मन की प्रकृति

   

                                                                        adhyatam gyan   

   

      संसार के जितने भी कठिन से कठिन कार्य है उन कार्यो को मनुष्य का मन सहर्ष कर लेता है परन्तु प्रभु का भजन करना इसके लिए अति कठिन है ।
      जैसे पानी को नीचे ले जाने मे तो किसी प्रकार की कठिनाई आड़े नही आती यदि उसे ऊपर की और ले जाना हो तो कितना अधिक परिश्रम करना पड़ता है । ठीक यही अवस्था हमारे मन की भी है । इसी सत्यता को हम दृष्टान्त के माध्यम से समझाते है –
      एक बार एक सन्त जी जयपुर मे एक मन्दिर का निर्माण करवा रहे थे । कुछ मजदूर वहाँ काम किया करते थे । सायंकाल सभी श्रमिकों (मजदूरो) को अपना अपना पारिश्रमिक भी मिल जाता था ।
      एक दिन एक ब्राह्मण ने उस साधु के यहाँ सेवा करने के लिए विनय की । साधु ने उस ब्राह्मण को दैनिक मजदूरी नियत करके उसे एक आसन और माला सौंप दी और कहा कि तुम इस स्थान पर बैठ जाओ और केवल ‘राम-राम’ कहते रहो । सांय समय मजदूरी लेकर अपने घर चले जाना । ईंट, पत्थर, गारा ढ़ोने मे तुम्हे कष्ट होगा ।’
      वह ब्राह्मण माला लेकर भजन मे बैठ तो गया परन्तु थोड़ी ही देर मे वह उकता गया । मन न लगने के कारण इधर उधर देखने लगा । एक मजदूर उचित ढ़ग से काम न कर असावधानी से कर रहा था । उसे देखकर वह ब्राह्मण मजदूर को झिड़कने लगा कि ‘इस तरह से नही, बल्कि इस विधि से काम करो ।’ मजदूर और ब्राह्मण की बात सुनकर उस साधु ने कहा – ब्राह्मण देवता ! तुमको इस झगड़े से क्या पड़ी है ? जैसा उसके जी मे आये उस को वैसा ही करने दो । तुम तो अपना भजन करने मे ही मग्न रहो ।
       साधु महाराज जी से यह सुन कर ब्राह्मण बोला – हम इस प्रकार अपनी आँखो के सामने काम को बिगड़ता हुआ नही देख सकते और न ही चुपचाप नुकसान को सहन कर सकते है । हाँ, अगर आप मेरे इस कार्य से अप्रसन्न है तो यह लो अपनी माला व आसन । हम से तो यह भजन करने का झंझट नही होता । इसके बदले मे मजदूरी करके धन कमा लूँगा । इतना कहकर वह ब्राह्मण माला फैंक कर वहाँ से चला गया । 

      यह देखकर उस साधु ने सन्त जी के श्री चरणों मे विनय कि – ‘देखिये ! महाराज मजदूरी करने से भी भजन करना लोगो को कितना मुश्किल लगता है ।’ 
      तब सन्त जी ने उस साधु को फरमाया – ‘यद्यपि आपने तो उसके हित व भलाई की बात सोची थी कि इसी बहाने से उसका समय व मन मालिक के भजन-सुमिरण की और लगेगा परन्तु यह मन तो भजनाभ्यास मे बड़ी कठिनता से लगता है । मन पर नियन्त्रण रखने के लिए इसे बड़ी साधनाओ मे से गुजरना पड़ता है और यह उसे सहन न कर सकने के कारण अनेको प्रकार के बहाने बनाता है।’  
      अर्थात् सांसारिक कार्य जैसे राग रंग, किसी से मिलना जुलना, लेना-देना, निन्दा-स्तुति करना आदि मन को रुचिकर लगते है परन्तु भजन करने के समय तो मन आनाकानी करने लगता है तथा मालिक के भजन से जी चुराने के लिए यह सौ-सौ बहाने बनाने लगता है ।  
      तात्पर्य यह है कि सन्त सत्पुरूष अपने सहज स्वभाव के अनुसार आदि काल से ही जीवमात्र के हितचिन्तक रहे है । उनकी पावन श्री मौज व उनका प्रयत्न भी यही होता है कि यह जीव जो कि कई जन्मो से मन तथा काम-क्रोध-लोभ-मोह-अंहकार आदि शत्रुओ से बचा सके । 
      अर्थात् संसार मे उन भाग्यशाली जीवो का ही वास्तव मे जन्म लेना सार्थक है जो पूर्ण पुरूषो की चरण-शरण ग्रहण कर उनके पद चिन्हों पर चलते है तथा मन, इन्द्रियो व इच्छाओं आदि का दमन कर अपनी सुरति को सदैव योग साधन मे जोड़कर आत्मा का साक्षात्कार करते है । वे ही जीव सच्ची शान्ति प्राप्त कर लेते है । वस्तुतः मानव का यही सच्चा लक्ष्य है ।                                      

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