मन की स्वच्छता पूर्ण स्वच्छाता

      प्रत्येक व्यक्ति सफाई को ही पसन्द करता है। संसार मे कोई भी मनुष्य ऐसा न होगा जिसको गन्दगी से प्रेम तथा सफाई से घृणा हो। व्योवृद्ध सभी को स्वच्छता एवं सुन्दरता ही प्रिय लगती है। आप एक छोटे से अनजान बालक को ही देख लिजिए वह अस्वच्छ व असुन्दर वस्तु कदापि पसन्द नही करेगा। यदि किसी मेहमान को घर मे बुलाना हो तो लोग घर की एवं तन की सफाई दिलो-जान से पूरा समय देकर करते है। इस कारण यह होता है कि आया हुआ मेहमान ये ना सोचे की इनके घर मे सफाई नही है या ये लोग साफ नही रहते और भविष्य मे उनके घर जाने के लिए वह इच्छा ही न करे। परन्तु यह सब तो दुनिया मे बाहरी सफाई करने तथा शान या इज्जत बनाने के साधन है। किन्तु विचार यह करना है कि क्या मनुष्य संसार मे केवल बाह्मा शान इज्जत बनाने के लिए अथवा ऊपरी सफाई रखने के लिए आया है या मालिक की दरगाह मे भी इज्जत पाने के लिए आया है? सन्त-महापुरुष फरमाते है कि मनुष्य प्रभु-भक्ति करके मालिक को प्राप्त करने के लिए ही संसार मे आया है। इसके लिए बाह्म सफाई की इतनी अहमीयत नही है। अपितु मन की सफाई पर ही वह जोर देते है। उनकी वाणियों मे यह भी उपदेश दिया गया है कि मन की ही सफाई, मन से ही युद्ध करो और मन को ही अपना गुलाम बनाने की चेष्टा करो। नित्यप्रति नाम का चिन्तन से मन शुद्ध व निर्मल होता है। साथ ही साथ वे यह भी हिदायत करते है कि मन मे से काम, क्रोध, लोभ, मोह व अंहकार आदि गन्दगी को बाहर निकाल फैको लेकिन यह सब तभी हो सकता है जबकि सन्त-महापुरूषो के सदुपदेशों को पूरा-पूरा क्रियात्मक रूप मे मनन किया जाए। वह हर समय जीव को मन के संवारने व सुधारने के लिए चेतावनी देते रहते है। अपनी आध्यात्मिक शिक्षा से संसारी लोगो को उनका वास्तविक उद्देश्य स्मरण कराते है। तभी तो सन्तों ने कहा है –   
।। दोहा ।।
अर्थात् सन्त-सदगुरू का उपदेश साबुन है। वे जीव को ऐसी ज्ञान बुद्धि प्रदान करते है कि जीव सुरति को शब्द के साथ जोड़कर अभ्यास करता है और धीरे धीरे मन मे से गन्दे विकारो को निकालने का भरसक प्रयत्न करता है। जिसके परिणाम स्वरूप मन शुद्ध व स्वच्छ होकर नाम के रंग मे रंगा जाता है। इसी प्रकार जीवों को समझाने हेतु हम आपको आसान तरीके मे काहनी के माध्यम से दर्शते है कि मन की सफाई ही वास्तविक सफाई है –
      एक समय की बात है, एक काफिला कहीं जा रहा था। मार्ग मे उसका एक ऊँट कही दूर निकल कर मार्ग भूल गया। भटकने के कारण वह भूख प्यास से व्याकुल हो रहा था। इसलिए उसे अपनी सुधि न रही। बेसुध होने के कारण वह बिना देखे भाले भागता ही चला जा रहा था। आगे एक कुँआ आ गया जिसकी मुंडेर अधिक ऊँची न थी। वह उसमे गिर कर मर गया। समीप ही एक गांव था। उस ग्राम के निवासी इसी कुँए का पानी प्रयोग मे लाते थे।    
      दूसरे दिन उस गांव के लोग कुएँ मे से पानी भरने गये तो उसमे दुर्गन्ध फैली हुई थी। सब ग्रामीण परस्पर सोचने लगे – न जाने पानी में से दुर्गन्ध क्यो आ रही है? हर किसी ने अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार विभिन्न उपाय बतलाये कई बुजुर्गो एवं पंडितो से पूछा आखिरकार एक पंडित ने कहा – पांच सौ घड़े पानी इसमे से बाहर निकाल फैको। सभी ग्रामीण पानी निकालने मे जुट गये परन्तु तब भी कोई अन्तर न हुआ। पंडित जी से फिर दुबारा पूछा गया तो उन्होने कहा – इसमें कोई सुगन्धित वस्तु इत्र आदि डाल दो। लेकिन सुगन्धित वस्तुएँ डालने पर भी दुर्गन्ध नही गई बल्कि समय की गति के साथ-साथ दुर्गन्ध भी बढ़ती गई। अब फिर पंड़ित जी का द्वार खटखटाया। जहां तक उनकी ब्रद्धि सीमित थी उन्होने उसी के अनुसार उपाय भी बतलाना था। पुनः पूछने पर उन्होने कहा कि अब की बार इसमे गंगा जल डाल दो। लोगों को यह विश्वास था कि अब तो अवश्य दुर्गन्ध काफूर हो जायेगी, लेकिन कहाँ! वह तो घटने का नाम ही नही लेती थी।  
      सभी ग्राम निवासी चिन्तित हो गए कि यहाँ अन्य कोई पानी का साधन भी नही है अब करे तो क्या करे? इतने मे वहाँ से एक सन्त महात्मा जी गुजर रहे थे। सभी लोगो को हैरान-परेशान और दुःखी देखकर उनसे न रहा गया। उन्होने समीप आकर कहा – ‘अरे भाई!  कौन सी ऐसी जटिल समस्या है जिसका समाधान नही हो रहा है और आप लोग असमंजस मे पड़े हुए है?’ ग्राम निवासियो ने विनय कि – ‘महाराज! आप ही हम पर दया किजिए। दो तीन दिन से इस कुँए के पानी में से दुर्गन्ध आ रही है। इन पंडित जी के कहने पर कई उपाय किये लेकिन यह दिनो दिन बढ़ती ही जा रही है। अब कृपा करके आप ही बताइये कि यह दुर्गन्ध कैसे दूर होगी?’ सन्त महापुरुष दूरदर्शी होते है। थोड़ी देर विचार करने के पश्चात उन्होंने कहा कि यह दुर्गन्ध कही बाहर से तो नही आ रही। जब कुएँ के अन्दर ही पैदा हुई है तो पहले इसके भीतर जाकर देखो कि कोई ऐसी वस्तु तो न गिरी जिसकी सड़ाध से दुर्गन्ध फैली हो। महात्मा जी के कथनानुसार एक व्यक्ति ने कुएँ मे जाकर देखा तो सचमुच एक ऊँट का मृतक शरीर पड़ा था। महात्मा जी ने कहा कि पहले इस मृतक ऊँट को बाहर निकालो। फिर कुएँ का पानी निकालकर सफाई करो। इसके बाद कुएँ का पानी स्वच्छ व निर्मल हो जायेगा। अतः महात्मा जी के कथनानुसार पहले मृतक ऊँट को निकाला गया फिर कुएँ की सफाई की गई तो पानी की दुर्गन्ध भी जाती रही।   
      सन्त महापुरुष जीव को समझाने के लिए इतनी रचना रचाते है। इस दृष्टान्त का तात्पर्य यह है कि जीव की सुरति भी इसी प्रकार मोह-माया-अहंकार आदि के विकारो से मलिन हो चुकी है। अपनी बुद्धि व विचारों के अनुसार दान-पुण्य आदि अनेक कर्म करता है लेकिन अपने लक्ष्य को प्राप्त करने मे उसे सफलता नही मिलती। यह सब तो उसी भाँति हुआ जैसे ग्राम निवासी ऊँट के मृतक शरीर पर इत्र-फुलेल और गंगा जल आदि डालते रहे। उनका सारा समय और परिश्रम व्यर्थ हो गया। इसी प्रकार मन की मलिनता को भी सत्पुरूषो द्वारा बतलाई गई युक्ति द्वारा ही दूर कर सकते है। उनके पास हर एक जीव के लिए हर प्रकार के साधन विद्यमान रहते है। वे कार्य को सरल एवं सुगम बना देते है। महापुरुष यही फरमाते है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार आदि विकारो को हदय से निकाल कर नाम का सुमिरण करो अथवा सुरति को सदगुरू के शब्द के साथ जोड़कर मन को स्वच्छ व निर्मल बनाकर ही लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। अतः मालिक को प्राप्त करने के लिए मन की सफाई करके प्रभु-नाम का सुमिरण करना नितान्त आवश्यक है। जैसे रामायण मे भी श्रीरामचन्द्र महाराज जी ने फरमाया है –
।। चौपाई ।।

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