रावण की मृत्यु के बाद श्रीराम ने दिया विभिषण को उपदेश

      भगवान श्रीरामचन्द्र जी फरमाते है कि मरते समय जिसको जिस प्रकार का मन मे ध्यान आता है, उसी के अनुसार ही उसको योनि मिलेगी। अतः जिसका मरते समय मेरी तऱफ ध्यान होगा, वह मनुष्य शरीर त्यागने पर मुझ मे ही लीन हो जायेगा। जैसा कि इस निम्नलिखित दृष्टान्त से स्पष्ट होता है :-

      त्रेतायुग मे जब भगवान श्री रामचन्द्र जी व रावण का युद्ध समाप्त हुआ, दोनो तरफ की राक्षस एवं वानर सेनायें अधिकाशं मात्रा मे मर चुकी थी, थोड़े से ही व्यक्ति बच गए थे; उस समय भक्त विभीषण जी ने भगवान श्री रामचन्द्र जी के चरणों मे प्रार्थना की “प्रभो! इस समय लंका मे केवल अबलाओ व बालको के अतिरिक्त शेष कोई भी नही रहा। छोटे बच्चे जब तक बडे होगे, उस समय तक लंका का काम कैसे चलेगा?
      तब भगवान श्री रामचन्द्र जी ने अमृत से भरा कलश विभीषण को देकर कहा “प्रिय लंकेश! एक-एक घूंट अमृत का सब मृतक राक्षसो के मुँह मे डाल दो जिससे सब जीवित हो उठे।” तब विभिषण ने ऐसा ही किया। परन्तु राक्षसों के मुँह मे अमृत डालने पर कोई भी राक्षस जीवित न हुआ। तब यह देख कर विभीषण को बड़ा आश्चर्य हुआ कि भगवन! मेरी सेना का तो एक भी सैनिक जीवित न हो पाया। इसका क्या कारण है ?
      अन्त में भगवान श्री रामचन्द्र जी के पास जाकर विभीषण जी ने सब समाचार सुनाया तब भगवान ने फरमाया – “ऐ विभीषण ! राक्षस सेना को तो मरते समय तक मेरा ध्यान बना रहा। युद्ध के अवसर पर भी वे दिल मे यह कहते रहे थे कि राम कहाँ है और लक्ष्मण कहाँ है ? मेरे ध्यान व तसव्वर में ही उनकी इस प्रूकार मृत्यु हो गई। इसलिए राक्षस सेना तो सब की सब मुक्त हो गई है, वे तो अब जीवित न होगे। भगवान श्री रामचन्द्र जी ने विभीषण को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि वानर सेना ने हमारी सेवा कर के परम पद की प्राप्ति की है और राक्षस सेना को अन्तिम समय मेरा ध्यान आ जाने पर मुक्ति प्राप्त हुई है। ऐ विभीषण ! आवागमन के चक्कर से छूटने के यही दो उपाय ही है। सेवा तथा ध्यान तसव्वर। सेवा करने का प्रयोजन यही होता है कि अन्तिम समय ३स जीव को अपने इष्टदेव का ध्यान और तसव्वर आवे।”
      भाव यह है कि इसी प्रकार ‘अन्ते मति: सा गति’ मरण काल मे जो विचार भी सर्वोपरि होता है उसी के अनुसार ही मनुष्य को परलोक में गति मिला करती है परन्तु जीवन के अन्तिम क्षणो  मे श्रेष्ठ भावनाएँ ही हमारा साथ देवे – इस बात की निर्भरता मनुष्य के जीवन काल की दिनचर्या पर है। जैसे वातावरण में और जिस प्रकार की संगति में उसने समय व्यतीत किया होगा, उसी प्रकार के विचार अन्तिम क्षणो मे स्वतः उत्पन्न होगे। अतएव जीवन काल मे ही मधुर और विमल सत्संग, सदगुरू की सेवा व मालिक के नाम का भजन-सुमिरण के वातावरण मे जीवन व्यतीत करना चाहिये। यही जीवन का मुख्य उद्देश्य है। तब ही मरते समय परम पिता परमात्मा का ध्यान आयेगा।

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