राजा विश्वामित्र के प्रति महर्षि वाशिष्ठ जी की नम्रता का परिचय


      इस बात से तो सभी परिचित है कि कुदरत की तरफ से जो पानी बरसता है। वह ऊँची जगह पर नही ठहरता अपितु सपाटे से नीचे की और भागने का प्रयास करता है। मानव मात्र को पानी पीने के लिए सिर को नीचा करना पड़ता है। बिना नीचे झुके पानी नही पिया जा सकता है। इसी तरह रूहानियत मे भी नम्रता व दिनता के बिना ध्येय की पूर्ति होना कठिन है। जब तक मन मे नम्रता व दिनता की भावना न होगी तब तक लक्ष्य प्राप्ति मे सफलता नही हो सकती क्योकिं दीनबन्धु भगवान को केवल दिनता ही बाँध सकती है। जैसे कहा भी है-
।। दोहा ।।
ऊँचे  पानी   न  टिके, नीचे   ही   ठहराय ।
नीचा होय सो भर पिये, ऊँचा प्यासा जाए ।।  

।। दोहा ।।
दिव्या दिनता के रसहिं, का जाने जग अन्धु ।
भली   बिचारी  दीनता,  दीनबन्धु  से  बन्धु ।।

      बिना दीनता के अगर यह मनुष्य जप-तप, कर्म-धर्म अथवा कोई भी साधन करे। उसके साथ अंहकार हो जाने का भय होता है। अभिमान त्यागने से ही मनोरथ सिद्ध हो सकता है। जिस प्रकार जब तक विश्वामित्र राजा राज्य-मद तथा ईर्ष्या-द्वेष आदि के चुंगल मे फंसे रहे तब तक वे ‘ब्रह्मऋषि’ पद से वंचित रहे परन्तु जब अभिमान का त्याग करके नम्रता धारण कर ऋषि वशिष्ठ जी के चरणों मे गिरे तो जिस ‘ब्रह्मऋषि’ पद की आभिलाषा थी। वह प्राप्त हो गया। पूरी वार्ता पढ़िये –
      कुशिक वंश के राजा विश्वामित्र जी एक बार सेना के साथ शिकार के लिए निकले थे। चलते-चलते वे अपने राज्य से दूर महर्षि वाशिष्ठ जी के आश्रम के समीप पहुँच गये। नरेश विश्वामित्र जी का आगमन सुनकर वशिष्ठ जी ने एक ब्रह्मचारी सेवक द्वारा उनके पास समाचार भेजा कि ‘राजन! आप आश्रम के समीप आये है। इस नाते मेरा आतिथ्य स्वीकार करे।’ राजा विश्वामित्र पूर्व ही वशिष्ठ जी के तप के प्रभाव पर विश्वास रखते थे। दूसरा उनकी कीर्ति भी चारो और फैली हुई थी। इस बात से भी वे परिचित थे, इसलिए उन्होंने ऋषि वशिष्ठ जी का निमंत्रण स्वीकार कर लिया।
      तब समस्त सेना सहित सम्राट विश्वामित्र जी उनके आश्रम पर जा पहुंचे। महर्षि वशिष्ठ जी ने उन्हे राजोचित भोजन सामग्री प्रचुर मात्रा मे दी। भोजन मे किसी प्रकार की भी न्यूनता न थी। यह सब देखकर राजा विश्वामित्र पर बहुत आश्चर्यचकित हुए। उन्होने महर्षि जी से पूछा कि – ‘वन मे रहकर भी आपको यह सब भोजन साम्रगी अतुल मात्रा मे कहाँ से प्राप्त होती है?’ तब वशिष्ठ जी ने कहा – राजन! यह सब मुझे तपस्या के बल द्वारा प्राप्त न होकर नन्दिनी नामक ‘कामधेनु’ के प्रभाव से सुलभ है। महर्षि जी के मुँख से यह सुनकर राजा के मन मे लालच आ गया। जब वह आश्रम से राज्य की ओर जाने लगे तो उन्होने वशिष्ठ जी से कहा कि ‘महर्षि जी! आप मुझे यह गाय दे दो। विपरीत इसके जो कुछ भी चाहे मै आपको दे सकता हुँ।’ तब ऋषि जी ने कहा ‘राजन! ब्राह्मण गाै-विक्रय नही करता इसलिए मै आपको यह गाय देने मे असमर्थ हुँ।’ यह सुनकर राजमद मे चूर हुए विश्वामित्र उग्र स्वभाव होने के कारण उत्तेजित हो गये और उन्होने सैनिको को आज्ञा दी कि इस गाय को बलपूर्वक ले चलो।

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      परन्तु यह नन्दिनी कोई साधारण गाय तो थी नही कि जिसे सैनिक बलपूर्वक खींचकर ले जाते। जब सैनिको ने उसे हाथ लगाया ही तो गाय की हुँकार मात्र से तत्क्षण वहाँ शत-शत योद्धा उत्पन्न हो गये। जिन्होने की विश्वामित्र के समस्त सैनिको को मार भगाया। तब विश्वामित्र जी ने स्वयं वशिष्ठ जी पर आक्रमण किया। उस समय महर्षि जी कुश का ब्रह्मदण्ड से टकरा कर नष्ट-भ्रष्ट हो गये। इस प्रकार वे परास्त होकर उस समय तो लौट आए।
      तत्पश्चात कठोर तपस्या करके विश्वामित्र जी ने दिव्य शस्त्र प्राप्त किये तथा नवीन शक्ति-सम्पन्न हो महर्षि वशिष्ट जी पर पुनः आक्रमण किया। परन्तु वे दिव्य शस्त्र भी वशिष्ट जी के ब्रह्मदण्ड से छूकर टूट जाते। इस प्रकार स्वयं को दीन-हिन होता देख विश्वामित्र जी ने सोचा कि ब्रह्मबल ही श्रेष्ठ है। जिसको पाकर वशिष्ठ जी मुझसे भी अधिक पराक्रमी है। मै इनको किसी प्रकार अथवा किसी युक्ति द्वारा भी मार सकने में समर्थ नही हो रहा हूँ। क्षत्रिय की शक्ति ब्रह्मबल के धनी ब्रह्मार्षि का कुछ भी नही बिगाड़ सकती। यह सोचकर कि – ‘धिग्बलं क्षत्रिय बलं ब्रह्मतेजो बलं बलम्’ उन्होने राज-पाठ का त्याग कर दिया और तपस्या मे लीन हो गये।
      सैकड़ो वर्ष इन्हे तपस्या करते हुए बीत गये। यहाँ तक की उनकी उग्र तपस्या से इन्द्रासन भी डोलने लगा। स्वर्ग के राजा इन्द्र को इस बात का आंतक होने लगा कि कही विश्वामित्र मेरा आसन न छीन ले। यह सोचकर उसने (कुशिक – नरेश की तपस्या खण्डित करने के लिए) स्वर्ग से ‘मेनका’ अप्सरा को भेजा कि तुम जाकर विश्वामित्र को मोहित कर तपस्या को खण्डित कर दो। देवराज की आज्ञा पाकर मेनका विश्वामित्र के पास आई और इन्हे अपने हाव-भाव द्वारा मुग्ध करने लगी। अन्ततः मेनका की मुग्ध-क्रिया का वार विश्वामित्र के मन पर चल ही गया। वह तपस्या को छोड़ उसके चंगुल मे फँस गये। फल यह हुआ कि राजा दुष्यन्त की पत्नी शकुन्तला इन्ही की पुत्री थी।
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  तपस्या के मध्य मे उन्हें एक बार ब्रह्मा जी के दर्शन हुए। उन्होने विश्वामित्र जी को यह वरदान दिया कि ‘हम तुम्हारी तयस्या से अति प्रसन्न है। महर्षि वशिष्ट जी के स्वीकार करते ही तुम ब्रह्मऋर्षि बन जाओगे।’ किन्तु विश्वामित्र के लिए महर्षि वशिष्ठ जी से प्रार्थना करना अति अपमान जनक विषय था। दैवात् जब कभी वशिष्ठ जी से इनका मिलाप हो जाता तो वे इन्हे ‘राजर्षि विश्वामित्र’ ही कहकर पुकारते थे। यह शब्द विश्वामित्र जी के हदय मे शूल के समान लगा करता था। अतः यह सदैव वशिष्ठ का अहित करने की ताक मे रहते।
       एक बार विश्वामित्र ने किसी राक्षस को प्रेरित कर वशिष्ठ जी के सौ पुत्र मरवा दिये। इतनी शत्रुता करने पर भी वशिष्ठ जी ने विश्वामित्र को कुछ न कहा, अपितु शान्तचित्त व मालिक की भक्ति मे लीन रहे। उनके पुत्रो को मारकर भी अभी विश्वामित्र का हदय भरा नही। स्वयं भी वशिष्ठ जी को अपमानित करने का सदैव अवसर खोजते रहते थे। उनका हदय वैर तथा हिंसा की प्रबल भावना से भरा था। उन्होने अपनी तरफ से कोई कोर-कसर न छोड़ी। अन्ततः एक दिन स्वयं अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित होकर रात्रि मे छिपकर वशिष्ठ जी को मारने हेतु निकले क्योकि दिन मे तो कई बार भी आक्रमण करके भी इन्हे मुँह की खानी पड़ी थी।
      चाँदनी रात्रि थी। सभी और चन्द्रमा की विमल किरणें अमृत बरसा रही थी। उस समय कुटिया के बाहर वेदी पर एकान्त मे महर्षि जी अपनी पत्नी अरून्धती सहित बैठे थे। परस्पर सत्संग चर्चा हो रही थी। अरून्धती ने कहा – ‘स्वामिन! आह! आज कैसी निर्मल ज्योत्स्ना छिटक रही है।’ यह सुनकर महर्षि जी ने कहा कि ‘जिस प्रकार चन्द्रमा आकाश मे अपनी विमल रश्मियाँ बिखेर रहा है उसी प्रकार आजकल पृथ्वी पर विश्वामित्र के तप का निर्मल तेज प्रकाशित हो रहा है।’ महर्षि वशिष्ठ जी का इतना कुछ आनिष्ट हो जाने पर भी उनका पावन हदय अंहिसा तथा क्षमा से पूर्ण था, यद्यपि वे सब कुछ जानते थे।
      वशिष्ठ जी के मुख से ये शब्द कुटिया की ओट मे छिपे हुए जब विश्वामित्र ने सुने तब उनका हिंसक हदय स्वयं को धिक्कारने लगा क्योकि ये उस समय वशिष्ठ जी के प्राणान्त करने आये थे। मन मे अब पश्चाताप करने लगे। वशिष्ठ जी के प्रति किये गए नृशंस व्यवहार अब शनैः शनैः उनके हदय को क्षुब्ध करने लगे। मन में कहने लगे कि जिनके सौ पुत्रो को मैने अकारण ही मृत्यु के घाट उतारा। वही वशिष्ठ जी अपने पुत्रो के हत्यारे के प्रति एकान्त मे भी किस प्रकार अपनी पत्नी से मेरी किर्ति का बखान कर रहे है। ऐसे दया व सहिष्णुता के आदर्श महापुरूष को पुनः आज मै मारने के लिए कटिबद्ध होकर आया हुँ। इस प्रकार स्वयं को धिक्कारते हुए शस्त्र पृथ्वी पर गिरा दिये और दौड़ कर महर्षि वशिष्ठ जी के चरणों मे जा गिरे। 
      विश्वामित्र के महर्षि होने मे इतना दर्प, द्वेष तथा असहिष्णुता ही तो बाधक थी। आज वह मनोमालिन्य दूर हो गया। जिससे इनका अन्तःकरण परिष्कृत होकर अहिंसक बन गया। इस प्रकार नम्रता व दिनता के भाव से अनुताप करते हुए – चरणों पर पड़े विश्वामित्र को वशिष्ठ जी ने बड़े प्यार से उठाते हुए कहाँ कि ‘ब्रह्मर्षे!’ आज विश्वामित्र जी की सब हार्दिक अभिलाषाएँ पूर्ण हो गई तथा वशिष्ठ के प्रति जो मन-मुटाव रखते थे वह भी विदा हो गया। जिससे इनको परम शान्ति मिली।
      तात्पर्य यह कि महापुरूषो का जीवन अत्यन्त प्रभावशाली होता है। वे सहिष्णुता, प्रेम, दया एवं क्षमा के स्वरूप होते है। कोई जितना भी कठोर प्रकृति का क्यो न हो उसके मन को महापुरूषो के दिव्य चरित्र अवश्य एक न एक दिन परिवर्तित करने मे सफल हो ही जाते है। जिस प्रकार की विश्वामित्र ने ऋषि वशिष्ठ जी को कितने अपरिमित कष्ट पहुँचाये परन्तु वह राजा विश्वामित्र से कुछ न कहकर मूक हो सब कष्ट सहन करते गए, चूंकि उन्होने क्रोधादि शत्रुओ पर विजय प्राप्त कर ली थी। जिसके प्रभाव से एक दिन विश्वामित्र भी निरभिमान और विनयशील बनकर ‘ब्रह्मर्षि’ की पदवी को प्राप्त करने मे सफल हो गए।
      ‘यह है नम्रता व दिनता और विनय भावना का प्रत्यक्ष प्रमाण’

             
                     

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