सन्त दर्शन का गौरव

     विधाता की रचित यह सृष्टि जड़ अथवा चेतन जितनी भी दृष्टिगोचर होती है वह अपना प्रकट अथवा गुप्त रूप से प्रभाव डाले बिना नही रहती। जब मायावी पदार्थ का अथवा साधारण मनुष्य का संसर्ग प्रभावशाली है तो क्या जिन सौभाग्यशाली जीवो को सोभाग्य से महापुरूषो की संगति प्राप्त हो चुकी है उनके कायाकल्प होने मे कोई सन्देह रह जायेगा ? कदापि नही। प्रभाव किसी के कहने पर नही पड़ता; यह तो मनुष्य जिस प्रकार के वातावरण मे जीवन व्यतीत करता है वहाँ के गुण अथवा अवगुण स्वयमेव उसके हदय मे प्रविष्ट हो उसे तद्रूप बना देते है। जैसे कि निम्नलिखित प्रसंग मे दर्शाया गया है –

      एक महात्मा जी किसी स्थान पर कुटिया बनाकर रहते थे। एकबार एक साधक वहाँ पर आया और उनका सत्सगं श्रवण करने लगा। शनैः शनैः उस सत्सग ने उसे इतना प्रभावित किया की वह प्रतिदिन ही सत्संग मे आने लगा। एक दिन उसने महात्मा जी से प्रश्न किया, ‘महाराज ! मुझे बताइए कि सन्तो के दर्शन व उनका सत्संग त्रवण करने से क्या लाभ होता है ?’
     महात्मा जी बोले – ‘इस गांव के पास एक नदी बहती है। कल प्रातः तुम उसी नदी पर चले जाना। इस प्रश्न का उत्तर तुम्हे वही पर आप ही मिल जायेगा।’
      महात्मा जी की आज्ञा से जिज्ञासु प्रातः नदी पर गया। वहाँ पहुँचने पर उसे कुछ न दिखाई दिया। काफी देर इधर-उधर देखने पर उसे एक वृक्ष की शाखा पर कौआ और कव्वी का जोड़ा ही केवल मात्र बैठा दिखाई दिया जो उसी की ओर ही ताक रहा था। उस व्यक्ति ने सोचा कदाचित अभी कोई आकर मेरे प्रश्न का उत्तर देगा क्योकि सन्तो के वचन अटल होते है परन्तु बहुत देर प्रतीक्षा करने पर भी वहां कोई उत्तर न मिला और निराश होकर वह जिज्ञासु वापस लौट आया। महात्मा जी के पास आ कर उसने कहा, ‘महात्मन ! मै आपकी आज्ञानुसार नदी पर गया था परन्तु वहा कौव्वे के जोडे के अतिरिक्त अन्य कुछ न दृष्टिगोचर हुआ।’
      महात्मा जी ने उत्तर दिया अच्छा ! कल फिर वही जाना तुम्हे प्रश्न का उत्तर वही मिलेगा।
      दूसरे दिन वह जिज्ञासु पुनः नदी पर गया। आज उसी वृक्ष पर बुगले का जोड़ा दिखाई दिया, अन्य कुछ नही। पहले दिन की भाँति अपने प्रशनोत्तर की प्रतीक्षा करता हुआ निराश लौट आया। पुनः महात्मा जी के पास जाकर कहा – ‘महाराज ! नदी पर आज मुझे फिर उत्तर ना मिला। हाँ एक वृक्ष पर बैठा एक बगूले का जोड़ा ही दिखाई दिया।’


      महात्मा जी मुसकराते हुए बोले, ‘तुम कल फिर जाना। तुम्हारे प्रश्न का उत्तर वही से ही मिलेगा।’

      दूसरे दिन जिज्ञासु फिर नदी पर गया। आज उसे वहाँ पर अन्य कुछ दिखाई न देकर केवल उसी वृक्ष पर राज हंसो की जोड़ी दिखाई दी जो उसी की ओर चोच उठाए ताक रही थी। आज भी उसे प्रतिदिन की भाँति उत्तर प्राप्त किये बिना ही लोट आना पड़ा। महात्मा जी के चरणो मे पहुँच कर उसने सारा वृत्तान्त कह सुनाया। महात्मा जी ने उसे अगले दिन फिर नदी पर जाने की आज्ञा दी।
      दूसरे दिन नदी पर पहुँच कर तो उसके आश्चर्य की सीमा ही नही रही। क्या देखता है कि आज एक स्त्री और पुरूष उसकी और बढ़े चले आ रहे है। समीप आकर उन दोनों ने जिज्ञासु के चरणो में सिर रखकर कहा ‘महाराज ! आप धन्य है, हमारा प्रणाम स्वीकार करे।’ जिज्ञासु की समझ कुछ काम न कर सकी। वह आश्चर्यचकित सा हुआ टकटकी लगा उन्हें ही निहारता रहा।
      तब दोनो बोले-महाराज ! आप विस्मित (हैरान) न हो। हम दोनो वही है जिन्हें आपने पहले दिन कौव्वे के जोडे के रुप मे देखा था, दूसरे दिन बगूले के रूप में तथा तीसरे दिन राजहंस के और आज मनुष्य के रूप मे देख रहे हो। यह सब सन्तो के दर्शन व उनके सत्संग का प्रताप है। पहले उस प्रताप आपके जीवन पर पड़ा और आपके द्वारा उस पुण्य भाग हमे भी प्राप्त हुआ। अतः आप हमे उन सन्तो महापुरूषो के दर्शन व पवित्र सत्सगं मे सम्मलित होने का सौभाग्य प्रदान करे। अब उसे अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था। जिज्ञासु उनकी यह बात सुनकर अति प्रभावित हुआ और उन्हे अपने साथ महापुरूपो के दर्शनार्थ ले आया।
      सारांश यह है कि सत्पुरूषो के उपदेश व उनके विलक्षण चरित्र किस प्रकार का प्रभाव डालते है – वह किसी से छिपा हुआ नही है। वे संसार में धर्म, नीति, भक्ति एवं प्रेम का आदर्श स्थापित करने के लिए आते है। उनके दर्शन तथा स्नेह भरी वाणियो में एक प्रकार का रूहानी प्रभाव होता है और जो कोई निष्काम भाव से सुधार करने वाले इन वचनो पर आचरण करता है उस के जीवन का सुधार होने मे देर नही लगती। साधु-संग मे काकवृत्ति वाले जीव भी अमृत वचन श्रवण कर तथा दिव्य दर्शन प्राप्त कर हंस-वृत्ति अर्थात भक्ति को प्राप्त कर लेते है। सन्तो की संगति से जीव के सिर से यम का त्रास तथा काल के क्लेश आदि सब दूर हो जाते है। इसी विषय पर रामायण मे भी कहा गया है कि –
।। चौपाई ।।
      प्रस्तुत चौपाई मे गोस्वामी तुलसीदास जी सन्त महिमा का वर्णन करते हुए कथन करते है कि सन्तो के सत्संग रूपी तीर्थ में स्नान करने का फल जीव को तत्क्षण ही प्राप्त हो जाता है। इस सत्संग रूपी प्रयागराज मे स्नान करने वाले, काकवृत्ति रखने वाले मनुष्य कोयल-वृत्ति धारण कर लेते है अर्थात उनके पवित्र वचनो को श्रवण करने से उन पर ऐसा प्रभाव पड़ता है कि वे कड़वे वचन बोलना छोड़ मधुर वाणी का उच्चारण करने लगते है तथा बगुलो जैसी वृति रखने वाले हंसो के समान परख दृष्टि प्राप्त कर लेते है। यह बात पढ कर अथवा सुन कर जनसाधारण आश्चर्य चकित न होने पाये क्योकि सन्तो महापुरूषो के विलक्षण प्रभाव उनकी संगति का अदभुत चमत्कार किसी से गोप्त (गुप्त) नही है। बाल्मीकी जैसे जोकि पहले डाकू थे साधु-संगति के प्रभाव से ही आदि कवि बने। यही एक ही प्रमाण कितना जाज्वल्यमान है हमारे सामने। इसलिए सन्तो के सत्संग व उनके सुन्दर मनोहर दर्शनो से लाभ प्राप्त करना इस मनुष्य का परम कर्ताव्य है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.