वहा रे ! कारूँ बादशाह

      आज के युग में ऐसा कौन होगा जिसने कारूँ बादशाह का नाम न सुना होगा। लोभ लालच का प्रसंग चलने पर कारूँ का नाम आँखो के सामने स्वतः ही घूमने लगता है –

पूछिये क्यो ? क्योकि उसने अतुल धन इकट्ठा किया था और वह भी इतने अनुचित ढंग से कि जिसका प्रमाण दूसरी जगह मिलना कठिन है। इसी बुराई के कारण ही लोग उसे आज तक घृणा से याद करते है – इसका अनुमान इस दृष्टान्त से लगाया जा सकता है।
      कारूँ बादशाह एक धन लोलुप बादशाह हो गुजरा है। अहर्निश उसके मस्तिष्क मे धन एकत्र करने की ही धुन लगी रहती थी। हर समय अपने अमीरो-वजीरो से धन एकत्र करने के उपाय ही पूछता रहता था। उसने राज्य-कोष मे धन-वृद्धि करने में अपनी तरफ से कोई भी कोर-कसर न उठा रखी थी। इसी कारण उसके राज्य मे प्रजा अत्यन्त दुखी रहती थी। पहले तो उसने साधारण तरीको से धन एकत्रित करना शुरू किया, जैसे- भारी दण्ड, लगान, जुर्माना आदि। परन्तु इससे उसकी तृप्ति न हुई। उसने धन बटोरने के कुछ नये तौर-तरीके अपनाने शुरू किये जिससे अधिक से अधिक धन उसके खजाने में पहुँच सके। समय का बादशाह था। प्रजा को हर तरह से उसका हुक्म मानना ही पड़ता था। परन्तु कारूँ की तृष्णा अपार धन पाकर भी दावानल की तरह बढ़ती जा रही थी। किसी कवि ने सत्य ही कहा है –
।। शेअर ।।
जब एक हुआ तब दस होते , दस हुए तो सौ की इच्छा है।
सौ पाकर भी सन्तोष नही, अब सहस्त्र होये तो अच्छा है ।।
इसी तरह बढते बढते, राजा के पद पद पर पहुँचा है ।
पद पाकर भी सन्तोष नही, ऐसी यह डायन तृष्णा है।।
जबतक इस मन मे तृष्णा है, तबतक परकाश नही होता।
आयु सब क्षीण हो जाती है, तृष्णा का नाश नही होता ।।

      कारूँ को तृष्णा का भूत चैन नही लेने देता था। जब साधारण तरीको से उसकी प्रजा का पूरा धन खजाने में न पहुँचा तो उसने राज्य भर मे ढ़िढ़ोरा पिटवा दिया कि ‘ जिसके पास जितना भी धन हो, सब शाही खजाने में पहुँच जाये।’ लोगो ने अपना सारा धन राज दरबार में पहुँचा दिया परन्तु इतने मे भी उसे सन्तोष न हुआ। अन्त मे उसने अपने शहर में पुनः एक बार घोषणा करवाई कि ‘यदि किसी के पास एक रूपया भी निकला तो उस पूरे परिवार को सूली पर चढ़ा दिया जायेगा।’
      इस घोषणा का परिणाम यह हुआ कि यदि किसी ने एक-आधा रूपया छिपा भी रखा था तो वह अपने प्राणो के भय से तथा दिल पर पत्थर रख कर उसे भी राज-कोष मे दे आया। वजीरो व सम्बन्धियो ने बहुतेरा समझाया कि ये बाते आपके साथ शोभा नही देती। प्रजा बहुत दु:खी हो रही है। दुखियो की आह लेना अच्छा नही है। गरीब की आह कभी खाली नही जाती।
इसी आशय पर कहा भी है –
गरीब को मत सता, गरीब रो देगा ।
सुनेगा उसका मालिक, तो तुझे जड़ से खो देगा ।।

      परन्तु कारूँ के कान पर जूँ तक न रेगीं अर्थात उसने किसी की भी बात न मानी। उस पर तो नख-शिख तक धन का मद छाया हुआ था। अभी भी उसके मस्तिष्क मे यह विचार काम कर रहा था कि यह कैसे ज्ञात किया जा सकता है कि सब का सब धन लोगो ने राज-दरबार मे पहुँचा दिया है ? इसके लिए उसको एक नई युक्ति सूझी। बादशाह ने फिर तीसरी बार घोषणा करवाई की यदि कोई एक रूपया नगद लाकर देगा तो मै अपनी पुत्री का उसके साथ विवाह कर दूंगा।
      विवाह तो मात्र धन इकटठा करने का मिष (बहाना) था।
      बादशाह की यह नवीनतम घोषणा सुनकर पहले तो जनसाधारण अचकचा गया। पूर्व तो किसी के पास रूपया था ही नही अगर किसी के पास एक-आध रूपया पड़ा भी हो तो वह मृत्यु के भय से बादशाह के सामने जाने का कोई साहस न जुटा पाया।
      एक मनचले लड़के नौजवान लड़के ने जब यह सुना कि एक रूपये मे बादशाह की लड़की मिलती है तो वह मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ और अपनी माँ के पास जाकर कहने लगा – ‘माँ ! एक रूपया दे दे। एक रूपये मे कारूँ बादशाह की लड़की मिलती है।’
      माँ ने कहा – ‘बेटा ! रूपया कहाँ से आया ? लड़की लेने के पीछे प्राण थोड़े ही गँवाने है ‘ परन्तु लड़का अपने हठ का पूरा था। माँ ने बड़ा समझाया कि रूपया दिखाने पर तो बादशाह ने हमे सूली पर चढ़ा देना है।
दूसरा यह तो बादशाह की एक चाल है। लड़की का तो केवल बहाना है, मिलनी किसी को भी नही।’
     इतना समझाने पर भी लड़का पुनः जिद करने लगा, माँ ! रूपया तो दे दो ना – ‘तख्त या तख्ता’ वाली बात तो है ही अर्थात या तो बादशाह की लड़की मिलेगी अन्यथा मौत । दोनो में से एक चीज तो प्राप्त होगी ही।
      जब लड़का किसी प्रकार से भी समझाने से भी न माना तो माँ ने कहा ” बैटा ! घर मे तो रूपया है नही। हाँ, कुछ दिन पूर्व जब तेरा बाप मरा था तो उस समय यह रिवाज था कि मुर्दे के मुँह मे एक चाँदी का रूपया रख कर दफनाया जाता था। तू जाकर बाप की कब्र पहचान ले और कब्र खोदकर रूपया निकाल ले।’ उस लड़के ने ऐसा ही किया। कब्र मे ने रूपया निकाल कर बादशाह के पास गया और देते हुए कहने लगा कि “बादशाह सलामत ! आप यह रूपया लिजिए और अपनी लड़की का विवाह मेरे साथ किजिये।”
      बादशाह ने उत्तर में कहा – मेरी पहली आज्ञानुसार तो तुझे सूली मिलनी चाहिए। बता ! तूने पहले क्यो नही यह रूपया यहाँ पहुंचाया ? लड़के ने सत्य बोलते हुए बाप की कब्र मे से रूपया निकाल लाने की सारी बात कह सुनाई। उसकी बात से जब राजा को पता चला कि मेरे राज्य की कब्रो मे इतना-इतना रूपया दबा पड़ा है, उस पर रहा न गया। अब उसने सब कब्रो को खुदवाकर रूपये निकलवाये।

      इतिहास इस बात का साक्षी है कि उसने इसीप्रकार चालीस गंज खजाना इकटठा किया। पंजाबी में कहावत है –
      अन्त मे जब वह संसार से विदा होने लगा तो सिवाय निराशा और अपयश के अपने साथ कुछ न ते ले गया और कारूँ के मरने पर उस की प्रजा अत्यधिक प्रसन्न हुई।
      इस दृष्टान्त का भाव यह है कि कारूँ जैसा बादशाह नश्वर धन की अपार राशि को संचित करने पर भी जीवन भर तृष्णा की दावानल मे जलता रहा तथा अपनी धन लोलुपता के कारण प्रजा को भी उसने उत्पीडित (दु:खी) किये रखा और स्वयं इस संसार से केवल अपकीर्ति को ही पल्ले बाँधकर रीते हाथ ही कूच कर गया।
      यह है अति तृष्णा का परिणाम। इसी तृष्णा को दूसरे शब्दों मे लोभ-लालच-हवस के नाम से भी पुकारा पुकारा जाता है। मनुष्य के पास धन-दौलत, मकान, कपड़े, आभूषण व सब प्रकार की वस्तुएँ होते हुए भी उसकी तृप्ति नही होती। लोभ का प्रमाण गीध पक्षी से दिया जाता है – गीध एक ऐसा पक्षी है कि उससे अधिक ऊँचाई मे आकाश की ओर अन्य कोई भी पक्षी उड़ान नही भर सकता तथा उसकी दृष्टि भी इतनी तेज है कि इतने ऊँचे धरती पर मरे हुए जानवर के मांस पर उसकी दृष्टि बहुत जल्दी पड़ जाती है। मांस पर गीध जान देती है। गीध पक्षी की न्याई ही धन-लोलुप ‘कारूँ’ ने समस्त जनता के रक्त को निचोड़ कर अन्त मे अपयश को प्राप्त किया। इसलिए सत्पुरूषो ने लोभी मनुष्य की गीध से तुलना की है।
      अतएव मानव मात्र का कर्त्तव्य है कि गीध वाली चाल अर्थात लोभ को छोड़ अपने प्रारब्ध पर ही सन्तुष्ट रहने का प्रयास करे। जीवन काल मे ऐसे शुभ कर ले जिससे यह लोक भी यशस्कर बन जाये और परलोक भी।

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