राजा जनक का उत्तर

      राजर्षि जनक का नाम प्रायः सभी का सुना व जाना हुआ है । वे श्रेष्ठतम योगेशवर और अपने समय के महापुरूष थे । साधना व त्याग की मूर्ति महान् तपस्वी शुकदेव मुनि जी (जिन्होंने जन्म लेते ही संन्यास धारण कर लिया था) के गुरू थे । उनका जीवन आज भी विश्व के सभी जीवों के लिए अनुकरणीय है । किन्तु उनके मंत्री को ही एक बार संशय हुआ कि महाराज स्वयं को जनक विदेही कहलाते है । जबकि ये हर समय मोह-माया मे आसक्त है और हर प्रकार के सुख-ऐश्वर्य के पदार्थो का उपभोग भी हम जीवों की भांति ही कर रहे है । वह राजा जनक जी का मन्त्री होने के कारण विवेकशील तथा ज्ञान बुद्धि वाला था । इसलिए उसने सोचा कि इस बात का भम्र निवारण शीघ्र ही करवा लेना चाहिए ।
      राजर्षि जनक जी को एक दिन एकान्त में देखकर उनसे यह विनय कि मेरे एक संशय को दूर किजिये । जनक विदेही ने कहा – ‘कहो क्या बात है?’ मन्त्री ने पूर्ण वार्त्ता कह सुनाई । राजा जी ने पूरी गाथा भलीभाँति सुन ली और कहा कि समय आने पर आपको इसका उत्तर मिल जायेगा । 
      मन्त्री के जाने के पश्चात राजा जी ने सोचा कि इसके संशय का अवश्य निवारण करना चाहिये । महापुरूषो से जीव की हानि सहन नही होती । इसलिए अल्प समय मे ही मन्त्री की शंका का समाधान होने के लिए कारण बन गया । राज-दरबार के कार्य मे उनसे कोई गलती हो गई । इस पर राजा जनक ने अपने मन्त्री से नाराज होकर फाँसी का दण्ड सुना दिया । अब उस बेचारे को दिन को चैन नही रात को आराम नही । भूख-प्यास सब कुछ समाप्त, आखिर राजा का हुक्म था ।
      आज शाम को मन्त्री को सूली पर चढ़ना है और इधर जनक विदेही जी ने इनको निमन्त्रण भेजा कि आज दोपहर को हमारे महलों मे दावत है । निमन्त्रण पाते ही मन्त्री निस्तब्ध सा रह गया ‘यह कैसा कौतुक है ! न जाने विधाता ने क्या लीला रचाई है !! दोपहर को महलो मे मिष्ठान, पकवान और दो घण्टे के पश्चात जीवन का प्रस्थान !!! किन्तु राजाज्ञा है, किसी तरह टाल भी नही सकता ।’
      इधर राजर्षि ने अपनी रानियों को आदेश दिया कि आज छत्तीस प्रकार के व्यंजन बनाये जाये । खूब ही स्वादिष्ट हो परन्तु मीठी वस्तुओ मे शक्कर न हो, सब्जियो अथवा नमकीन पदार्थो मे नमक न हो । रानियाँ आश्चर्यचकित हो गई; किन्तु बाद मे समझ गई कि आज महाराज ने किसी की परीक्षा लेनी होगी या किसी को कोई नसीहत देनी होगी । 
      दोपहर हो गई, भोजन भी तैयार हो गया । मन्त्री जी बैठे मौत की घड़िया गिन रहे थे, कि राजदूत बुलाने पहुँच गया । राजाज्ञा पाते ही महल मे पहुँच गये । आज राजर्षि ने अपने साथ अपने मन्त्री को भोजन कराया । भोजन कर लेने के पश्चात राजा ने मन्त्री से पूछा – कहो भाई भोजन कैसा लगा ; मीठा, तीखा, नमक आदि ठीक था । किसी चीज की कमी तो नही थी ? मन्त्री ने कहा – महाराज! मुझे तो यह भी नही मालूम था कि मै बैठा कहाँ हूँ और क्या खा रहा हूँ । कहाँ मीठा-तीखा और कहाँ नमक व स्वाद, यहाँ तो आँखो के आगे फाँसी का तख्ता ही घूम रहा है । मैने तो आपकी आज्ञा का पालन किया, वरन् मेरे ख्यालो मे तो इस समय मृत्यु का ही चित्र बन रहा है, कि अभी डेढ़-दो घण्टो के पश्चात मेरा यहाँ नामो-निशान भी नजर नही आयेगा । इस समय मुझको काल की गोद के अतिरिक्त न कोई नजर आ रहा है और न ही किसी पदार्थ का स्वाद अथवा रस पता चल रहा है । राजर्षि जनक ने कहाँ बस यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है । आज तुम्हे अपनी मृत्यु की चिन्ता मे सब पदार्थों को ग्रहण करते हुए भी उनमे से कोई रसानुभूति नही हुई । मै तो हर समय, हर पल, हर घड़ी मृत्यु को स्मरण रखता हूँ । मै सब कार्य व्यवहार तो सर्वसाधारण के समान करता हूँ । मेरे कार्य-कलापो को देखकर जन साधारण यही सोचते है कि मै संसार के ऐशो-इशरत के बंधन मे बँधा हूँ, किन्तु वास्तव मे ऐसा नही है । सर्वसाधारण की भांति कार्य व्यवहार करता हुआ भी मै जगत् मे अनुरक्त नही । रूप सौन्दर्य की चकाचौंध करने वाली चमकदमक एवं भौगेश्चर्य की मोहक सामग्रियो का मुझ पर प्रभाव नही पड़ता । इसी भाँति संसार मे रहता हुआ संसार से निर्लिप्त हूँ ।
      महापुरूष फरमाते है कि शरीर से चाहे कार्य-व्यवहार करते रहो लेकिन अन्तर्मन से मालिक के नाम का सुमरण करो और अपना ध्यान उनके चरणो मे ही रखो । सन्त जगजीवन दास जी ने समझाते हुए कथन किया है –

                     

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