संस्कृत रक्षक- समर्थ गुरू रामदास

      भारतीय इतिहास संस्कृति राष्ट्रसंतो, महाऋषियो, की अवतरी भूमि रही है। अवतारी चेतनाएँ पावन भूमि भारत मे आती है ओर अपना कार्य पूर्ण कर चली जाती है। इन्ही अवतारी चेतना में राष्ट्रसंत समर्थ गुरू रामदास है जिन्होंने राष्ट्र एवं भारतीय संस्कृति के रक्षार्थ अपने को होम दिया ओर सशक्त राष्ट्र रक्षक शिवा जैसे शिष्य को दीक्षित कर राष्ट्र को समर्पित किया।

      समर्थ गुरू रामदास की सबसे अधिक महत्ता इसी कारण मानी जाती है कि जहाँ अन्य सन्त-महात्माओ ने अधिकतर धर्म, उपासना, भजन, नीति ओर चरित्र का उपदेश दिया, वहाँ इन्होने जनता को देश, जाति, समाज की रक्षा के लिए विशेष रूप से प्रेरणा दी। वैसे तो उन्होने उत्तर भारत ओर मध्य भारत भे भी काम किया, पर महाराष्ट्र के गाँव-गाँव मे उन्होने ऐसी जागृति का मंत्र फूँका ओर संगठन कार्य किया कि उस प्रदेश की काया पलट ही हो गई। उस विदेशी पराधीनता के अंधकार भरे युग मे, अधिकांश भारतीय जनता भयभीत ओर निराश बनी हुई थी। महाराष्ट्र मे श्री समर्थ गुरू ने राष्ट्रीय चेतना जाग्रत कर दी। यही कारण है कि महाराष्ट्र में शिवाजी ने राष्ट्रीयता का झड़ा गाड़ दिया। विदेशी शासक को ऐसा जोरदार धक्का लगा की उसकी सारी जड़े हिल गई।
      श्री समर्थ गुरू के उपदेशो और प्रचार-कार्य का ही पुण्य प्रभाव आम जनता पर ऐसा पड़ा की समस्त जनता समझ गई कि राष्ट्र व संस्कृति की रक्षा छत्रपति शिवाजी ही कर सकते है। समर्थ गुरू का मुख्य उद्देश्य अपने राष्ट्र को सशक्त ओर सुदरढ़ बनाना थ, इसिलिए उन्होने धर्म के साथ लोगो को राजनीति का भी उपदेश दिया। उनके कठोर तप एवं ब्रहमचर्य के बल ने उन्हें कुशाग्र बुद्धि ओर पेनी दृष्टि प्रदान की थी जिसके बल पर उन्होने देखा की भारतीय शासक शाक्तिशाली ओर रणकुशल होते हुए भी विदेशियो की कूटनीति ओर छल-बल की राजनीति के कारण हार गए है। पिछले इतिहास की समीक्षा पर उन्होंने पाया की मुसलमान आक्रमणकारियो ने सर्व प्रथम भारतीय नरेशो मे फूट उत्पन्न करके ओर भीतर घुसकर ही इस देश मे अपना कदम जमाया था। भारत के पराक्रमी ओर रण-कुशल शासक यदि शत्रुओ की कुटिल चालो का आशय समझकर उसका मुकाबला करते तो सभी आक्रमणकारी शासक बनने के बदले मैदान मे धूल चाटते दिखाई देते। तब इतिहास के पन्नो पर कुछ ओर ही अंकित हुआ होता।

      समर्थ गुरू रामदास बारह वर्ष की उम्र मे होने वाले विवाह-मण्डप से अपनी माता की अभिलाषा को भंग करके भाग खड़े हुए। इससे वह बडी दुखी हुई ओर पुत्र-वियोग से रोते-रोते अंधी हो गई। समर्थ गुरू रामदास को भी उसका ध्यान था, पर कर्तव्य-पालन आड़े आता था। वे लगभग चौबीस वर्ष तक घर नही गये। बारह वर्ष तपस्या ओर बारह वर्ष देशाटन करते हुए अपनी जन्म भूमि पहुँचे। अपने घर के दरवाजे के सामने जाकर ‘ जय-जय रघुवीर समर्थ ‘ की अलख जगाई। घर के भीतर उनकी माता ने बहु को आज्ञा दी कि भिक्षार्थी को भिक्षा दे आओ। समर्थ गुरू ने आगे बढकर कहा कि ” अन्य वैरागियो की तरह भिक्षा लेकर लौट जाने वाला आज का वैरागी नही है ” इस बार माता ने अपने पुत्र की आवाज पहचान ली ओर कहने लगी “क्या नारायण आया है?”

      रामदास जी माता के चरणो मे गिर गए। माता भी प्रेम से मस्तक और मुख पर हाथ फेरने लगी। उन्होने बेटे के जटाजूट ओर दाढ़ी को स्पर्श करके कहा- “अरे नारायण! तू कितना बड़ा हो गया। आँखो से कुछ दिखाई ही नही देता कि अपने बेटे को अच्छी तरह देख सकूँ।” श्री समर्थ ने सुन कर माता के चरणों में प्रणाम किया ओर उनके सिर पर हाथ फेरा, जिससे उनको देखने की शाक्ति प्राप्त हो गई। माता को बड़ा अश्चर्य हुआ ओर वह कहने लगी ” बेटा यह तो तूने किसी अच्छे भूत को सिद्ध कर लिया है।”
      हाँ माँ-जिसने गोकुल-वृन्दावन में अनेको आश्चर्यजनक लीलॉए की है। इसी ‘भूत’ ने रावण ओर कंस का वध किया था ओर देवताओ को बन्धन से छुड़ाया था। मैने समस्त भूतो के प्राणभूत को वश मे किया है।” इसके बाद वे कई दिनो तक वहाँ ठहरे। समर्थ गुरू जब फिर ‘ ग्राम-भ्रमण ‘ के लिए घर से चलने लगे तो माता बहुत व्याकूल हो उठी, शोकाकुल होकर जोर-जोर से रोने लगी। इस पर समर्थ ने उनको भागवत मे वर्णित वही आत्मज्ञान सुनाया, वे आश्वस्त हुई ओर उन्हें शान्ति प्राप्त हुई। समर्थ गुरू रामदास (सन 1608-1682ई.) ने धर्म को सही धरातल प्रदान किया। उनके जीवन पर्यन्त तपपूर्ण सतत प्रयास ओर अनवरत प्रव्रज्या अभियान के फलस्वरूप धर्म की पुरातन रूढिग्रस्त मान्यताएँ देखते-देखते ढह गई, समाज में परिव्यास अंध प्रम्पराएँ तिरोहित हो गई ओर समूर्ण महाराष्ट्र नव चेतना के प्रकाश से जगमगा उठा।

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