महाभारत युद्ध से पहले अर्जुन का श्री कृष्ण से क्या प्रश्न था ? जानिये

      महाभारत का युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व जब अर्जन श्रीकृष्ण भगवान जी के साथ रथ पर बैठ कर समर भूमि मे आया तो विपक्षी-दल में अपने सगे-सम्बन्धियो एवं गुरूजनो को देख कर भगवान श्रीकृष्ण जी से कहने लगे, ‘हे मधुसूदन ! जिन पुज्य गुरूवरो ने मुझे इतने प्यार से धनुर्विद्या की शिक्षा दी है तो क्या आज उस शिक्षा का बदला उन्हें तीखे बाणो द्वारा मृत्यु-शय्या पर सुला कर दूं। जिन पूर्वजो ने मुझे अपने रक्त से पोषित कर इस योग्य बनाया तो क्या मै उनका इन बाणो से सत्कार करूँ ? यह मुझसे तो न होगा। ऐसे वीर कहलाने से तो मेरा कायर कहलाना ही अच्छा।’ मोह, भ्रम और अज्ञान के गहरे गर्त मे अर्जुन को गिरता देख भगवान श्रीकृष्ण जी ने दोनो सेनाओ के मध्य मे उसे उदबुद्ध (जागृत) करने के लिए यह उपदेश दिया –

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।। सेअर ।।
आज  हर दो  फौज  मे  जितने  दिलावर  है  खड़े ।
वह बिला कोशिश तेरी  मुलके अदम  को जायेगे ।।
ठान कर लड़ने की अब तू अपनी शोहरत को बढ़ा ।
दुश्मनो  को जेर  कर और सल्तनत का खत उठा ।।
उनको तो मैने  पहले  ही  मरग तक  पहुँचा  दिया ।
तू   बराये  नाम   पर   सामान  उनकी  मौत  का ।।
       भाव यह है कि भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी फरमाते है कि ‘हे अर्जुन ! यह सब तो पहले से ही मेरे मारे हुए है तू तो केवल निमित्त बन कर कर्त्तव्य कर।’ 
इसी पर एक प्रमाण है –
      जब महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला था तब कौरव और पाण्डवों ने दूसरे देशो मे अपने-अपने सन्देश-वाहक भेजे कि हमारे पक्ष मे युद्ध करने को आओ क्योकि वह धर्म-युद्ध था। इसलिए जो कुरूक्षेत्र की भूमि मे आता उससे यह पूछ लिया जाता कि तुम किस पक्ष मे भाग लोगे ? वह प्रसन्नता से जिस दल की ओर से लड़ना चाहता, दोनों पक्ष वाले उसे सहर्ष स्वीकार कर लेते थे।
      एक बार ऐसा हुआ कि रण-भूमि मे एक शूरवीर योद्धा भगवान श्रीकृष्ण जी के आगे से निकला। भगवान श्रीकृष्ण जी ने उससे पूछा कि ‘तुमने युद्ध मे किस पक्ष की ओर से लड़ना है? बतलाओ !’ उस योद्धा ने प्रत्युत्ता मे कहा, ‘महाराज ! जो दल पराजित होगा मै उसी दल का पक्ष लूँगा।’ भगवान उसके इस अनोखे उत्तर को सुनकर बडे हैरान हुए। वे जानते थे कि पराजित तो कौरव दल ने ही होना है; प्रकट मे उस वीर ने कहा, ‘क्या तुम अपनी वीरता की कोई परीक्षा दे सकते हो?’
      तब योद्धा ने कहा कि ‘आप मेरी परीक्षा लीजिये। मै अपना बाण इस पेड़ पर चलाता हुँ, मेरा तीर इस पेड़ के सब पत्तो मे छेद कर मेरे पास वापस लौट आयेगा।’ इतना कह उस योद्धा ने तरकश से तीर निकाला और कमान पर चढाया। इतने में भगवान श्रीकृष्ण ने उस योद्धा की नजर बचाकर पेड़ का एक पत्ता तोड़ अपने चरण के नीचे छिपा लिया। योद्धा ने अपना निशाना साध कर बाण छोड़ दिया। वह बाण पेड़ के सब पत्तो को बेधता हुआ भगवान कृष्ण जी के चरणो पर आ खड़ा हो गया। तब उस वीर ने भगवान जी से कहा, ‘भगवन ! आप चरण दूर कर लीजिये कदाचित कोई पत्ता आपके चरणो के नीचे है। इसलिए अगर आप चरण दूर न करेगे तो मेरा बाण आपके चरणो को छेदता हुआ पत्ते के पास पहुँच जायेगा।’
      भगवान श्रीकृष्ण ने उस योद्धा का कहा मान कर अपना चरण दूर कर लिया। तब वह बाण उस पत्ते को बेध कर वापस योद्धा के पास पहुँच गया। अब भगवान ने वृक्ष की तरफ देखा तो सब पत्ते छिदे हुए थे। यह देख भगवान श्रीकृष्ण चकित हो दिल मे सोचने लगे कि यदि ऐसा शूरवीर योद्धा कौरव दल मे सम्मिलित हो गया तो पाण्डव दल का विजयी होना कठिन ही नही, असम्भव है और हमारी सारी योजना पर पानी फिर जायेगा। कुछ देर सोचने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने उस वीर से पूछा कि ‘जहाँ तुम इतने शूरवीर हो वहाँ दानी भी अवश्य होवोगे।’
      वीर ने कहा – ‘हाँ महाराज ! मै दानी भी हूँ।’ भगवान श्रीकृष्ण ने कहा – ‘हम तुमसे दान मे जो चीज माँगे तुम दे दोगे?’ तब उस योद्धा ने कहा – ‘अवश्य दे दूँगा।’ उसकी स्वीकृति पर श्रीकृष्ण चन्द्र जी ने कहा – ‘हमे तुम्हारे सिर की आवश्यकता है।’ तब योद्धा कहने लगा, ‘अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वैसे तो मुझे सिर दे देना चाहिये परन्तु मै तो इस युद्ध का कौतुक देखने को आया था।’
      उसकी यह बात सुन भगवान ने उसे सान्त्वना दी की ‘हम आपके विचार को पूरा करेगे। यह हम पर छोड़ दो, तुम युद्ध का पूरा कौतुक देख सकोगे।’ ऐसा सुन योद्धा ने उसका सिर काट कर धड़ से अलग कर दिया और एक बाँस पर उसके सिर को स्थिर कर कुरूक्षेत्र के एक कोने मे वह बाँस गाड़ दिया। तत्पश्चचत युद्ध आरम्भ हो गया।
      जब अठारह दिन मे अठारह अक्षौहिणी सेना काम आ गई और बड़े-बड़े शूरवीर भी वीरगति को प्राप्त हो गए तथा युद्ध समाप्त हो गया तब भगवान श्रीकृष्ण ने उस योद्धा का सिर बाँस पर टँगा था नीचे उतरवाया और उस सिर से पूछा कि ‘क्या तुमने युद्ध का कौतुक देख लिया है?’
      तब उस सिर ने उत्तर दिया – ‘हाँ! मैने सब दृष्य देख लिया है।’ तब भगवान ने पुनः उससे पूछा – ‘तुम्हे इस युद्ध मे सबसे बड़ा शूरवीर योद्धा कौन दृष्टिगोचर हुआ?’ तब उस योद्धा ने उत्तर दिया कि ‘भगवन ! मुझे तो इस विशाल सेना मे एक भी शूरवीर दिखाई नही दिया। यहां तो आपका सुदर्शन चक्र ही चलता हुआ दोनो पक्षो के वीरो को काटे जा रहा था और सब शूरवीर तो केवल नाममात्र ही युद्ध कौशल का अभिनय कर रहे थे।’ यह कहकर वह सिर शान्त हो गया।
      इस दृष्टान्त का साराशं यह है कि परमार्थ के कार्यो मे अथवा अपने इष्टदेव जी की सेवा करते समय जीव को यह गर्व कदापि नही करना चाहिये कि ‘मै ही यह कार्य कर रहा हुँ।’ सतपुरूष तो एक तिनके से भी पहाड़ गिरवा सकते है। ऋद्धि-सिद्धि तो उनके चरणो की चेरी होती है। जीव को परमार्थ पथ पर चलाने के लिए वे उसे प्रत्येक कार्य मे प्रत्यक्ष रूप से एक निमित्त बना देते है लेकिन गुप्त रूप से उनकी ही अलौकिक शक्ति काम कर रही होती है। इसलिए सेवक को अपने पे अभिमान से कोसो दूर रहना चाहिए। अपने को कर्ता न मानकर वह अपने सतगुरू जी को ही सब कुछ करने वाला समझे तथा गुरू दरबार की सेवा करते हुए अपने धन्य भाग्य मनाये। कभी भी मन के धोखे मे न आकर यह गर्व न करे कि इस कार्य को करना वाला मै हुँ। गर्व करने वाला सेवक सदगुरू की सेवा के फल से वंचित रह जाता है। निष्काम भाव से सदगुरू की की हुई सेवा फलदायक हुआ करती है। ऐसी सेवा करने वाले सेवक ही भक्ति के धन से मालामाल हो जाते है 

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