लोभ का स्वरूप

      गोस्वामी तुलसीदास जी कथन करते है कि जब तक जीव के मन मे काम, क्रोध, लोभ, मोह व अंहकार आदि पाँचो शत्रुओ का साम्राज्य बना हुआ है तथा वह अपने मनुष्यचित कर्त्तव्य से विमुख है – उस अवस्था मे पण्डित (विद्वान) व मूर्ख दोनों एक ही समान है।
।। दोहा ।।
काम क्रोध अरू लोभ की, जब लग घट मे खान ।
तुलसी पण्डित भूर्खा, दोनों एक समान ।।
     
 इसी विषय पर एक दृष्टान्त दिया जा रहा है –
      किसी नगर मे एक महात्मा जी आश्रम बनाकर रहा करते थे। उनके पास सत्संग श्रवण करने के लिए अत्यधिक संख्या मे जिज्ञासु आया करते थे। महात्मा जी एक दिन ‘लालच बुरी बला है’ इसी विषय पर सत्संग किया कि लोभी मनुष्य लालच के वश में होकर अपनी बुद्धि को खो बैठता है। विचारहीन हो जाने के कारण वह मनुष्य पद से पतित हो जाता है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को लालच से बचना चाहिये।
      सत्संग-मण्डली के उन श्रोतागणो मे एक जौहरी भी आया करता था उसको यह बात अच्छी न लगी। अतएव महात्मा जी ने उनसे कह दिया कि ‘महाराज! आप जो फरमाते है ‘लालच बुरी बला है’ सो मुझे यह तो बताये कि लोभ वस्तुतः क्या वस्तु है? इसका प्रत्यक्ष में कोई प्रमाण तो दिखाइये कि लोभ का प्रत्यक्ष स्वरूप कैसा है तथा लोभी व्यक्ति कैसे बुद्धिहीन हो जाता है?’ महात्मा जी ने कहा भक्त जी! फिर कभी आपको उसका (लोभ) का प्रत्यक्ष रूप दिखाया जायेगा।
      कई दिन बीत जाने पर भी महात्मा जी को उस जैहरी भक्त का प्रश्न न भूला था। महात्मा जी ने आश्रम पर एक कुत्ता पाल रखा था। नगर के कई सेठ, साहूकार महात्मा जी के अत्यन्त श्रद्धालु थे। एक दिन महात्मा जी ने एक सेठ से कहा कि मुझे कुछ समय के लिए एक किमती लाल की आवश्यकता है। उस सेठ भक्त ने बिना कारण पूछे ही दूसरे दिन महात्मा जी को लाल लाकर दे दिया, जो कि हजारों का मूल्य रखता था। महात्मा जी ने उस लाल को लेकर आश्रम के कुत्ते के गले मे पट्टे के साथ बाँध दिया।
       नित्य की भाँति जब सब प्रेमिजन सत्संग श्रवण करने के लिए आए और उनमे वह जौहरी भक्त भी आया। तत्पश्चात महात्मा जी ने प्रतिदिन की भाँति सत्संग आरम्भ किया। कुत्ता भी सब संगत के पीछे एक कोने मे जूतो के पास बैठा था। जौहरी ने देखा कि आश्रम के कुत्ते के गले मे आज एक किमती लाल बँधा हुआ है। वह आश्चर्य-चकित हो दिल मे कहने लगा कि यह महात्मा लोग क्या जाने इतना मूल्यवान लाल कुत्ते के गले मे बाँध रखा है। जितनी देर सत्संग होता रहा संगत तो पूर्ववत् संगत सुनती रही परन्तु जौहरी तो कुत्ते का ही ध्यान लगा रहा। अन्त मे सत्संग समाप्त होने पर जब सब संग घरो की और चली गई तब वह जोहरी वही आश्रम मे बैठा रहा। महात्मा जी को एकान्त मे बैठा देख जौहरी उनके पास गया और पूछने लगा कि – महात्मा जी! आपने कुत्ते के गले में क्या बाँध रखा है?
      महात्मा जी ने उत्तर दिया – प्रेमी! एक सुन्दर सा मनका (मोती) कही से मिल गया था। वही हमने कुत्ते के गले मे बाँध दिया है।
      जौहरी भक्त ने कहा – मै इससे भी सुन्दर मनका आपको ला दूँगा, जिसकी सुन्दरता इससे भी अधिक होगी। वह आप कुत्ते के गले के बाँध देना और यह मूझे दे दो। महात्मा जी बोले – यह मनका ही बँधा रहने दो। हमने कौनसा कुत्ते को प्रदर्शनी (नुमायश) मे भेजना है जो इससे सुन्दर मनका इसके गले मे बाँधे। महात्मा लोगो का कुत्ता है, साधारण मनका ही ठीक है। यही घर पर ही तो इसको बैठे रहना है। अतः जो मनका बँधा हुआ है इसी को जी रहने दो।
      जौहरी को यह पता न था कि महात्मा जी ने यह सब रचना मेरे लिए रचाई है। जौहरी ने कई प्रयत्न किये कि किसी उपाय से यह लाल मुझे प्राप्त हो जाये क्योकि वह जानता था कि इसका मूल्य कई हजारो रूपये तक का है। उसके बार-बार आग्रह करने पर भी महात्मा जी ने एक ही उत्तर दिया कि कुत्ते के गले मे यही मनका बँधा रहने दो।
      अन्त मे लोभ के अधीन होकर उसने महात्मा जी से कहा कि आप मुझे यह मनका किस उपाय से दे सकते हो? महात्मा जी ने स्वीकृति मे कहा – हाँ, उस अवस्था मे दे सकते है जो मनुष्य कुत्ते के साथ बैठकर खाना खा सके। लोभी मनुष्य क्या कुछ करने को तैयार न होता। ठीक यही दशा उस जौहरी की भी हुई। उसकी बुद्धि पर लोभ का आवरण छा गया था। वह लोभाधीन होकर कहने लगा महात्मा जी! मुझे आपकी यह शर्त स्वीकार है – जैसा आप कहेगे मै वैसा ही करुँगा। आपके वचनो पर मुझे कोई आपत्ति नही है।
      दूसरे दिन सत्संग की समाप्ति पर जब संगत अपने-अपने घरो को चली गई, तब महात्मा जी ने पतली-पतली खीर बनाई और ठण्डी करके थाली मे डाल दी। कुत्ता उसे खाने लगा और एकदम ही थाली की सम्पूर्ण खीर जूठी कर डाली। अब जौहरी भी महात्मा जी की कल वाली की गई शर्त के अनुसार थाली मे से खीर खाने को तत्पर हुआ। कुत्ते की जूठी खीर उठाकर मुँह मे डालने ही लगा था कि झट से महात्मा जी ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा कि ‘लो भक्त जी! देख लो, यह है लोभ का प्रत्यक्ष स्वरूप। कुछ दिन पूर्व तुमने हमसे लोभ का प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाने को कहा था। अब स्वयं ही अपनी आँखो से देख लो कि आज तुम स्वयं ही लोभ का रूप बने हुए हो तथा लालच के वशीभूत होकर एक कुत्ते की जूठन खाने को तैयार हो गए थे। क्या यह धन, जिसके लिए तुम मनुष्य होकर इतना नीच कर्म कर मनुष्यत्व से गिर रहे हो, मरते समय तुम्हारे साथ जायेगा?’
      जौहरी भक्त महात्मा जी की चेतावनी से अपने किये पर बहुत लज्जित हुआ और उनके चरणो पर गिर कर क्षमा याचना करने लगा तथा भविष्य मे लोभ आदि का परित्याग कर पूरा सत्संगी भक्त बन गया।
      इस दृष्टान्त से यह स्पष्ट होता है कि किस प्रकार लालच के वशीभूत होकर जौहरी ने कुत्ते के साथ खीर तक खाना स्वीकार कर ली और अपने मनुष्यत्व को नितान्त ही भूल बैठा। सच कहते है कि माया ऐसी लुभावनी है जो कि अपनी तनिक चमक-दमक दिखा कर जीव को पथ-भृष्ट कर देती है तथा चौरासी लाख योनियो मे जा गिराती है। सन्त-महापुरुषों को जीवो को मायावी जाँल मे फँसा देख करूणा हो आती है। वे मानव मात्र के प्रति बारम्बार यही उपदेश करते है कि प्रत्येक मनुष्य को अपनी मनुष्यता की सीमा मे ही सीमित रहना चाहिए। प्रारब्ध अनुसार जीव को जो कुछ मिलता है उसी पर सन्तुष्ट रहकर जीव को निष्काम कर्मो की ओर अग्रसर होना चाहिये। यही मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य है। इन अमूल्य वचनो का मूल्यांकन करना एक पारमार्थिक जिज्ञासु का मूख्य कर्तव्य है। उनसे शिक्षा ग्रहण कर व उन पर आचरण करके अपने जीवन को स्वर्णिम बनाना चाहिये।

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