सन्तो व दुष्टो के लक्षण

   

   

       सन्त जन तो बड़े दयालु होते है । उनके लिए निन्दा और स्तुति दोनों एक समान है । वे न तो अपनी निन्दा पर दुःखी होते है और न ही अपनी प्रशंसा सुन कर हर्षित होते है, वे तो अपने इष्टदेव के चरणों मे दृढ़ प्रीती रखते है । वे सदैव दूसरो के हित मे कार्य करते है और कल्याण मार्ग दर्शाते है । अब दुष्टजनो के लक्षण भी सुनो –
      दुष्ट लोग हमेशा दूसरो से ईष्या करते है । दुष्टो के हदय दूसरो की सम्पत्ति व सुख को देखकर सदैव ईष्यावश जलते रहते है तथा जब कही किसी की निंदा या बुराई सुनते है तो इस सीमा तक प्रसन्नचित्त हो जाते है मानो मार्ग मे जाते हुए अपार धन का खजाना हाथ लगा हो । वे काम, क्रोधादि पांचो चोरो के अधीन होते है तथा निर्दयी, दिल में कपट भरा होता है । अकारण सबसे ईर्ष्या द्वेष रखते है और हर समय दूसरो का अपमान करने में प्रयत्नशील रहते है । इसके अतिरिक्त जो उनके साथ भलाई का व्यवहार करे, तो उन्हें भी भलाई का प्रतिकार बुराई रूप मे देते है । 

      ऐसे दुष्टजनो का हदय इस प्रकार कठोर होता है । जिस प्रकार की मोर । यद्यपि मोर कितनी सुन्दर आवाज मे बोलता है किन्तु उसका आहार कितना अभद्र है कि वह विषैले सांप तक को खा जाता है । इसी प्रकार दुष्टजन भी ऊपर से बहुत मीठे मीठे वचन बोलते है लेकिन उनके मलिन अन्तःकरण मे दूसरो के लिए बुराई ही भरी होती है । 
     निम्नलिखित दृष्टान्त मे सन्त व दुष्टजनों के लक्षणो का सजीव प्रतिरूप दर्शाया गया है –
      एक बार किसी नगर के राजा ने यज्ञ करवाया जिसमे समस्त ऋषि-मुनि जन व ब्राह्मणो के अतिरिक्त स्वनाम धन्य भक्त जयदेव जी (जो कि किन्ही पूर्ण ब्रह्मदर्शी महापुरूष के सच्चे सेवक व प्रेम-भक्ति के विचारो से भरपूर थे) भी सम्मिलित हुए । यज्ञ समाप्त होने पर राजा साहब ने यथायोग्य सबको दक्षिणा रूप मे बहुत बहुत भेंट दी । भक्त जयदेव जी को भी कुछ गौये भेंट रुप मे मिली थी जिन्हे लेकर वह अपने घर की और जा रहे थे । चलते-चलते उनको मार्ग में किसी निर्जन वन में से होकर गुजरना पड़ा । अभी उस विरान वन के भीतर यह कुछ कदम ही रख पाये थे कि एकाएक चार चोर इनके सामने आ खड़े हुए और गरज कर बोले – तेरे पास जो कुछ है चुपचाप यहाँ धर दे नही तो तुझे मार देगे ।   
       प्रत्युत्तर मे भक्त जी ने नम्रता से कहा – भाईयो ! मेरे पास तो केवल ये गौएँ है आप इन्हे ले लो । इतना कहकर प्रसन्नतापूर्वक गौएँ चोरो को समर्पित कर भक्त जी घर की तरफ जाने के लिए कदम बढ़ाने लगे ।   
      गौएँ लेने के पश्चात चोरों के मन मे यह विचार आया कि कदाचित् हमारा भेद न खुल जाए । ऐसा विचार मन मे आते ही उन्होने पुनः भक्त जयदेव को जा पकड़ा और उनके दोनों हाथ काटकर कुएँ मे फेंक दिया । कुएँ में गिरकर भी जयदेव जी भजनाभ्यास मे लीन हो रहे । यद्यपि चोरो न तो इसी विचार से उन्हे कूप मे फैंका था कि क्षुधा से पीडित होकर ये मर जायेगे, परन्तु ईश्वर के आगे किसका बल चल सकता है । सत्य ही तो है –  
      जिस कूप मे चोरो ने भक्त जी को अपाहिज कर फैका था, देवयोग से उस देश का राजा अपने सैन्य दल बल सहित उसी और आ निकला । गर्मी के दिन थे जिस कारण सभी प्यास से व्याकुल हुए जा रहे थे । कूप को देखकर राजा साहब वही कही एक सघन वृक्ष की छाया में विश्राम हेतु बैठ गये और किसी कर्मचारी को पानी लाने का आदेश दिया । आज्ञा पाकर कर्मचारी कुएँ पर गया और डोल के साथ रस्सी बाँधकर उसे कुएँ मे लटकाया । जैसे ही कुएँ मे डोल गया तत्क्षण उस डोल के साथ भक्त जयदेव जी चिपट गये । इधर जब वह कर्मचारी रस्सी ऊपर की और खींचने लगा तो उसे ज्यादा भार अनुभव हुआ । जिससे पहले तो वह भयभीत हो गया । मन मे सोचने लगा – न मालूम कौन सी बला है जिसने डोल को बलपूर्वक पकड़ लिया है । पुनः कुछ देर बाद हदय मे साहस बटोर कर जब कुएँ मे झांककर देखा तो ज्ञात हुआ कि इसमे तो कोई मनुष्य ही गिरा पड़ा है । तत्पश्चात उससे पूछा और फिर उसे कुएँ से बाहर निकाल कर राजा साहब के पास ले आया ।
      राजा साहब ने जब भक्त जयदेव जी से कुएँ मे गिरने का कारण पूछा तो भक्त ने उत्तर दिया –

      अर्थात् महाराज ! जो कुछ मेरी किस्मत मे लिखा है वही मुझे कर्मानुसार मिल रहा है क्योकि संसार मे कोई भी जीव किसी को सुख दुःख नही देता यह सब अपने ही किये कर्मो का फल है । कदाचित् मेरी इसी मे भलाई निहित होगी ।  
      राजा साहब उनकी यह बात सोचने लगे कि यह सज्जन श्रेष्ठ विचारों का व संत्सगी प्रतीत होता है । इनके उच्च विचारों से प्रभावित हो राजा साहब इन्हे अपने साथ महल मे ले आये । भक्त जयदेव जी अब वही रहने लगे । नियमानुसार नित्यप्रति उठकर भजनाभ्यास कर अपने इष्टदेव सन्त सतगुरू जी पूजन-आराधन के पश्चात राजा साहब के साथ सत्संग-वार्ता करते और कहते की समस्त योनियो मे एक मनुष्य जन्म ही ऐसा उत्तम जन्म है जिसमे की प्रभु नाम का सुमिरण कर मालिक का साक्षात्कार किया जा सकता है ।   
      जयदेव जी से इस प्रकार की प्रेम भक्ति की बातें सुन सुन कर राजा साहब अपने अन्तःकरण में एक प्रकार के दिव्यानन्द की अनुभूति करते । अब उनके हदय मे भी सच्चे आनन्द की प्राप्ति का साधन जानने की प्रबल इच्छा जाग्रत होने लगी । उन्होने जयदेव जी से पूछा – ‘मानव जन्म के कल्याण की आप कोई युक्ति बता सकते है ?’
      जयदेव जी ने प्रत्युत्तर में कहा – हाँ महाराज ! आप सन्त महापुरूषो का सत्संग प्राप्त किया करे और एक ऐसा सत्संग भवन निर्मित करवाये जहाँ सन्त महात्मा जन आये और निरन्तर सत्संग प्रवाह चला करे ऐसा करने से आपको आत्मा के कल्याण का संयोग प्राप्त हो सकता है । 

      भक्त जी के कहने पर राजा ने एक सत्संग भवन बनवाया जिससे सत्संग भवन बनने की चर्चा देश विदेश मे विख्यात हो गई और चलते फिरते जंगम रूप प्रयागराज अर्थात् सन्त महात्मा नित्यप्रति वहाँ आने लगे । अब वहां का समस्त समाज मंगलमय हो गया । सत्संग की त्रिवेणी बहने लगी जिसमे भाग्यशाली आत्माएँ मज्जन कर अपने मानव जन्म का कल्याण करने लगी ।   
      इस सत्संग का समस्त कार्यक्रम भक्त जयदेव जी के नेतृत्व मे ही होता था । अनेको जिज्ञासु सत्संग श्रवण करने हेतु आने लगे और श्रद्धा के पुष्प भी चढ़ाने लगे । सन्त महात्माओ की तन-मन-धन से सेवा करते । इस सत्संग की महिमा चन्दन की सुगन्ध की न्यायी दूर-दूर देशों तक फैल गई । 
      उधर वह चारो चोर जिन्होंने की भक्त जयदेव जी के हाथ कटवाकर कुएँ मे डाल दिया था वे चोरी करके अपना निर्वाह किया करते थे । समय बदलते देर नही लगती । धीरे धीरे उनका समूचा धन समाप्त हो गया और अब वह काफी निर्धन हो चुके थे । जब यह चर्चा उनके कानों मे पहुँची कि अमुक राजा के सत्संग भवन मे सन्त जनों की बहुत धन-धान्य से सेवा होती है । सो धन पाने के लालच से इन चारों चोरो ने साधु-वेष धारण किया और सत्संग भवन में ज्यों ही पहुँचे त्यो ही उन्होने सामने बैठे भक्त जयदेव जी को पहचान लिया जिससे ये चारो बहुत घबराए ।
       इधर भक्त जी ने इन्हे पहचान तो लिया लेकिन अपनी उदारवृति के होने से उनके साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया कि उनको अपनी कृत्ति की कोई भी बात खटकने न पाये । जैसे कहा भी है –    
।। दोहा ।।
भलियन से भला करे, यह जग का व्यवहार ।
बुरियन से भला करे, ते विरले संसार ।।

।। चौपाई ।।
उमा सन्त की यह बड़ाई
       मन्द करे वो करै भलाई ।।

      कुछ दिन वहाँ रहकर जब चारों साधु रूप चोरो ने विदाई ली तो भक्त जी ने राजा साहब से कह कर इन चारों को बहुत धनमाल दिलवाया । इसके अतिरिक्त उनके साथ कुछ व्यक्ति भेजे, उन्हे कहा कि इनका सामान इनके आश्रम तक पहुँचा दो जिससे मार्ग मे इन्हे किसी प्रकार का कष्ट न होने पाए ।

      वहाँ से जब वे चारो चोर और राजकर्मचारी आदि चले तो मार्ग मे उन नौकरो ने उनसे पूछा – ‘क्या कारण है जो भक्त जी ने आपकी इतनी आवभक्त की ?’ यह सुन चोरो ने कहा – ‘भाई ! क्या पूछते हो – इसमे एक गम्भीर रहस्य निहित है । वो यह कि सत्संग-मण्डली मे जो सबसे बड़े भक्त जी प्रबन्धक बने बैठे है वह व्यक्ति पक्का चोर है । एक बार इसने कही चोरी की जिससे वह पकड़ा गया । चोरी के अभियोग मे वहाँ के राजा ने इन्हे फाँसी का हुक्म सुना दिया । दैवयोग से हम चारों वहाँ पहुँच गये तो हमारे बहुत कुछ कहने पर राजा ने फाँसी न देकर दण्ड रूप मे इसके हाथ कटवा दिये । इसी उपकार के कारण आज इसने हमारी इतनी सेवा की है ।’ 

      चोरो के मुँह से भक्त जी के विरूद्ध इतनी बात निकलनी ही थी कि एकाएक धमाके के स्वर से वहाँ की धरती फट गई और वे चारो उसमें धँस गये । धरती भी पापियो का भार न सहन कर पाई । फलतः उसने चारों पापियो को अपने भीतर समाहित कर लिया । यह अनोखी घटना नौकरो की समझ मे न आई । आखिर वे धन-माल सहित वापस लौट आये और सारी घटना अक्षरशः राजा साहब एवं भक्त जी को कह सुनाई । 

      इस घटना को सुनकर जैसे ही भक्त जयदेव जी अपनी कटी हुई दोनों भुजाओ को मिलाकर अफसोस करने लगे कि तत्क्षण भगवत्कृपा से उनके हाथ पूर्ववत् ठीक हो गये । ऐसी अनोखी घटना देखकर राजा साहब के आश्चर्य की सीमा न रही । भक्त जी से उन्होने पूछा – ‘भक्त जी क्या कारण है ? पहले तो आपके हाथ न थे इसी क्षण देखते ही देखते आपके हाथ प्रकट हो गए ।’ 

      इतना सुनकर पहले तो भक्त जी बहुत आनाकानी करते रहे परन्तु राजा साहब के विवश करने पर इन्होने बताया कि इन चारो (वेष धारी साधु) चोरों से मैने पहले भी भलाई की थी और अब भी परन्तु उन्होंने अपने कुटिल स्वभाव के अनुसार मुझ पर लाँछन लगाए । उनका यह अप्रिय कार्य कुदरत को मन्जूर न हुआ तभी एकाएक धरती फट गई और वे उसमें समा गए । अतएव प्राणिमात्र को चाहिए कि प्रत्येक के साथ छ्ल-कपट रहित व्यवहार करे ।

      इतनी वार्ता सुनकर राजा साहब भक्त जी के चरणों पर गिर कर कहने लगे – आप इतने महान् पुरूष है यह मै आज ही जान सका । अतः मै आपको ही अपना पथ-प्रदर्शक बनाऊँगा । इतना कहकर राजा साहब भक्त जी के आगे नतमस्तक हो गये और उनसे सच्चे नाम की दीक्षा ली । शनैः शनैः नियमानुसार नित्यप्रति भजनाभ्यास करके व सत्पुरूषो की संगति से राजा साहब अपना जन्म उज्जवल कर गये । 

      इस दृष्टान्त को पढ़कर पाठक गण भलीभाँति परिचित हो गए होगे कि सन्त जन व दुष्टजनो मे कितना महान् अन्तर पाया जाता है ।

      महापुरूषो ने सन्तो एवं दुष्ट जनों की कुल्हाड़ी और चन्दन से तुलना की है । जैसे कुल्हाड़ी व चन्दन का परस्पर आचरण (व्यवहार) होता है । ऐ तात् ! कुल्हाड़ी अपने स्वभावनुसार चन्दन को काटती है तो दूसरी तरफ चन्दन भी अपनी प्रकृति अनुसार उसे अपना गुण देकर अर्थात् सुगन्धि प्रदान कर कुल्हाड़ी को सुवासित बना देता है । इसी श्रेष्ठ गुण के कारण ही चन्दन देवताओ के सीस पर सुशोभित होता है और समूचे जगत् का भी प्रिय बना हुआ है । इसके विपरीत कुल्हाड़ी के मुख को यह दण्ड मिलता है कि लुहार उसको आग मे जलाकर ऊपर से घन द्वारा प्रताडित करता है ।          

Leave a Reply

Your email address will not be published.