रावण पर सोने की लंका कहाँ से आई ? आइये हम आपको दृष्टान्त के माध्यम से समझाते है।

      इतिहास इस बात का साक्षी है कि रावण अपने समय का एक विद्वान और प्रकाण्ड पंडित था। वह चार वेद तथा छः शास्रो का ज्ञाता था। इसके अतिरिक्त उसका नगर सोने का बना हुआ था। इतना विद्वान व धनवान होने पर भी वह अपने आपको मानसिक शत्रुओ से स्वतन्त्र न करा सका। काम, क्रोध, लोभ का तो मानो व साक्षात प्रतिरूप था। सदशास्रो ने व सत्पुरूषों ने ऐसे मनुष्य को जो कि मानव जन्म पाकर मायासक्त हो जाए और इस अनमोल समय मे अपना परलोक न सवारे उसे मूर्ख का पद दिया गया है। इस बात का स्पष्ट प्रणाम हमे रावण के चरित्र से मिल सकता है। आज के वर्तमान समय मे अब भी यह सबके देखने मे आता है कि विजयदशमी के दिन रावण का पुतला बनाकर ऊपर एक गधे का सिर लगा दिया जाता है। ताकि उससे हम यह शिक्षा लेवे कि सभी प्रकार के एश्वर्य के सामान होने पर भी वह पाँचो चोरो के अधीन होकर अपने उददेश्य की प्राप्ति न कर सका अपितु अपनी वासनाओ के वशीभूत होकर भगवती सीता जी का अपहरण कर लिया। यह तो बहुत प्राचीन एवं प्रचलित इतिहास है। तथा लगभग सभी जन साधारण इससे परिचित भी होगे।

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      इस बार आप सज्जनो के समक्ष हम यह दृष्टान्ट प्रस्तुत कर रहे है कि रावण के पास जो स्वर्ण लंका थी वह कैसे तथा कहाँ से प्राप्त हुई ?
      पूर्ण वृत्तान्त पाठकगण निचे लिखे दृष्टान्त मे पढे –
      एक बार पार्वती जी कैलाश पर्वत पर अकेली बैठी थी। उनके मन मे विचार आया कि चल कर बैकुण्ठ धाम में लक्ष्मी जी से मिल आऊँ। पार्वती जी जब वहाँ पहुँची तो क्या देखती है कि लक्ष्मी जी का भवन अति सुन्दर बना है। जिसे देखकर आँखे भी चौधिंया जाती है। कही पर तो सुन्दर सुन्दर तालाब है, कही बागो मे नाना प्रकार के रमणीय फूल डालियो पर इठला रहे है और फलो से लदी शाखाएँ झूम रही है। उनके भवन का फर्श भी क्या मनमोहक था – फर्श पर रजत (चाँदी) बिछी थी, छतो पर सोना मढ़ा हुआ था और दीवारो पर हीरे जवाहरात झिलमिला रहे थे। चारो तरफ सौन्दर्य का ही साम्राज्य दृष्टिगोचर हो रहा था। अप्सराएँ लक्ष्मी जी की आरति उतार रही थी। लक्ष्मी जी स्वर्णमय पंलग पर बडे दर्प से बैठी थी। पार्वती जी के आने पर उन्होने आँख उठाकर न देखा और न ही उनका स्वागत किया।
      यह अपमान देखकर पार्वती जी के दिल को बहुत ठेस पहुँची। वह दिल मे कहने लगी की बिना बुलाए किसी के घर जाने का यही परिणाम होता है। इतने मे लक्ष्मी जी ने पार्वती की ओर देखा और गर्व से पूछने लगी कि ‘पार्वती जी! कहो आपका यहाँ कैसे आना हुआ ?
क्या श्मशानवासी शिवजी को घर मे अकेला छोड़ आयी हो या वे कही भिक्षार्थ बाहर गये हुए है ?’
      इतना सुनते ही पार्वती जी का हदय क्रोध से भर गया और कहने लगी – लक्ष्मी जी! मुझे आपकी बातो पर बहुत रोष आ रहा है। आप उन त्रिलोकी के मालिक को आज भिक्षुक कह कर उलटी गंगा बहाने लगी है। आप क्या जाने शिवजी की महिमा को ? समस्त सृष्टि उन्हें अपना मालिक समझकर ‘भोला-भण्डारी’ के नाम से पुकारती है। तनिक सुनो तो सही कि, उनकी तुलना मे विष्णु जी का क्या गौरव है ? यदि आप नही जानती तो मै बताती हुँ। सुनो, अपने भिखारी पतिदेव की बाते – आपका विष्णु ऋषि दधीचि से उनके शरीर की हड्डियाँ मागने गया था, दानी कर्ण से भी सोने के दांत की याचना की थी, मोहिनी रूप धारण कर मेरे भोले-भण्डारी के आगे नृत्य करने को आया, राजा मोरध्वज के घर भी भिक्षार्थ गया तथा बावन रूप धारण कर उसने राजा बलि के साथ छ्ल किया था, परन्तु क्या कभी आपने इन बातो पर भी ध्यान दिया ? किस बल-बूते पर आज आपने इस प्रकार मेरा तिरस्कार किया है ?
      पार्वती जी लक्ष्मी जी को खरी-खोटी सुना कर एवं नहले पर दहला मार कर भी शान्त न हुई और घर आकर रूठे मन से शिवजी को ताना देने लगी – प्रभु! वैसे तो आपकी महिमा अपरम्पार है। वेदों मे भी आपका महात्म्य वर्णित हुआ है परन्तु यदि आपके पास कोई आए तो क्या देखेगा? नाम तो आपका शहनशाह है पर डेरा आपका निर्जन वन मे! धरती का फर्श है – आसमान की छत है। मै पूछती हुँ कि आपकी यह बादशाही किस काम की? जब कि सिर ढाँपने को हमारे पास घर तक नही है। बस साँपो की पिटरी, त्रिशुल, तूम्बी, डमरू यही कुंल पूंजी है हमारी।
      शिवजी ने पूछा – पार्वती जी! आज क्या हो गया है तुम्हे, जो इस प्रकार बहकी-बहकी बाते करने लगी हो? आज से पहले तो तुमने कभी भी मकान तक का नाम तक न लिया था?
      पार्वती रोष भरे स्वर मे बोली – भले ही आप त्यागी बने रहे पर परन्तु मे तो अपने लिए अवश्य मकान बनवाकर छोडूँगी।
      तब शिवजी समझाते हुए कहने लगे – पार्वती! तुम व्यर्थ के झमेलो मे न पड़ो। मकान बनने को तो आज ही बन जायेगा परन्तु जो सुख-वैभव के सामान दृष्टिगोचर होते है। वे परिणाम मे दुःख के आगार होते है। जितनी मोह-ममता सामान व मकान से बढाओगी छोड़ते समय उतना ही अधिक दुःख उठाना पड़ेगा। शिवजी की ज्ञान भरी बातों का पार्वती पर कोई प्रभाव न पड़ा। वह महल निर्मित कराने की जिद पर अड़ी रही। तब शिवजी ने स्वर्ग लोक के वास्तुकार विश्वकर्मा को बुलाकर कहा कि पार्वती से पूछो, कि वह क्या चाहती है ?
      विश्वकर्मा ने पूछने पर उमा बोली – ऐ विश्वकर्मा! हमे एक ऐसा मकान तैयार कर दो जिसकी सुन्दरता को देखकर सब आश्चर्य चकित हो जाये। भाव यह है कि स्वर्ग मे इसके सदृश कोई दूसरा मकान न हो। विशेषकर लक्ष्मी का महल सुन्दरता मे इससे तुच्छ प्रतीत हो। सोना-चाँदी, हीरे-जवाहरात आदि लगाने में कोई कसर न रहने पावे।
      आज्ञा पाने की देर थी कि पलक झपकते ही भव्य-भवन निर्मित हो गया और वह भी इतना रमणीय की जिसे देखकर पार्वती की प्रसन्नता की सीमा न रही। सचमुच उसके आगे लक्ष्मी का महल तुच्छ प्रतीत होने लगा। विश्वकर्मा ने अपनी पूरी योग्यता इस महल के बनाने में लगा दी। इतना सुन्दर व विशाल महल निर्मित हुआ कि स्वर्ग में इसकी तुलना मे दूसरा कोई महल न था। जो भी कोई इस महल को देखता, प्रशंसा किये बीना न रहता अर्थात सारे महल की छते, दीवारे, बाग बगीचे आदि सब स्वर्ग जड़ित थे। पार्वती जी अपने मकान देखकर प्रसन्नता से बल्लियों उछलने लगी।
      बुद्धिमान लोग कहते है कि किसी काम की ‘अति’ अच्छी नही होती। अति प्रसन्नता भी दुःख का कारण बन जाती है। अब पाठकगण देखे की आगे क्या होता है –
      पार्वती जी शिवजी के पास जाकर कहने लगी ‘नाथ! ग्रह-प्रवेश से पूर्व उदघाटन करना लेना चाहिए अर्थात जाप, यज्ञ, हवन एवं दान करना इस अवसर पर उचित रहेगा।’ यहाँ तो कहने की देर थी कि यज्ञ हवन आदि कि सब तैयारियां हो गई और उदघाटन के लिए भगवान विष्णु, ब्रह्मा जी, वरूण आदि सब देवताओ को निमन्त्रित किया गया। इसके अतिरिक्त अन्य छोटे-बड़े प्रतिष्ठित विद्वान भी बुलाए गए।
      उस समय का सुविख्यात पण्डित यज्ञ कराने वाला पुरोहित ‘विश्रवा’ (रावण का पिता) था। उसको यज्ञ कराने के लिए बुलाया गया। पण्डित विश्रवा अपने छोटे बच्चे ‘रावण’ को भी अपने साथ लाया था। यज्ञ की समाप्ति पर सबको भोजन खिलाया गया। तब शिवजी अपने हाथो सबको दान देने लगे तो बालक रूष्ट हो गया। पार्वती ने विश्रवा से पूछा कि ‘क्या बात है?’

      विश्रवा ने कहा – बच्चे जिद्दी होते है। इनका हठ कौन पूरा करे?

      तब पार्वती ने प्यार से बच्चे से पूछा- बोल! तू क्या माँगता है? मै तुझे मुँह माँगी वस्तु दूंगी। यहाँ किसी चीज की भी कमी नही है। परन्तु बच्चा फिर भी चुप हो रहा। तब रावण के पिता ने कहा – यह तो पूरा का पूरा महल ही आपका दक्षिणा मे माँगता है।
      ब्राह्मण के मुख से इतना सुनना था कि पार्वती जी के हाथो तोते उड़ गये। वह बेहोश हो धरती पर गिर गई क्योकि ब्राह्मण ने मुँह माँगी दक्षिणा माँगी थी और यह वचन-बद्ध हो चुकी थी, ‘जो तुम माँगोगे वो मै दूँगी’ परन्तु उसे क्या ज्ञात था कि मेरी समस्त आशाओ पर पानी फेर दिया जायेगा। कितनी उमंगो और स्पर्धा के साथ उसने यह भव्य भवन बनवाया था तथा यह सारा दान-पुण्य व यज्ञ-हवन इसलिए ही तो थे। परन्तु पल भर मे ही ब्राह्मण ने उसके आशा के महल को गिरा दिया। इससे पार्वती को कितना दुःख पहुँचा, वह तो केवल उसका दिल ही जानता होगा।
      इसका प्रमाण इस तरह से है –

।। कविता ।।
कितनी इच्छाओ से उसने यह स्वर्ण महल बनवाया था ।
ओर इसी महल के कारण ही यह अमुपम यज्ञ रचाया था ।।
इस बात से कितना कष्ट हुआ वह पार्वती ही जानती थी ।
कितनी भावनाओ से बना महल यह सिर्फ सती ही जानती थी  ।।
सुन्दर पौधे और वृक्ष लगा माली ने चमन तैयार किया ।
फल खाने का मौका आया तो पकड़ चमन से बाहर किया ।
      कुछ देर बाद जब पार्वती चेतनावस्था मे आई तो अब भी अनकी आँखो से क्रोधाग्नि के अँगारे बरस रहे थे। वह रोष मे भरकर ब्राह्मण से बोली –

।। शेअर ।।
बोली-कि तुम हदय के कठोर हो ब्राह्मण ।
ऊपर से तपस्वी, पर दिल के चोर हो ब्राह्मण ।।
मेरे सुहाने सपने तुने है तोड़ डाले ।
आशा के फूल खिलने से पहले मरोड़ डाले ।।
तेरी कुभावना का खा जाए, पाप तुझको ।
ऐ कान खोल ब्राह्मण! देती हुँ शाप तुझको ।।
तू और कुटुम्ब तेरा, जल करके राख होगा ।
सोने का यह महल भी सब भस्म-खाक होगा ।।
      इन पंक्तियो से पाठकगण समझ गए होगे कि ईश्वर कितना उचित न्याय करता है जो मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है। यह ‘स्वर्ण महल’ दक्षिणा मे लेकर ऋषि विश्रवा ने मानो अपने तथा पुत्र रावण के लिए दुःख व विपदाओ को निमन्त्रण दे दिया। अज्ञानवश इन्हें भविष्यफल का कुछ भी बोध न था।
      पार्वती को इसप्रकार शोकातुर देख शिवजी बोले – ऐ पर्वती! अब इन व्यर्थ के झमेलो न पड़ो। समस्त क्रोध व चिन्ता को छोड़कर अपनी वास्तविक स्थिति मे आओ क्योकि हमारे भाग्य मे जब मकान का सुख है ही नही तो व्यर्थ प्रयत्न करने से क्या लाभ ? अपनी निजी पूँजी – साँपो की पिटारी, तूम्बी, त्रिशुल, डमरू आदि को ही कन्धो पर उठा कर चलो, किसी जंगल अथवा श्मशान घाट मे जाकर धूनि रमाये जो कि हमारा असली निवास स्थान है।

      विशेष – रावण बचपन से ही पराक्रमी था। कहते है कि उस स्वर्ण महल को वे अपने दोनों बाहुबल से उठा ले गये। भारत के दक्षिण मे समुन्द्र की तरफ। वही पर ही रावण ने आधिपत्य किया था। तथा सोने की लंका के नाम से उस समय जो शहर पुकारा जाता था, यह नगर वही पार्वती का निर्मित महल था, जिसका नाम पार्वती जी ने ‘शिवपुरी महल’ रखा था।

      पूरे दृष्टान्त का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार शिवजी ने पार्वती जी को बैकुण्ड से लौटने पर त्याग व वैराग्य का उपदेश दिया परन्तु त्रिया हठ के अनुसार वह अपने विचारो पर अडिग रही। परिणामस्वरूप उसको अन्त मे कितना असहनीय दुःख झेलना पड़ा। इसीप्रकार अज्ञानी जीव भी जब इच्छाओ के वशीभूत हो जाते है तब अपने क्षणभंगुर शरीर व जीवन को चिरस्थायी समझ लेते है तथा अपना अमूल्य समय व श्वास इन झिलमिलाते सौंदर्ययुक्त साज़-सामानो को इकट्ठा करने मे व रिश्ते-नातों के अस्थायी झूठे प्यार मे ही व्यय कर देते है। वे इस बात को भूल ही जाते है कि माया के सब सामान व रिश्ते-नाते एक दिन अवश्य छूटने है।
 

    
      सो अब सोचना इस बात को है कि जिन नश्वर सामानो के पीछे इतना स्वर्णिम समय गँवाया। उसके अन्तिम परिणाम ने जीवात्मा को कहाँ पहुँचाया ? जीते जी संसार मे हर समय चिन्ताओ से ग्रसित रहा और मरने के बाद भी जिस वस्तु मे वासना रह गई- वैसा ही जन्म मिला। हसलिए मानव मात्र का कर्तव्य यह है कि वासना मे न अटक कर संसार मे त्याग व वैराग्य से जीवन यापन करे तथा ऐसा सामान इकट्ठा करे जो कि अन्तिम समय मे यहाँ से जाते हुए परलोक मे साथ दे। वह है – मालिक का भजन एवं सदगुरू की निष्काम सेवा।

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