संसार एक स्वप्न है

      जिस प्रकार स्वप्नावस्था मे एक भिखारी, राजा तथा देवपुरी का सम्राट इन्द्र भी निर्धन बन जाता है परन्तु जाग्रत अवस्था मे आने पर उन दोनो की अवस्था ज्यों की त्यों बनी रहती है अर्थात् राजा राजा ही रहता है तथा निर्धन निर्धन ही। इसी प्रकार सन्त-सत्पुरूषो ने भी संसार की समस्त रचना को ही स्वप्नवत् ही बताया है। परन्तु अज्ञानी जीव संसार के नश्वर पदार्थो को व सांसारिक रिश्ते-नातो को सत् समझ लेते है। जिसके कारण वे सदैव दुःखो का शिकार बने रहते है परन्तु जो भाग्यशाली पुरुष संसार की क्षणभंगुरता को जानकर सुख-दुःख को स्वप्न दृश्य समझते है तथा प्रत्येक अवस्था मे सम रहकर मालिक के नाम का चिन्तन करते हुए अपना परलोक भी सँवार लेते है, ऐसे सज्जन ही इस मनुष्य जन्म का वास्तव मे मूल्याँकन करने मे सफल होते है।
      प्रस्तुत दृष्टान्त मे एक ऐसे ही वैराग्यवान् राजा का प्रसंग दिया जा रहा है।
      एक बार का वृत्तान्त है कि किसी ज्ञानवान् राजा का इकलौता राजकुमार रोगग्रस्त हो गया। राजा को अपने पुत्र के साथ सांसारिक मोह या ममता का बन्धन तो था नही अपितु पिता होने के नाते वह कर्त्तव्य-पालन के लिए राजकुमार की हर प्रकार से चिकित्सा करवाता रहा तथा स्वंय भी उनकी सेवा करता रहा। 
      विधि का विधान! यथासम्भव उपचार करने पर भी राजकुमार की अवस्था उत्तरोत्तर शोचनीय होती गयी। राजा भी ऐसी दशा मे तीन दिन व रात विश्राम न कर पाया। अत्यधिक उद्विग्नता (बैचेनी) के कारण राजा के सिर मे दर्द होने लगा। राजा ने विवश होकर मंत्री से कहा कि ‘मंत्री जी! आज रात्रि मे राजकुमार के पास तुम बैठना तथा हर प्रकार से उनकी निगरानी रखना जिससे मै थोड़ा सा विश्राम कर लू।’ मंत्री ने उत्तर दिया कि ‘महाराज! आप निश्चिन्त होकर विश्राम किजिये। मै राजकुमार के पास बैठता हुँ।’ राजा तब शयनागार मे चले गए।
      अभी राजा को सोए हुए कुछ समय ही व्यतीत हुआ था कि राजकुमार मृत्यु की गोद मे सदैव के लिए सो गया। तब बुद्धिमान मंत्री ने हदय मे सोचा कि जो कुछ होना था वो तो हो ही गया। यदि मे राजा को कच्ची निन्द्रा से जगाकर यह दुःखद समाचार सुनाता हुँ तो सम्भव है कि राजकुमार की आकस्मिक मृत्यु का समाचार सुनकर राजा कही हदयरोग से पीड़ित न हो जाए। दूसरा समय भी तो अर्द्धरात्रि का है। यह मर्मान्तक संवाद सुनने से सम्पूर्ण राजमहल मे रोना-पीटना आरम्भ हो जायेगा और समस्त जनता मे भी कोलाहल मच जायेगा। इस प्रकार की भीषण दशा का विचार करके मंत्री ने राजा को न जगाया और स्वंय वही मृतक राजकुमार के पास बैठ रहा।
      अब जब राजा अपनी नीदं से उठे तो मंत्री ने उस समय आगे बढ़कर कहा कि – महाराज! मुझे गहरा विषाद (दुःख) है कि आपके राजकुमार का देहावसान हो गया है। यह दारूण-काण्ड सुनकर राजा हँस पड़े। उन्हें हँसता देख मंत्री दिल मे कहने लगा कि हुई न वही बात जिससे कि मे पहले से ही भयभीत था कि राजा कही उन्मत्त ही न हो जाये। हुआ भी वैसा ही क्योकि यह तो दुःख का समय था न ही हँसने का।
      तब मंत्री ने पुनः धैर्य धर राजा को कहा कि – महाराज! आपके दुलारे राजकुमार का देहावसान हो गया है। परन्तु राजा इस बार भी पूर्ववत् हँसता रहा तथा तनिक भी शोक से व्यथित न हुआ। यह देख मंत्री को कुछ-कुछ विश्वास हो गया कि महाराजा को मानसिक रोग हो गया है तभी तो वैसे ही शान्त बैठे है। अब तीसरी बार मंत्री ने राजा का कन्धा बलपूर्वक हिलाया और झकझोर कर कहा कि ‘राजा जी! आपके लड़के का स्वर्गवास हो गया है। कुछ तो सोचो! आपने यह क्या रूप बना लिया है? तनिक प्रकृतिस्थ (सावधान) रहिये।’
      तब राजा ने उत्तर दिया कि – मंत्री जी! मै आपकी कही हुई सब बातें ध्यानपूर्वक सुन रहा हुँ। मै इस समय तो जाग्रतवस्था मे हुँ, अब मुझे निन्द्रा नही सता रही। तब मंन्त्री ने कहा – जब आप चेतनावस्था में है तो राजकुमार की आकस्मिक मृत्यु को सुनकर आप इस समय हँस क्यो रहे है?
      इस पर राजा ने मंत्री से पूछा – मंत्री जी! बताइये तो, अभी मैंने कितनी देर तक निद्रा कि होगी ? मन्त्री ने उत्तर दिया – महाराज! लगभग चार घण्टे। प्रत्युत्तर मे राजा ने कहा – तो सुनो ! मैने नींद मे स्वप्न देखा है कि मेरी अनेको ही रानियाँ है तथा अगणित राजकुमार है परन्तु अब आँख खुलने पर मै क्या देख रहा हुँ कि न तो वे रानियाँ है और न ही राजकुमार। अब आप ही बताइये कि मै अगणित रानियो और राजकुमारो के बिछुड़ जाने का शोक मनाऊँ अथवा इस एक राजकुमार के देहावसान पर दुःख के आँसू बहाऊँ ?
मंत्री ने कहा – राजन् वह तो स्वप्न मात्र है, उसमे रोने की क्या आवश्यकता थी। तब राजा ने प्रत्युत्तर मे कहा – मंत्री जी! इसी प्रकार जिसको आप जागृत अवस्था बता रहे है, सन्तो ने इसे भी स्वप्न बताया है। अतएव मेरे लिए हो वह भी स्वप्न था और यह भी स्वप्न दृश्य है।
      जिस प्रकार रामायण मे भी प्रसंग आया है –

      इस मोह रूपी रात्रि मे सब प्राणी सो रहे है तथा सोये हुए अनेक प्रकार के स्वप्न देख रहे है। यह माया और काल का रचा हुआ प्रपंच सब स्वप्न मात्र है। यह सब दृश्यमान सांसारिक सम्बन्ध भी एक स्वप्न भी भाँति असत्य ही है। इसमे कुछ भी मुझे तो वास्तविकता प्रतीत नही होती। राजा का इन रहस्य भरी बातो का मंत्री पर अलौकिक प्रभाव पड़ा।
      भाव यह कि इस संसार मे जीव अकेला ही आया है और अकेला ही जायेगा। परन्तु अज्ञानी पुरुष यहाँ के सम्बन्धियो को सत्य समझ कर उनसे चित्त जोड़ बैठते है जिसके परिणाम स्वरूप उन्हे बारम्बार चौरासी लाख योनियो मे भटकना पड़ता है। इसके विपरित जो सन्त-सदगुरू द्वारा चिताये हुए गुरूमुख व सज्जन होते है वे इस संसार को स्वप्न दृश्य समझते है तथा वे इस स्वप्न रूपी निद्रा से जागृत अवस्था मे आ जाते है। जिस तरह श्रीरामायण मे भी यह दर्शाया गया है कि – 
।। चौपाई ।।
यहि जग यामिनि जागहिं योगी ।
                             परमारथी प्रपंच वियोगी ।।

      इस संसार रूपी रात्रि मे केवल वे गुरूमुख योगी जन ही वास्तविक अर्थो मे जागते है जो कि सदैव ही मालिक के मिलाप के साधन मे निरत रहकर इस माया के प्रपंच से उदासीन रहते है। अपने हदय की प्रेममय तारे मालिक के चरणों से लगाकर मनुष्य जन्म का सच्चा लाभ प्राप्त करना ही वस्तुतः जागरण है। सन्त क्या कथन करते है –

।। दोहा ।।
कबीर सोया क्या करे, जागि जागि अब जागि ।
जाहि से तू बिछुड़ा, ताहि के संग लागि ।। 

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