श्री स्वामी समर्थ गुरू रामदास (छत्रपति शिवा जी के गुरू)

 छत्रपति शिवा जी के गुरूदेव समर्थ स्वामी श्री रामदास जी समय के पूर्ण सन्त-महापुरूष थे और शिवा जी की उनके चरणो मे अटूट श्रद्धा एवं अचल निष्ठा थी। एक बार समर्थ स्वामी श्री गुरु रामदास जी अपने कुछ शिष्यो के साथ शिवा जी से मिलने जा रहे थे कि मार्ग मे गन्ने का खेत आ गया, जिसमे रस से भरे खूब लम्बे और मोटे गन्ने खड़े थे। समर्थ जी के शिष्यों को भूख ओर प्यास तो सता रही थी, क्योकि दोपहर का समय हो गया था और सुबह से उन्होने कुछ भी खाया-पिया नही था, अतः गन्ने को देखकर वह रह न सके और खेत मे घुसकर गन्ने तोड़कर खाने लगे। समर्थ स्वामी श्री रामदास जी ने पहले तो उन्हे रोकना चाहा, परन्तु फिर कुछ सोचकर वे मौन रह गये। किसान उस समय वहाँ उपस्थित न था। परन्तु थोड़ी देर बाद जब वह वापस आया, तो वहाँ की हालत देखकर उसे क्रोध आ गया। लाठी तो उसके हाथ मे थी ही, अतः उसने शिष्यो पर बरसानी शुरु कर दी। दो-तीन लाठियाँ उसने समर्थ स्वामी श्री रामदास जी की पीठ पर भी धर दी। यह देखकर शिष्यो को क्रोध तो बहुत आया, परन्तु स्वामी जी ने हाथ के संकेत से उन्हें शान्त रहने का आदेश दिया। तत्पश्चात वे चुपचाप वहाँ से उठे और शिवा जी के महल की ओर चल दिये।

      छत्रपति शिवा जी का यह नियम था कि जितने दिन भी समर्थ स्वामी श्री रामदास जी उनके पास रहते थे, तो गुरूदेव के स्नान की सेवा वे स्वयं किया करते थे। दूसरे दिन प्रातःकाल जब नित्यनियम के अनुसार शिवा जी अपने गुरूदेव को स्नान कराने लगे, तो क्या देखते है कि गुरूदेव की सुकोमल पीठ पर नीले निशान पड़े हुए है। यह देखकर उनकी आँखो मे अश्रु छ्लक आये और वे क्रोध से तिलमिला उठे।
उन्होंने गुरूदेव से पूछा – “गुरूदेव! ऐसी धुष्टता किस नराधम ने की है?”
      समर्थ स्वामी श्री रामदास जी ने शिवा जी की बात को टालते हुए कहा – “शिवा! तुम स्नान कराओ, देर हो रही है।”
      यद्यपि शिवा जी ने कई बार अपना प्रश्न दोहराया, किन्तु गुरूदेव ने हंसकर टाल दिया। किन्तु शिवा जी को चैन कहाँ था! स्नान के उपरान्त शिवा जी ने अन्य शिष्यों से पूछकर सारा वृत्तान्त जान लिया और दूसरे दिन राजदरबार मे उपस्थित होने के लिए उस किसान को आदेश भिजवा दिया।
      सैनिक किसान का पता लगाकर उसके घर पहुँचा और छत्रपति का आदेश उसे सुना दिया। शिवा जी का आदेश सुनकर किसान थर्र-थर्र काँपने लगा। भय के मारे उसे रातभर नींद न आयी। सारी रात यही सोचता रहा कि न जाने मुझसे क्या अपराध हो गया है, जो राजदरबार मे उपस्थित होने के लिए आदेश मिला है।
      दूसरे दिन दरबार लगा। एक ऊँचे सिंहासन पर गुरूदेव समर्थ स्वामी श्री रामदास जी विराजमान हुए तथा उनके चरणो के निकट ही न्यायधीश की कुर्सी पर शिवा जी स्वयं बैठे। उनके आदेश से किसान को राजदरबार मे लाया गया। दरबार में प्रवेश करने पर उसकी दृष्टि जैसे ही ऊँचे सिहासन पर विराजमान समर्थ जी पर पड़ी, उसके पैरो तले से जमीन निकल ग्ई। वह समझ गया कि उसने जो व्यवहार इनके साथ किया था, उसके फलस्वरूप उसे अब कठोर दंड़ भुगतना पड़ेगा। उस बेचारे को क्या पता था कि ये शिवा जी के गुरूदेव है; वह तो इन्हे कोई साधारण साधु समझा था।
      शिवा जी ने उस किसान को सम्बोधित करते हुए कहा – “पूजनीय गुरूदेव के प्रति तुमने जो घोर अपराध किया है, उसका दंड तुम्हे भुगतना पड़ेगा। इससे तुम बच नही सकते।”
      तत्पश्चात उन्होने गुरूदेव के चरणो मे विनय की – “प्रभो! इस अधम अपराधी के लिए आप किस दंड़ का आदेश देते है?”
      समर्थ स्वामी श्री रामदास जी ने मुसकराते हुए शिवा जी की ओर देखा और बोले – “शिवा! जो हम कहेंगे, क्या वही दंड इसे दोगे?”
      “क्यो नही गुरूदेव! आपकी आज्ञा का अक्षरश: पालन किया जायेगा।” शिवा जी ने हाथ जोड़कर विनय की।
      “तो फिर शिवा! इसे वह गन्ने का खेत और उसके साथ लगती हुई सारी भूमि दान कर दो। दो-तीन गाँव और भी इसके नाम कर दो, जिससे कि यह अपना जीवन निर्वाह सुखपूर्वक कर सके।” गुरूदेव के वचन थे।

      शिवा जी सहित सारा दरबार समर्थ स्वामी जी के ये वचन सुनकर स्तब्ध रह गये। कैसा अनोखा न्याय है। सन्तजन किस प्रकार दूसरो के अपराधो को क्षमा कर देते है, यह सोचकर वह किसान समर्थ स्वामी जी के चरणो मे लोटपोट हो गया। स्वामी जी के इस व्यवहार ने उस किसान की काया-पलट कर दी। वह उनका अनन्य शिष्य बन गया।
      उपरोक्त प्रसंग से श्रीरामचरितमानस के ये वचन पूर्णत: सत्य सिद्ध हो जाते है कि:-
।। चौपाई ।।
साधु चरित सुभ चरित कपासू ।
       निरस बिसद गुनमय फल जासू ।।
जो सहि दुख पर दुख परछिद्र दुरावा ।
       बंदनीय जेहिं जग जस पावा ।।
      अर्थ :- “अर्थात, सन्त-सत्पुरूषो की करनी कपास के समान होती है, कपास को चखकर यदि देखे, तो उसमे रस नही होता, परन्तु वह होती बड़ी श्वेत है। उसमे से फिर सूत खीचा जाता है। वह कपास ओटे जाने, काते जाने ओर बुने जाने के कष्टो को झेलकर और फिर वस्त्र बनकर लोगों के शरीरों को ढाँप देती है। सन्त-सत्पुरूष भी इसी तरह स्वार्थ से रहित ओर विमल चरित्र होते है। वे सदगुणों के निधान होते है; अपने ऊपर दुःख-कष्ट सहकर भी दूसरो के दोषों को, दूसरो के अपराधों को क्षमा कर देते है। तभी तो यह संसार उनकी वन्दना करता और उनका यश गाता है।
      साराशं यह है कि सन्त-महापुरूषो की महिमा अनिर्वचनीय है। जो उनके संसर्ग मे आ जाता है और उनके वचनों को श्रद्धापूर्वक हदयंगम करके उन पर आचरण करता है, उसका मानव-जीवन निश्चय ही सफल हो जाता है।

     

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