मृत्यु – सन्देश

।। दोहा ।।
दो बातों को भूल मत, जो चाहे कल्याण ।
नारायण एक मौत को, दूजा श्री भगवान ।।


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      महात्मा नारायण जी कथन करते है कि ऐ जीव! दो बातो को सदैव याद रख – एक अपनी मृत्यु को दूसरा ईश्वर को। जिन मनुष्य ने इन दोनो बातों को जीवन मे याद रखा वह पाप-कर्मो से बच जाता है। जिसने मौत व ईश्वर को भुला दिया वह मन व माया का शिकार हो गया। यह मत समझो की मौत को भुलाकर मृत्यु से छूटकारा मिल जायेगा। नही, मौत से तो कोई भी प्राणी नही बच सकता। जिसके दिल मे सदा मौत का भय बना रहता है। ऐसे ही वैराग्यवान् पुरुष को भगवान् प्रायशः याद आते है। जिसने मौत को भुला दिया उसके दिल मे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अंहकार होता है। जिसका अन्त मे बहुत भयानक परिणाम होता है। यह हम एक छोटे से दृष्टान्त से समझाते है –
      एक दिन की बात है कि कोई एक सम्राट घमण्ड मे चूर हुआ अश्व पर सवार होकर अपने मंत्री एवं सेना सहित शिकार खेलने के लिए किसी जंगल की और जा रहा था। मार्ग मे उसे एक व्यक्ति मिला जिसने अत्यन्त मलिन जीर्ण-शीर्ण कपड़े तन पर डाले हुए थे। उसकी आकृति का रूप रंग भी कुछ निराला ही था। उस अजनबी व्यक्ति ने कुछ समीप आकर राजा को इशारे द्वारा रूकने के लिए कहा – ‘राजन! मेरी बात सुन लो।’ परन्तु राजा ने स्वाभिमानवश उसे कुछ उत्तर न दिया। तब उस व्यक्ति ने पुनः पुकार कर कहा – ‘राजन! दो मिनट रूक कर मेरी बात तो सुन लो।’ लेकिन राजा के सिर पर तो अहंकार का भूत नृत्य कर रहा था। वह मन मे कहने लगा कि ‘मै तो इतना बड़ा सम्राट हूँ। एक कंगले की बात सुनने के लिए रूकना मेरे लिए अपमानजनक बात है।’ अतः उसने उस व्यक्ति की बात अनसुनी कर दी। 
      उस निराले व्यक्ति ने तीसरी बार फिर राजा से ये शब्द कहे – ‘राजन! मेरी बात आपको अवश्यमेव सुननी पड़ेगी।’ उधर सम्राट राजमद मे प्रमत्त होने के कारण उस व्यक्ति की बात सुनना अथवा उसके साथ वार्त्तालाप करने मे अपना अपमान समझता था। किन्तु उस व्यक्ति के तीसरी बार कहने पर राजा के मन्त्री को करूणा हो आई। उसने राजा से कहा – ‘महाराज! जब वह निर्धन व्यक्ति आपको बारम्बार पुकार रहा है तथा वह आपसे बात करना ही चाहता है तो आप रूक जाइये और उसकी बात सुन लिजिए।’ राजा ने मन्त्री के कहने पर रूककर उस व्यक्ति से पूछा कि ‘बता! तू क्या कहना चाहता है ?’ तब उस व्यक्ति ने कहा मै अन्य लोगों से अलग होकर आपसे एक बात करना चाहता हूँ। जिसे दूसरा कोई न सुन सके।’ 

      राजा ने उसकी बात स्वीकार कर ली। उस व्यक्ति को राजा ने धीरे से कहा कि ‘मै मौत का देव हूँ – लोगों के प्राण हरना ही मेरा काम है और आज मुझे तुम्हारे प्राण हर लेने का आदेश! मिला है।’ इतना सुनना ही था कि राजा का सब घमण्ड जाता रहा। मुख पर हवाईयाँ उड़ने लगी। राजा का समस्त शरीर प्रकम्पित होने लगा। राजा की इस प्रकार की बदलती हुई दशा को देखकर साथ वाले सब लोग आश्चर्यचकित हुए और सोचने लगे कि न मालूम इस व्यक्ति ने हमारे देश-सम्राट के कान मे क्या बात कह दी है। जिससे हमारे राजा का इस प्रकार क्षण भर मे ही मुख म्लान (उदास) हो गया हैं।
 
    राजा ने उस व्यक्ति से अत्यन्त दिनता व नम्रतापूर्वक कहा – ‘मुझे केवल इतना अवकाश दिया जाए कि मै घर जाकर अपने लड़के को राज-पाट का सब कार्य सौंप आऊँ।’ मृत्यु देवता ने उत्तर दिया कि ‘अब इतना समय नही है, चूँकि आपके जीवन की अवधि समाप्त हो चूकी है।’
      राजा ने पुनः करूण याचना करते हुए कहा – ऐ मृत्युदेव! कृप्या मुझे घोड़े से तो तनिक उतर लेने दो। तब उस देव ने कहा – ‘राजन! अब तो मै तुम्हे एक मिनट तो क्या आधा सैकण्ड का भी समय नही दे सकता।’ यह कहकर काल बली ने घोड़े पर बैठे हुए राजा के प्राण तत्क्षण हर लिए और स्वयं वहाँ से अन्तर्हित हो गए। तत्पश्चात राजा का निश्चचेष्ठ शरीर धड़ाम से अश्व पर से पृथ्वी पर आ गिरा। एक पल मे ही उस अंहकारी राजा का समस्त दर्प धूलि में मिल गया।
      इस दृष्टान्त का तात्पर्य समझाते हुए महात्मा नारायण जी कथन करते है कि –
।। दोहा ।।
      ऐ मनुष्य! संसार की झिलमिल तो चार दिन की चाँदनी की भाति है। इस पर तू गर्व न कर। इस संसार मे तो बड़े-बड़े चक्रवर्ती राजा-महाराजा आये और काल की एक ठोकर ने उनको मिटटी मे मिला दिया। अन्त मे उनका नाम भी इस संसार से लुप्त हो गया।

      इसलिए महापुरूष कहते है कि ऐ जीव! इस मानुष तन को पाकर मौत के भय को सदा दिल मे रख व परमात्मा का भजन कर व अपने इष्टदेव मालिक की सेवा कर जिससे मरणाेपरान्त तेरी आत्मा को नीच योनियों के कष्ट न भोगने पड़े तथा उज्जवल मुख लेकर संसार से विदा हो सके।         

    

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