सच्चा सौदा खरीदे

      विधाता द्वारा रचित जितनी भी यह द्वन्द्वमयी सृष्टि है इसमे प्रत्येक वस्तु के भण्डार भरे पड़े है। यह तो जीव की अपनी रूचि है कि चाहे वह किसी भी वस्तु को अपनाए। जहाँ पर इसमे माया की झिलमिलाहट दृष्टिगोचर होती है। वहाँ पर भक्ति का अमृत फल भी इसी संसार रूपी बाजार से उपलब्ध होता है। इसलिए विचारवान् तथा ज्ञानवान् सज्जन माया के भम्र मे न पड़कर भक्ति की ही इच्छा रखते है जिसका परिणाम यह होता है कि उस मनुष्य को भक्ति की प्राप्ति होने पर किसी वस्तु की कमी नही रह जाती। जैसा कि इस कहानी से स्पष्ट है –
      किसी देश मे एक धर्मात्मा राजा रहता था। यद्यपि उसे सब सुख ऐश्वर्य उपलब्ध थे परन्तु विधाता के खेल निराले होते है – कि उसकी गोद सूनी थी। वह सन्तान का मुख देखने के लिए बहुत लालायित रहता था। इसलिए उसके मन मे यह धारणा कर रखी थी कि जिस दिन मेरे घर मे सन्तान होगी तब मै उस खुशी मे अपनी समस्त प्रजा को पुरस्कार दूँगा। समय अनुसार भगवान् सब की मनोकामना पूर्ण कर देते है।  
      अन्ततः विधाता ने उसकी यह पुकार सुन ली अर्थात् राजा के घर मे पुत्र ने जन्म लिया। अपने प्रण के अनुसार राजा ने अपनी प्रजा को प्रसन्न करने के लिए यह योजना बनाई।
      एक मैदान मे बड़ा भारी बाजार लगवाया और उसमे हर प्रकार की विलासिता के सामानों की अनेकों दुकानें सजवा दी। खाने-पीने के भाँति भाँति के पकवान, सुख-भोग के विविध साधन, सब प्रकार के घटिया बढ़िया वस्त्र, धन सम्पत्ति के अम्बार, हीरे जवाहरात और अनयान्य सब प्रकार की वस्तुएँ इस बाजार मे करीने से लगवा दी गई कि साधारण से साधारण और ऊँचे से ऊँचे दर्जे की ऐसी कोई वस्तु शेष न रही, जो कि इस बाजार मे न हो।    
      तदुपरान्त सारे नगर मे यह घोषित करवा दिया गया कि इस बाजार मे आने वाले प्रत्येक मनुष्य को केवल आज के लिए ही यह छूट दी जाती है कि वह जिस वस्तु को एक बार छू लेगा, वही उसे बिना मूल्य प्राप्त हो जायेगी। राजा का ऐसा अनोखा विचार सुन कर दर्शको के समूह के समूह उस बाजार मे आने लगे और उन अनेक पदार्थो में से अपनी रूचि की चीजे खोजने लगे, क्योकि एक ही दिन एक ही बार एक वस्तु को छूने कि छूट दी गई थी। इसलिए उसकी प्रजा ने शीघ्रता से अपनी रूचि की वस्तु को छूना शुरू कर दिया। मूल्य देने का तो वहाँ प्रश्न ही न था। वहाँ तो केवल छूने की ही देर थी की वस्तु अपनी हो जाती। लोगों ने इस सुनहरे अवसर का अपनी इच्छानुसार लाभ उठाना शुरू किया। भाव यह कि जैसी जैसी जिसकी इच्छा थी, वह वहीं वस्तु ले जाने लगा। किसी प्रकार की रोकथाम तो थी नही। राजा साहब भी उसी बाजार मे एक ऊँचे स्थान पर बहुमुल्य सिंहासन पर विराजमान् होकर यह सब कौतुक अपनी आँखो से देख रहे थे।     
                                         
      जब इसी प्रकार लोग भाँति भाँति के सामान उठाते जा रहे थे, तभी एक मनुष्य जो कि बुद्धिमान और विचारवानों की संगति मे बैठने वाला था, वहाँ आया, बाजार की चहल-पहल और सुन्दरता को देखकर आश्चर्य चकित हुआ, लोगो से पूछा – यह क्या मामला है? अनेको बढ़िया दुकानें सजी हुई है और अनेको सामान ले जाने वाले ग्राहक है, परन्तु मूल्य देने वाला दुकानदार कोई नही? उसके ऐसा पूछने पर लोगों ने राजा की घोषणा का वृत्तान्त कह सुनाया और उससे भी कहा कि वह भी इच्छानुसार एक वस्तु को छू ले। परन्तु यह नया व्यक्ति भावुक न था, प्रत्युत गम्भीर स्वाभाव का था। वह बाजार मे घूम फिर कर सब कौतुक देखता रहा तथा प्रत्येक वस्तु का परीक्षण (देखभाल) कर उस पर सोचता और विचार करता रहा। इस प्रकार काफी देर तक प्रत्येक वस्तु के परिणाम को सोचकर कि इन वस्तुओ के लेने से क्या लाभ होगा? मिलनी तो केवल एक बार हाथ लगाने से एक ही वस्तु है और वह वस्तु कब तक मेरे काम आयेगी। मै ऐसा कार्य क्यो न करूँ, जिससे मुझे अधिक से अधिक लाभ प्राप्त हो। अतएव इन वस्तुओ के मालिक (राजा) को ही क्यो न छू लूँ, जिनके छू लेने से सब पदार्थ स्वयमेव मेरे अधीकृत हो जायेगे। अपने मन मे यह विचार दृढ़ करके वह उसी दिशा की और बढ़ चल, जिधर कि स्वयं राजा एक ऊँचे स्थान पर रत्न जड़ित सिंहासन पर विराजमान थे। सारे जन समुह को चीरता हुआ वह विचारवान् मनुष्य राजसिंहासन के समीप पहुँचने ही वाला था कि कुछ राजकर्मचारियो ने आगे बढ़ने से रोकना चाहा। इस पर उस बुद्धिमान मनुष्य ने कहा कि – आज के दिन तुम मुझे नही रोक सकते, क्योकि आज के दिन राजा साहब ने स्वतंत्रता  दे रखी है, इसलिए तुम मुझे राजा साहब के पास जाने दो।    
      राजा साहब जो निकट बैठे हुए यह सब वार्त्ता सुन रहे थे, उन्होंने इस मनुष्य को अपने पास आने की आज्ञा दी। तब वह मनुष्य राजा के निकट जा पहुँचा और बड़े आदर से प्रणाम करके राजा के चरण पकड़ लिये। तब राजा ने उससे पूछा – कहो भाई! क्या चाहते हो?   
      वह बोला – श्री मान! बस अब और क्या चाहिए। जिस वस्तु की इच्छा थी, सो तो मिल गई। अब और किसी चीज की इच्छा नही।    
      राजा उसकी यह बात सुनकर चकित हुए और पूछने लगे – ‘क्या बात है? हमारी समझ मे नही आई।’
      तब उस व्यक्ति ने हाथ बाँधकर विनय कि – ‘महाराज! आपने यह घोषणा की थी कि आज के दिन इस बाजार मे किसी चीज को जो कोई छू ले, वह बिना मूल्य उसी की ही हो जायेगी। यह सुन कर मै पर्याप्त समय तक विचारता रहा। मैने सोचा कि जिस चीज को भी हाथ लगा दूँ, वह अपनी हो जायेगी, तब मैने प्रत्येक वस्तु की वास्तविकता पर विचार किया, तो ज्ञात हुआ कि यह सब सामान अल्पज्ञ (क्षणभंगुर) है। जब कि किसी वस्तु को स्पर्श कर अपना बना सकते है, तब मै क्यो न इन सामानो के मालिक अर्थात् राजा साहब को ही छू लूँ और जब वह मेरे हो जायेगे तो फिर मे अपने आप ही इन सामानों को प्राप्त कर लूँगा। इसलिए खूब विचार कर मैने अपना निर्णय स्थिर किया एवं आपके चरणों मे उपस्थित होकर आपके चरणों को स्पर्श कर लिया है। अब तो आप मेरे हो गये है।’    
      उनकी ऐसी रोचक व रसीली बात सुनकर स्वयं राजा तथा अमीर वजीरों ने उसकी विलक्षण बुद्धि की भूरि-भूरि प्रशंसा की। इसके पश्चात राजा साहब ने उसे अपने राज प्रसाद मे ही रख लिया। वह व्यक्ति भी पूर्णतया सच्चाई से व्यवहार करता रहा। यद्यपि अपनी अनूठी प्रतिभा द्वारा उसने सम्राट के हदय में पूर्व ही स्थान बना लिया था। अब प्रत्येक राजकीय कार्यो मे अत्यन्त निपुण देखकर राजा साहब उस पर हार्दिक प्रसन्न रहते। यहाँ तक की राज-काज के प्रत्येक कार्य में उस से परामर्श लेते। इस प्रकार वह विचारवान् व्यक्ति देश सम्राट के विश्वास व प्रसन्नता का पात्र बन गया। समय बीतते देर नही लगती, धीरे-धीरे राजा साहब को वृद्धावस्था ने आ घेरा। वृद्ध होने के नाते अब वे असमर्थ थे, साथ ही भगवद् परायण होने के कारण उन्हें अब उपरामता भी हो गई थी। इसलिए इसे हर प्रकार से शासकीय विधान मे सुयोग्य व पारगंत जान राजा साहब ने राजपाट का कार्य इस व्यक्ति को सौंप दिया और अपने औरस (सगे) पुत्र को जो कि अभी छोटा था, इसके संरक्षण मे छोड़ स्वयं भजनाभ्यास के लिए वन में चले गये।  
      तात्पर्य यह है कि इस संसार को सत्पुरूषो ने एक बाजार से तुलना दी है। सब लोग इस संसार मे से सौदा खरीद रहे है। कोई स्त्री पुत्र के मोह का सामान खरीद कर रहा है तो कोई इज्जत, मान, बड़ाई का और कोई धन-दौलत ही अर्जित करने का व्यापार कर रहा है। भाव यह की सभी प्राणी अपने अपने विचारानुसार इस बाजार मे सौदा कर रहे है। परन्तु जो जगी हुई आत्माएँ होती है, जिनके पूर्व संचित संस्कार उत्तम व श्रेष्ठ होते है, वे इस संसार रूपी बाजार मे सत् वस्तु का ही व्यापार कर वास्तविक सौदा खरीदते है। जैसे महापुरूषो की वाणियो से स्पष्ट होता है –
।। दोहा ।।
                        

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