मृत्यु अटल है

      विधाता की रचित सृष्टि मे दो पहलू साथ-साथ चलते है। जैसे सुख-दुःख, पाप-पुण्य, हर्ष-शोक, जन्म-मृत्यु आदि-आदि। वैसे ही जहाँ मनुष्य इस संसार मे जन्म लेकर आता है तो वहाँ उसके लिए मृत्यु भी अवश्यम्भावी है। यहाँ पर कोई भी स्थिर नही रह सकता। कर्मानुसार जीव जिस घर मे जन्म लेता है उसे सब अपना समझ लेते है तथा विलग होने पर उसके पीछे स्वार्थवश आँसु बहाते है। यह केवल अज्ञान व भम्र है। मौत तो सबके लिए अनिवार्य है। इस सत्यता को नीचे दिये गये दृष्टान्त मे इस प्रकार दर्शाया गया है –


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      एक बार कोई महात्मा जी घूमते-घूमते कही चले जा रहे थे। उन्हें सड़क के किनारे एक स्त्री मिली जो कि सिसकियाँ ले-लेकर करूण-क्रन्दन करती हुई राहगीरो का ध्यान बलात् अपनी और खींच लेती थी।
      सन्तो का हदय दया का सागर होता है। उन्होने उसके निकट जाकर उसके रोने-पीटने का कारण पूछा। उत्तर मे उस स्त्री ने बगल मे दाबे हुए एक बच्चे पर से चादर हटा दी और उसने बिलखते हुए सब वृत्तान्त कह सुनाया कि किस प्रकार उसका यह एकमात्र बच्चा कल संध्या समय कुशलपूर्वक उद्यान मे खेल रहा था कि एकाएक एक निर्दयी सर्प ने उसे डस लिया और वह….।
     ‘तो क्या वह मर चुका है ?’ सन्त जी ने पूछा। महात्मा जी के आगे वह हाथ जोड़कर बोली – ‘महात्मन्! मुझ दुखिया पर दया करो और अपनी अलौकिक शक्ति से इस मृतक बच्चे मे प्राण डाल दो। एक दुखिया माँ की दुआएँ जीवन भर आपके साथ रहेगी। दया करो! दया करो!!’ रो-रोकर उसने अपने आँसुओ से सन्त जी के चरण धो डाले। 
      अत्यन्त स्नेह और दया से आप्लवित शब्दो मे सन्त जी ने उत्तर दिया कि – बहन! संसार मे जीवन अन्यन्त दुःखमय है। कारण, मृत्यु सब पर आती है इससे कोई भी बच नही सकता। यद्यपि मै तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण कर सकता हूँ, बस तुम्हे केवल इतना करना है कि जाकर किसी ऐसे घर से कुछ राई के दाने माँग कर ले आओ कि जिस घर मे आज तक मृत्यु न हुई हो।
       महात्मा जी के यह वचन सुनकर उस दु:खिया स्त्री को कुछ ढ़ाढ़स बँधा कितुं वह पूर्ववत् रोती-चिल्लाती और सिर धुनती हुई – साथ ही कुछ आशा का दामन पकड़े राई के दाने लेने को गई।
      दुःख की मारी माँ अपने बच्चे को छाती से चिपटाये दर-दर राई के दाने माँगने लगी। परन्तु जब वह अपना प्रश्न उनके आगे रखती तो उसका प्रश्न सुनकर सब मौन हो जाते। एक भी घर उसे ऐसा न मिला जहाँ मृत्यु की छाया न पड़ी हो।

      दुःखिया माँ इसी प्रकार दर-दर भटकती रही। अब भी उसने आशा का दामन न छोड़ा था। कदाचित् कोई न कोई घर तो ऐसा मिल ही जायेगा कि जहाँ आज तक कोई मरा न हो ताकि वह वहाँ से राई के दाने ले जा सके। वह सारे गाँव मे घूम आई परन्तु एक भी घर ऐसा न मिला जहाँ किसी की मृत्यु न हुई हो। वह निराश हुई और उसी प्रकार रोती चिल्लाती हुई महात्मा जी के चरणों मे आ गिरी और सिसकियाँ भरते हुए असफलता का सारा वृत्तान्त कह सुनाया।                
      दयालु और उदारचित्त महात्मा जी ने उसकी बात सुनी और स्नेहपूर्वक बोले – भाग्यवती! तुमने सभी जगह घूम फिर कर देख लिया किन्तु तुम्हे एक घर भी ऐसा न मिल सका जहाँ की कोई आज तक न मरा हो। अतः तुम स्मरण रखो कि इस संसार मे जो भी जीव जन्म लेकर आता है उसे अवश्य ही एक दिन मृत्यु के मुख मे जाना है।
      एक तुम ही संसार मे दुःखी और व्याकुल माँ नही हो अपितु तुम्हारे सदृश और भी सैकड़ो माताएं इसी प्रकार रूदन करती हुई मिल जायेगी।
      पुनः महात्मा जी ने यह वचन फरमाये कि – देवी! इस संसार से चित्त लगाने का परिणाम यह है कि आज तुम कितनी दुःखी हो रही हो। इस दुःख से छुटकारा पाने के लिए हम तुझे नाम की विधि बतलाते है। जिसका प्रतिदिन अभ्यास करने से तुम्हारे मन को शान्ति प्राप्त होगी, इसके अतिरिक्त शान्ति प्राप्त करने का अन्य कोई साधन नही है। 
      महात्मा जी के उपदेश से उस दुःखिया स्त्री के दिल पर संसार की असारता का चित्र खिच गया। वह अब वास्तविकता को समझ गई तथा उसने अन्तरात्मा मे सच्ची शान्ति प्राप्त करने का प्रयत्न किया। तात्पर्य यह है कि –
।। दोहा ।।
यह दुनिया दो रोज की, मत कर या से हेत ।
गुरू चरणों से लागिये, जो पूरण सुख देत ।।
     

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