लोभ का दुष्परिणाम

।। दोहा ।।

      मायासक्त जीव का क्या कभी मायावी पदार्थों और सुखो से भर सका है ? कदापि नही। यदि तीनो लोको का धन भी इसे क्यो न प्राप्त हो जाये तो भी यह असन्तुष्ट एवं दुःखी बना हुआ है। माया का दुःखदायक स्वरूप नीचे लिखे दृष्टान्त से स्पष्ट होता है –

      एक बार किसी शिष्य के साथ उसके गुरूदेव कही देश-भ्रमण को जा रहे थे। गुरूदेव बड़े ही त्यागी और तपस्वी थे परन्तु चेला अभी मायासक्त ही था। उसके मन मे हर समय माया का लोभ ही छाया रहता था। वह अपनी फकीरी गुजरान से सन्तुष्ट न होकर धन-माल के ही सदैव स्वप्न देखता था।
      राह चलते-चलते एक जगह जंगल मे उन्होंने दोपहर को एक वृक्ष के नीचे बसेरा किया। निकट ही कोई गाँव था। चेला वहाँ से जाकर मधूकरी ले आया तब उन सन्त जी और चेले दोनो ने भोजन किया तथा झरने का शीतल जल पीकर विश्राम करने लगे। संध्या समय गुरू जी घूमने चले गये और चेला अकेला ही वृक्ष के नीचे बैठा रहा। बैठा-बैठा स्वाभाविक ही वह अपने हाथ की लकड़ी से जमीन कुरेदने लगा। मिट्टी नरम होने के कारण लकड़ी उसमे धँस गई। चेले को यह देख बड़ा आश्चर्य हुआ जिससे उसने वह जगह और भी खोदनी आरम्भ कर दी। हाथ भर गडढ़ा खोदने पर उसमे से एक पीतल की गागर निकली जो कि सोने-चाँदी की मोहरो से भरी हुई थी। यह देख चेला प्रसन्नता से उछल पड़ा। वह उसे अभी देख ही रहा था कि सामने से गुरू जी आते दिखाई दिये। चेले ने गागर ढ़ाँप ली और बड़ी प्रसन्नता से धन मिलने की वार्त्ता गुरूदेव से कह सुनाई।

      यह सुनकर गुरू जी ने चेले को समझाया और कहा कि – बेटा! यह धन लेकर तू क्या करेगा ? यह तो विपत्ति और दुःख की खान है। तूने व्यर्थ मे ही इसे पाकर विपत्ति मोल ले ली है। फिर भी जो कुछ होना था सो हो चुका। अब ऐसा कर तू इसे पूर्ववत् शीघ्रता से धरती मे गाड़ दे और हमे यहाँ से तत्काल ही चल देना चाहिए। परन्तु चेला हठ करने लगा कि महाराज! हाथ मे आया धन कैसे छोड़ा जा सकता है ?
      गुरू जी कहने लगे – अरे भोले! यह धन दुःखो का घर है। यदि तू इसे नही मानता तो इसका कुपरिणाम हम तुझे कल ही प्रत्यक्ष ही दिखला देगे। अब तो इसे तू जल्दी से गाड़ दे और हमारे साथ चल। तब दोनों ने मिल कर उस गागर को पूर्ववत् दबा दिया और वहाँ से आगे प्रस्थान कर गये।
      रात्रि को दूसरे स्थान पर बसेरा करके जब प्रातःकाल वहाँ से जाने लगे कि एकाएक गुरुदेव ने अपने शिष्य से कहा – ओहो! उस वृक्ष के नीचे तो हमारी आधारी (विरागन) छूट गई है चलो ले आये। तब वे दोनो उसी वृक्ष के पास पहुँचे तो क्या देखते है कि वृक्ष के नीचे आठ व्यक्तियो के मृतक शरीर (लाश) पड़े हुए है तथा साथ ही धन से भरी वही गागर भी पड़ी है जिसे ले जाने वाला कोई नही। यह सब देखकर चेला आश्चर्य-चकित हुआ और गुरू जी से पूछने लगा।
      सन्त महात्मा भूत, भविष्यत् एवं वर्तमान के ज्ञाता होते है, परन्तु आम तौर पर वे प्रत्यक्ष मे साधारण मनुष्यो की भाँति अधिकतर मौन ही रहते है। लेकिन जब कभी उनकी मौज हो तो वह दूसरो का हित सोचकर सब कुछ बता भी देते है।
      इसी प्रकार प्रत्युत्तर मे गुरू जी ने कहा – विरागन का छूट जाना तो केवल आकार ही हमने बनाया था, वास्तव मे धन के लोभ का दुष्परिणाम दिखाने के लिए ही हम तुम्हे यहाँ लाए है। बात यो हुई की हमारे यहाँ से चले जाने के बाद ये आठो मनुष्य यहाँ इसी वृक्ष के निकट कही जा रहे थे। संयोगवश धरती के कुछ नरम होने के कारण एक व्यक्ति का पाँव उसमे धँस गया। जिससे इन्हे इस जगह गड्ढ़ा सा प्रतीत हुआ। तब सबके खोदने पर उन्हे यह गागर प्राप्त हुई। अब आठों मे सम्पत्ति को समान भाग से बाँटना निश्चित हुआ। जब इन्हे भूख ने सताया तो चार मनुष्य तो गागर के पास रहे और अन्य चार गाँव मे से भोजन लेने के लिए चले गये।
      गाँव मे पहुँचकर चारों व्यक्तियों के मन मे यह कुटिल विचार प्रस्फुटिक हुआ कि क्यो न हम ही चारों इस धन के अधिकारी बने। यह सोचकर उन्होने पहले स्वयं ही भोजन खाया और बाद मे उन चारों के लिए जो भोजन बनवाया तो उसमे जहर मिला दिया। अब वह चारों व्यक्ति भोजन लेकर प्रसन्नतापूर्वक वृक्ष की और चल दिये कि उन चारो को मारकर सम्पूर्ण धन को अपने अधिकार मे कर लेगे।
      अब उधर उनकी बात सुनो – वृक्ष के नीचे बैठे हुए इन चारों के मन भी मैले हो गए। उन्होने यह योजना बनाई कि वे लोग तो भोजन खाकर आयेगे तथा जब वे विश्राम करेगे तब इनको सोते मे ही कत्ल करके हम यह धन प्राप्त करेगे। तत्पश्चात निश्चित होकर खाना खा लेगे। जब ये चारों व्यक्ति उधर गाँव से भोजन लेकर पहुँचे तो इन्हे कहने लगे कि हम लोग तो खा कर आये है। अतः आप लोग खाना खा ले, तब धन का बँटवारा किया जाये। परन्तु अभी भूख नही है, का बहाना कर इन चारों ने भोजन करने से इन्कार कर दिया। जब उनके कहने पर खाना लाने वाले चारों व्यक्ति सो गये तो इन चारो ने तेज कटार से उनके गले काट दिये। इसके बाद जब इन्होने विष मिश्रित भोजन किया तो ये चारों भी सदैव के लिए सो गए और यह धन की गागर वैसी की वैसी पड़ी रही। 
      इतनी कथा सुनाकर गुरूदेव जी ने पुनः शिष्य से कहा कि ले! अब आँखे खोलकर देख ले। यह धन के लोभ का प्रत्यक्ष दुःखदायी परिणाम! जैसा हम ने कल कहा था वह आज स्वयं तू देख ले। वे सब इस धन को हड़पने की इच्छा से ही मर गये है। अब इस धन को ले जाने वाला कोई भी न बचा। बोल! अब क्या कहता है ? यदि चाहे तो इस गागर को उठा ले चल।
      यह सब सुनकर चेले ने कान पकड़े और वह स्वयं को धिक्कारता हुआ गुरूदेव जी के चरणों मे गिरकर उनसे क्षमा याचना करने लगा। तब गुरुदेव जी ने उसे वास्तविक प्रेम-भक्ति का उपदेश दिया तथा क्षमा प्रदान की। तत्पश्चात गुरूदेव जी के साथ शिष्य आगे यात्रा के लिए चल दिया।
      तात्पर्य यह है कि धन का लोभ ही समस्त दुःखो और विपत्तियो का मूल है। ऐसे ही सब पदार्थों के लोभ का भी परिणाम समझ लेना चाहिये।
      जैसे कि श्री रामायण मे भी यह प्रंसग आया है, भगवान् श्री रामचन्द्र जी वन मे शबरी को वचन फरमाते है कि – ‘अष्टम यथा लाभ सन्तोषा।’                       

                                             

    

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