सच्चा सुख कहाँ है ?

       हम अमीर होगे या नहीं, चुनाव जीतेंगे या नहीं इसमें शंका हो सकती है परंतु ! हम मरेंगे या नहीं, इसमें कोई शंका नही है? यह तो हमारे सिर पर जन्मजात ही सवार है । तुम 
 
 “पढ़ते क्यों हो ?”
“पास होने के लिए।”
“पास क्यों होना है ?!”
“प्रमाणपत्र पाने के लिए।”
“प्रमाणपत्र क्यों चाहिए ?”
“नौकरी के लिए।”
“नौकरी क्यों चाहिए ?”
“पैसे कमाने के लिए।”
“पैसे क्यों चाहते हो ?”
“खाने के लिए।”
“खाने क्यों चाहते  हो ?”
“जीने के लिए।”
“जीना क्यों चाहते हो ?”
“…………….”
      कोई जवाब नही । कोई ज्यादा चतुर होगा तो बोलेगाः “मरने के लिए ।” अगर मरना ही है तो केवल एक छोटी सी सुई भी काफी है । मरने के लिए इतनी सारी मजदूरी करने की आवश्यकता नहीं है । वास्तव में हर जीव की मेहनत है स्वतन्त्रता के लिए, शाश्वतता के लिए, मुक्ति के लिए । मुक्ति तब मिलती है जब जीव रागरहित होता है ।
      राग ही आदमी को बेईमान बना देता है, राग ही धोखेबाज बना देता है, राग ही चिन्तित बना देता है, राग ही कर्मों के बन्धन में ले आता है । रागरहित होते ही तुम्हारी हाजिरी मात्र से जो होना चाहिए वह होने लगेगा, जो नहीं होना चाहिए वह रूक जाएगा । रागरहित पुरूष के निकट हम बैठते हैं तो हमारे लोभ, मोह, काम, अहंकार शान्त होने लगते हैं, प्रेम, आनन्द, उत्साह, ईश्वर-प्राप्ति के भाव जगने लग जाते हैं । उनकी हाजरी मात्र से हमारे हृदय में जो होना चाहिए वह होने लगता है, जो नहीं होना चाहिए वह नहीं होता ।
      राग रहित होना माने परम खजाना पाना। रागरहित होना माने ईश्वर होना। रागरहित होना माने ब्रह्म होना।
      आजकल तो सब दरिद्र मिलते है। धन तो है लेकिन दिल में शान्ति नहीं है। सत्ता तो है लेकिन भीतर रस नहीं है। धन होते हुए हृदय में शान्ति नहीं है…..  वे कंजूस, धन के गुलाम, धन में राग वाले, सत्ता में राग वाले, परिवार में रागवाले सफल दरिद्र हैं। इन चीजों को बटोरकर सुखी हो जाना चाहते हैं वे मूर्ख हैं।

       प्रत्येक मनुष्य कोई न कोई चिन्ता करता ही रहता है । और प्राकृतिक नियमानुसार जिस वस्तु का चिन्तन किया जाता है । उसकी उपलब्धि भी हो जाती है । अब विचार यह करना है कि किस वस्तु का चिन्तन किया जाये, किस से सुख की प्राप्ति होगी और कौन सी वस्तु आनन्द दायक है । कौन सी वस्तु सुखदायी है और कौन सी दुःखदायी ? इसे हम आपको दृष्टान्त के माध्यम से समझाते है ।
      एक बार बैकुण्ठ धाम मे विष्णु भगवान शेषनाग की शय्या पर विश्राम कर रहे थे और लक्ष्मी जी उनके चरण दबा रही थी । चरणों की सेवा करते करते उनकी दृष्टि संसार के जीवों की दुःखी अवस्था पर जा पड़ी । कोई तन से दुःखी तो कोई मन और कोई बेचारे उदरपूर्ति के कारण दर-दर भटक कर परेशान हो रहे है । संसारी जीवों की ऐसी दीन दशा देखकर लक्ष्मी जी को अति करूणा हो आई और गहरी सोच मे पड़ गई ।
      भगवान तो प्रत्येक की पल पल मे परिवर्तित होने वाली मन स्थिति को जानते है । उन्होने मुस्कुराते हुए लक्ष्मी जी से पूछा कि तुम इस समय क्या सोच रही हो ? लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया – ‘हे प्रभु ! आप सबके रक्षक हो, आपके भण्डार मे किसी भी वस्तु का अभाव नही, आप ही सभी के दाता व पालनहार है । परन्तु फिर भी सांसारी जीव दुःखी क्यो है ? आप उनको उनकी इच्छा के अनुसार मनोवांछित पदार्थ देकर उनके दुःख दूर क्यो नही कर देते ?’ भगवान विष्णु बोले – ‘तुम्हारा जीवों के प्रति अति स्नेह प्रतीत होता है और होना भी चाहिये; क्योकि जगत माता जो कहलाती हो । माता को बच्चो के साथ स्नेह होना स्वाभाविक बात है, इसलिए तुम उनका दुःख दूर करने की चेष्टा करो । हम तुम्हे युक्ति बतलाते है ।’ 
      विष्णु भगवान ने लक्ष्मी जी को एक बर्तन देते हुए कहा कि इसके भीतर सब कुछ भरा हुआ है । इसमे से प्रत्येक इच्छा पूरी हो सकती है । तुम इसे लेकर सब के पास जाओ और जो कोई कुछ भी माँगे निकाल कर दे दो । इस बर्तन मे से संसार का कोई भी ऐसा पदार्थ नही जो प्राप्त न हो सके । इतना कहकर प्रभु ने बर्तन लक्ष्मी जी को सौंप दिया, परन्तु बर्तन मे से एक वस्तु निकाल कर अपने चरणों के नीचे छिपा ली ।
      लक्ष्मी जी उस बर्तन को लेकर सब जीवों के पास गई । वह मन ही मन प्रसन्न हो रही थी कि आज तो मेरे बड़े उत्तम भाग्य उदित हुए जो अब तो विश्व के सभी जीवों को मै सुखी बनाने मे सफल हो जाऊँगी । उन्होने एक-एक के पास जाकर मुँह माँगी वस्तु उन्हे निकाल निकालकर दी । किसी ने धन-माल, स्त्री, पुत्र, इज्जत, महल इत्यादि अपनी इच्छानुसार पदार्थ प्राप्त किये । लक्ष्मी जी निःसंकोच सब की मनोकामनाओ को पूर्ण करती गई । किन्तु सब कुछ देने पर भी जब उनकी अन्दरूनी हालत देखी व जब उनसे पूछा गया तो विदित हुआ कि वे लोग पहले से भी अधिक दुःखी व गमगीन है । परेशान और कष्ट क्लेशों से ही पीडित है । यह देख लक्ष्मी जी असमंजस मे पड़ गई कि उनकी मांग पूर्ण कर देने पर भी वे दुःखी है, इसका कारण क्या है ? कुछ देर सोचने के पश्चात उन्हे स्मरण हो आया कि प्रभु ने इस बर्तन को देते समय इसमे से कोई वस्तु निकाल ली थी । ऐसा लगता है कि सच्चा सुख व वास्तविक खुशी देने वाली वस्तु वही होगी । जिससे जीवों की पूर्ति व उन्हे सुख-शान्ति की उपलब्धि हो सकती है । इस बात का समाधान प्रभु से ही करवाना चाहिए ।
      लक्ष्मी जी लौटकर भगवान के पास आई । प्रभु ने पूछा – क्यो लक्ष्मी ! अब तो सारी सृष्टि प्रसन्न हो गई होगी । प्रत्युत्तर मे लक्ष्मी जी ने विनय की – ‘प्रभु! सब जीवों को उनकी इच्छानुसार सब पदार्थ देने पर भी वे दुःखी और परेशान है । इससे यह विदित होता है कि सुख देने वाली जो असली वस्तु थी, वह आपने इस बर्तन मे से पहले ही निकाल कर श्री चरणों के नीचे रख ली थी ।’ भगवान विष्णु मुसकराकर बोले बोले – ‘लक्ष्मी! अगर इन पदार्थो से मनुष्य को सुख मिलता तो संसार मे कोई भी व्यक्ति दुःखी दिखाई नही देता । इन पदार्थो मे सुख कहाँ ? सुख तो केवल मेरे चरणों की भक्ति मे है । जो जीव भक्ति की इच्छा करते है, उन्हें ही यह प्राप्त हो सकती है और वे ही सच्चे सुख के अधिकारी बन सकते है । शेष संसार के धन-ऐश्वर्य एवं पदार्थो की इच्छा रखने वाले व्यक्ति सच्चे सुख की प्राप्ति कदापि नही कर सकते ।’

      दिन रात मनुष्य का तन और मन दोनों ही क्रियाशील रहते है परन्तु स्थायी सुख को हस्तगत नही कर पाते । इसका मूल कारण यह है कि वे सुख देने वाली मालिक की भक्ति को पाने की चेष्टा नही करते । इसीलिए महापुरूष बार-बार जीव को चेतावनी देते है कि तू अपने समय की कदर करके अपने कर्त्तव्य की पहचान कर अथवा मालिक की भक्ति कर । अपने असली धन को एकत्र कर, उससे वंचित रहकर दुःखी व कंगाल मत हो । जैसे परम सन्त श्री कबीर साहिब जी ने फरमाया है –


                                     

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