है इसका स्पष्ट व सजीव प्रमाण यह दृष्टान्त पाठको के समक्ष है। अतएव प्रत्येक प्राणिमात्र को जीवात्मा का कल्याण करने के लिए इस सुअवसर से वचिंत न रहना चाहिए। अपितु पूर्ण गुरू जी की पवित्र छाया में रहकर आत्मिक शान्ति प्राप्त करनी चाहिए जो हमारा वास्तविक उद्देश्य है।     

Leave a Reply

Your email address will not be published.