राजा जनक के गुरू मुनि अष्टावक्र

      प्रंसग पढ़ने से पूर्व यह बात तो जान लिजिए कि जिन ब्रह्म ज्ञानी अष्टावक्र जी द्वारा राजा जनक को ज्ञान की प्राप्ति हुई वे कौन थे ।


      उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु थे और कहोड़ के पुत्र थे अष्टावक्र । अष्टावक्र के मामा थे श्वेतकेतु । उद्दालक मुनि की सेवा मे कहोड़ शिष्य बन कर रहते थे । अन्त मे उद्दालक मुनि ने इनका विवाह अपनी कन्या सुजाता से करा दिया । अष्टावक्र अभी माता के गर्भ मे ही थे कि एक दिन इनके पिता जी ने वेदो का पाठ अशुद्ध किया । यह सुनकर अष्टावक्र गर्भ मे पड़े वही से ही बोल उठे – ‘अभी आपको शुद्ध उच्चारण करना भी नही आ पाया ?’
      यह सुन अष्टावक्र के पिता कहोड़ को क्रोध आ गया । उन्होने कुपित हो अष्टावक्र को शाप दिया – ‘अरे ! तू पेट मे रहकर ऐसी टेढ़ी बाते बोलता है, अतः तू आठ अंगो से टेढ़ा हो जाए ।’
      सो इसी शाप के मिलने के कारण अष्टावक्र जी के शरीर मे आठ कूबड़ थे । जिससे यह आगे चलकर ‘अष्टावक्र’ के नाम से प्रसिद्ध हुए । अब आगे सुनिये –
      मिथिलापुरी के महाराजा जनक जी को ज्ञान प्राप्ति की प्रबल इच्छा लगी रहती थी । इसलिए वह अधिकतर प्रतिष्ठित विद्वानो को बुलाकर उनसे ज्ञान प्राप्ति की चर्चा किया करते थे । परन्तु जैसा वह चाहते थे, इतनी खोज करने पर भी अभी तक उन्हें वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति न हो सकी । अन्ततः राजा जनक ने एक बार अपनी नगरी मे यह ढ़िढ़ोरा पिटवाया और ऋषि-मुनियो के पास निमन्त्रण पत्र भिजवाये कि जो कोई विद्वान, ऋषि, मुनिजन हमे सच्चे ज्ञान की प्राप्ति का साधन बतायेगा उसे मै गुरू रुप मे स्वीकार करूँगा । इसके विपरीत यदि कोई ज्ञान देने में असमर्थ रहेगा तो उसे बन्दीगृह मे डाल दिया जायेगा ।
      जब यह ढ़िढ़ोरा राजा जनक ने पिटवा दिया तो घोषणा सुनकर दूर दूर से अत्यधिक विद्वान, पण्डित और ज्ञानी लोग राजा जनक को ज्ञान दर्शाने के लिए आने लगे । प्रत्येक ने अपनी अपनी बुद्धि अनुसार राजा को ज्ञान दिया लेकिन कोई भी राजा जनक की कसौटी पर ठीक न उतर सका । जिस कारण राजा का कारावास विद्वानो और पण्डितो से भरा जाने लगा ।
      अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी एक सुप्रसिद्ध पंडित और ऋषि थे, किन्तु दरिद्रता और कंगाली मे जीवन गुजार रहे थे । जब उन्होंने यह घोषणा सुनी तो मुँह माँगा इनाम पाने की लालच मे वे भी श्वेतकेतु के साथ राजा जनक की राजसभा में आये । परन्तु राजा को ज्ञान देने मे असफल होने के कारण इन्हे भी कारावास मे डाल दिया गया । 
      अष्टावक्र जी को जन्म लेने के बाद जब पिता को बन्दी बनाये जाने की घटना का पता लगा तो वह अपने पिता को राजा जनक के कैदखाने में से स्वतन्त्र कराने के लिए राजदरबार मे पहुँचे । ज्ञानी तो वह जन्मजात ही थे । उस जमाने मे आज की भाँति यातायात के साधन उपलब्ध न थे । अतएव पैदल चलकर ही यात्रा करनी पड़ती थी । मिथिलापुरी के दूर होने के कारण अष्टावक्र कई दिनों की कष्टप्रद पद यात्रा करते हुए मिथिला मे पहुँचे और सीधे महाराज जनक की राजसभा मे प्रविष्ट हो गए । अन्दर जाकर गुरूदेव के निमित्त बनाये गए सिंहासन पर इन्हे बैठते देखा तो अष्टावक्र जी के टेढ़े-मेढ़े कूबड़ वाले एवं काले-कलूटे रूप को देख महाराज जनक सहित समूची राजसभा खिलखिला कर हँस पड़ी । उन सबको हँसता देख स्वंय अष्टावक्र जी भी उस समय इतनी जोर से ठहाका मारकर हँसे कि उन सबकी हँसी इनकी ऊँची हँसी मे विलीन हो गई । अष्टावक्र जी के उच्च स्वर मे हँसने पर राजा जनक ने चकित हो उनसे प्रश्न किया – ‘ऋषि कुमार ! आप इस प्रकार क्यो हँस रहे हो ?’.
      तब अष्टावक्र जी ने कहा – ‘राजन ! यदि यही प्रश्न मे आपसे करूँ कि आप सब लोग अकारण क्यो हँसे ?’ अष्टावक्र जी ने राजा जनक के प्रश्न को काटते हुए प्रश्न द्वारा ही उत्तर दिया ।
      महाराजा जनक बोले – ‘ऋषि कुमार जी ! आप बुरा न मानियेगा – हम लोगों को आपके रूप-रंग पर अनायास ही हँसी आ गई थी तभी हम लोग हँसे थे ।’ प्रत्युत्तर मे अष्टावक्र जी ने कहा – ‘तो राजन ! बस, फिर यही उत्तर आप मेरा भी समझ लीजिए । मै भी आप लोगों के निराले रूप-रंग को देखकर ही हँसा था, फिर इसमें बुरा मानने की क्या बात है ? आपके सजे सजाये रूप-रंग के पीछे छिपी हुई कुरूपता को देखकर मुझे हँसी आ गई । मुझे तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यद्यपि आपने ज्ञान-प्राप्ति के लिए नगर मे ढ़िढ़ोरा पिटवा दिया है लेकिन वास्तव मे आप ज्ञान के ग्राहक नही अपितु चमड़े के ग्राहक है तथा आपकी यह सभा भी मुझे चमड़े की खरीदारी करने वाले चमारों की ही प्रतीत होती है । 
      अष्टावक्र जी द्वारा यह ज्ञान भरा वचन सुनकर महाराज जनक जी मौन रहे एवं राजसभा भी दंग सी रह गई । थोड़ी देर के बाद महाराज जनक जी ने दृष्टि उठाई तो उन्हे ऋषि कुमार की थकावट का विचार हो आया । वे सिंहासन से उठ खड़े हुए और ऋषि कुमार को अपने साथ महल मे ले आये । वहाँ उन्होंने बड़े आदर से ऋषि कुमार के स्नान, भोजन, आरामादि का प्रबन्ध किया । जब अष्टावक्र जी विश्राम करने लगे तब महाराज जनक जी आराम हेतु अपने महल मे चले गए, परन्तु आज उन्हे नींद कैसे आती । रह रहकर ऋषि कुमार के ये शब्द उनके कानों में गूँज उठते कि ‘महाराज जनक ज्ञान के नही बल्कि चमड़े के ग्राहक है ।’ यह शब्द आँखो के समक्ष आते ही उनकी नींद उचाट होने लगी । तत्पश्चात कुछ देर बाद ही राजा अपने पलंग से उठ खड़े हुए और अष्टावक्र जी के पास आकर उनके चरणों के निकट बैठ गये । दोनों हाथ जोड़कर ऋषि कुमार को प्रणाम करते हुए क्षमा माँगी और नम्रता भरे शब्दो से कहा – ‘महाराज ! अब तक मुझे ज्ञान देनेवाला कोई न मिल सका, परन्तु इस समय आपको देखकर मुझे ऐसा विश्वास हो गया है कि आप ही मुझे वह ज्ञान दे सकते है जिसे प्राप्त करने की मेरी चिरभिलाषा है । अतएव आप मुझ पर कृपा कर शीघ्र ही ज्ञान प्रदान किजिये ।’
      राजा जनक जी द्वारा की गई प्रार्थना को सुन अष्टावक्र जी हँस दिये और बोले – ‘वाह महाराज ! बिना कुछ दिए  आप यों ही मुफ्त मे ज्ञान प्राप्त करना चाहते है । (व्यंग्न कसते हुए) राजा लोगों के लिए ज्ञान प्राप्ति कितनी आसान है, जबकि हम बनवासी लोग उस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए सब कुछ त्यागकर जंगलों की खाक छानते है तब कही जाकर उसे (ज्ञान की) बड़े कठिनाई से प्राप्त करते है । वही ज्ञान राजाओ को घर बैठे अनायास ही सुगमता से प्राप्त हो जाए यह कितने आश्चर्य की बात है ?’
      यह सुन महाराज जनक मारे लज्जा के पानी पानी हो गए और अष्टावक्र के चरणों मे नतमस्तक हो गए । राजा जनक ने कहा – ‘नही ऋषि ! मै ज्ञान को मुफ्त में प्राप्त करना नही चाहता अपितु उसके बदले मे सारा खजाना देने को तैयार हूँ ।’
      ऋषिकुमार ने पुनः हँसकर कहा – ‘धरोहर मे पड़ी वस्तु किसी दूसरे को कैसे दी जा सकती है ? भला, बताओ क्या खजाना तुम्हारा है ? हमारे विचार से तो खजाना राज्य का है ।’
      अच्छा तो फिर मे आपको राज्य ही दे देता हूँ । राजा ने कहा ।
      अब की बार अष्टावक्र जी और भी जोर से हँसे और बोले – राजन ! तुमने फिर वही बात कही, यह राज्य तुम्हारा अपना कहाँ ? ऐसी निर्मूल वस्तु जो आज किसी एक की है तो कल दूसरे की, भला इसे लेकर मै क्या करूँगा ।
      ‘तब यह शरीर तो मेरा अपना है, यही मै आपके अर्पण करता हूँ । जनक जी ने सोचकर उत्तर दिया ।
      इस पर ऋषि कुमार ने तुरन्त ही कहा – ‘यह शरीर …यह मुझे देगे किन्तु इसका भी क्या ठिकाना ? एक तो यह सदा मन के अधीन रहता है तथा दूसरी बात यह नाशवान् भी है ।’
      तब जनक जी बोले – ‘तो फिर मै आपको इस तन व धन के साथ मन ही समर्पित करता हूँ ।’
      जनक जी से यह उत्तर पाना ही था कि अष्टावक्र जी के मुख पर प्रसन्नता के चिन्ह उभर आये । उन्होने हँसकर कहा – ‘राजन! अब हुई न बात, अच्छा ! तो तुम मुझे अपना मन ही संकल्प करके दे दो ।’
      तब महाराज जनक जी ने जल और कुशा लेकर अपना मन अष्टावक्र जी को अर्पित कर दिया । इसके बाद अष्टावक्र जी उठ खड़े हुए और बोले – ‘हां राजन ! अब तुम ज्ञान प्राप्ति के अधिकारी हो । परन्तु अभी तो मुझे जाने की जल्दी है क्योकि पिता जी को कारावास से निकाल कर घर तक पहुँचाना है । एक सप्ताह तक मै लौट आऊँगा तब फिर तुमको ज्ञान दिया जायेगा । हाँ…इस अवधि मे यह कभी मत भूलना कि तुम अपना मन मुझे संकल्प करके दे चुके हो ।’
      इतना कहकर वह चल दिये और जाकर बन्दीगृह खुलवाया । सभी ब्रह्मणो को स्वतन्त्र किया तथा अपने पिता कहोड़ ऋषि व मामा श्वेतकेतु को लेकर अपने आश्रम पर लौट आए । मार्ग मे समंगा नदी के समीप गुजरने पर इन्हे पिता ने कहा – ‘बेटा ! तुम इस नदी मे स्नान कर लो ।’ वैसा करने पर अष्टावक्र जी के सारे अंग स्वस्थ हो गये ।
      उधर अष्टावक्र जी के चले जाने के बाद राजा जनक जी की मनःस्थिति गज़ब थी । जब किसी काम को करने के लिए मन कहता तो सोचने लग जाते की मन तो ऋषि कुमार को दे चुका हूँ । इस प्रकार शनैः शनैः उनके मन का सब कारोबार ठण्डा पड़ने लगा । एक सप्ताह के बाद जब अष्टावक्र मुनि लौटे तो महाराज जनक बेचैनी से उनकी प्रतीक्षा की घड़ीयाँ गिन रहे थे । ऋषि जी ने आते ही पूछा – ‘क्यो राजन! कहो, क्या हाल है ।’
      जनक जी ने उत्तर दिया – महाराज ! क्या बताऊँ ? अपना मन आपके अर्पण करके मै अब किसी काम के करने योग्य नही रह गया हूँ । जहाँ किसी काम करने के लिए सोचता हूँ तो यही बात आड़े आ जाती है कि मन तो आपको दे चुका हूँ फिर सोचना और संकल्प करना कहाँ शेष रहा ?
      मुनि अष्टावक्र जी को जब राजर्षि जनक तन, मन, धन तीनो ही समर्पित कर चुके तब सदुपदेश देते हुए अष्टावक्र मुनि ने कहा – ऐ राजन् ! मनुष्य शरीर का मालिक आत्मा है । मगर मन अपनी कुचालो से जीव पर माया का पर्दा डालकर आत्मा के स्थान पर स्वयं मालिक बन बैठा है और आत्मा को सर्वथा भुला दिया है । मन प्रबल इन्द्रियो के वश मे हो चुका है और बुद्धि मन के अधीन हो चुकी है । इसीलिए ये सारा काम विपरीत हो रहा है । जैसे –               
।। दोहा ।।

       ऐ मिथिलेश ! ज्ञान की प्राप्ति के लिए बाहर नही जाना पड़ता । यह मनुष्य स्वयं ही आत्मिक ज्ञान का भण्डार है । मगर बिना पूर्ण सन्त-सतगुरू के जीव अपने रूप को नही पहचान सकता । जिस प्रकार किसी दीपक मे तेल व बत्ती पड़ी हुई हो मगर जब तक उसे दूसरे जलते दिपक अथवा दियासलाई से स्पर्श न कराया जाए उसमे ज्योति प्रकट नही होती इसी प्रकार सतगुरू के बताए नाम व शब्द के अभ्यास से, उनकी पवित्र सेवा से जिज्ञासु के हदय मे नाम व भक्ति का प्रकाश पैदा हो सकता है ।
       ऐ राजन ! आपने अनेकों विद्वानों की सभा बुलाई और आप उनसे आत्मिक ज्ञान लेना चाहते थे मगर जब वे स्वयं ही इस विद्या से अल्पज्ञ थे फिर वे आपको क्या ज्ञान दे सकते थे ? पूर्ण ब्रह्मनेष्ठी सदगुरू ही आत्मा की लक्ष्यता करा सकते है ।
      राजा जनक ने हाथ बांधकर नम्रतापूर्वक विनय की प्रभो ! बताइये मुझे वह साधन और आत्मज्ञान कराइये । 
      मुनि बोले – राजन् ! हम जैसा कहे, आप हमारी आज्ञा मानते जाइये ।
      राजा ने कहा – क्या आज्ञा है मेरे लिए प्रभु !
      ऋषि बोले – राजन् ! आप जाइये और जहाँ इन राज-कर्मचारियो ने जूते उतार रखे है, उनमे बैठ जाइये ।
      राजर्षि बड़े ही प्रशान्त भाव से मुनीश्वर की आज्ञा का पालन करते है । सारी सभा ने भी राजा जनक जी पर एक दृष्टि डाली परन्तु सब के सब आवाक् ही रहे । पांच मिनट तक यह कौतुक हुआ, क्योकि राजा जनक जी पूर्व जन्म के संस्कारी पुण्यात्मा, सच्चे मुमुक्षु और आत्म ज्ञान के पूर्ण अधिकारी थे जब उन्होंने ज्ञान प्राप्ति के लिए अपना तन, मन, धन संकल्प करके गुरूदेव को समर्पित कर दिया तथा अपनी लोक-लाज आदि का भी परित्याग कर बिल्कुल निर्मान हो रहे हो उनका मन अपने राज्य, परिवार, धन और तन के समस्त व्यवहार से उस समय बिल्कुल हट गया । संकल्प विकल्पो के रूकने की देर थी की उनकी सुरति अन्तर्मुख होकर ऊपर को उठने लगी । तब ऋषि जी ने अपनी दृष्टि से रूहानी दात बख्शिश कर दी जिससे उनकी अन्तर्दृष्टि खुल गई और गुरू कृपा से उन्हे सच्चा आत्मज्ञान प्राप्त हो गया । तब महर्षि जी ने राजा जनक जी को अपने समक्ष बुलाया और बोले – ‘राजन् ! कहो कितनी देर मे तुम्हे ज्ञान की प्राप्ति हुई ?’
      जनक – महाराज ! जितनी देर में मै चाहता था ।
      अष्टावक्र – तुम कितनी देर मे प्राप्त करना चाहते थे ?
      जनक – कि मुझे ज्ञान इतनी जल्दी प्राप्त हो जाए जितनी देर मे घोड़ा रकाब मे अपना दूसरा पैर रकता है, जितनी देर पलक झपकने मे लगती है और जितना समय पानी का घूँट पीने मे लगता है ।
      अष्टावक्र – हाँ, तो सब बात बन गई न ?
      जनक – आपने मुझ पर अपार कृपा की है । आपके इस असीम उपकार का मै आजीवन आभार मानूँगा । इतना कहकर राजा जनक गुरूदेव जी के चरणों मे डण्डवत् प्रणाम करते है ।
      अष्टावक्र जी उन्हे उठाते है और इतनी बात कह कर वहाँ से विदा होते है कि इस समस्त राज्य को अब हमारा समझ कर तुम इसकी सेवा करो । इस रीति से शासन करते हुए तुम्हे इस राजपद का अभिमान नही होगा । यह राज्य अब तुम्हारे हाथो मे हमारी ही धरोहर है । इसके पश्चात अपने गुरूदेव के आदेशानुसार राजा जनक जी राज्य का संचालन करने लगे । अपने गुरूदेव के वचनों पर अक्षरशः आचरण करने से ही महाराज जनक जी ‘विदेह मुक्त महापुरुष’ की उच्च पदवी को प्राप्त कर गये । जैसे नीचे दी गई इन पंक्तियो से स्पष्ट होता है –

।। शेअर ।।

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