मनुष्य के गुण व अवगुण

 गुण व अवगुण प्रत्येक मनुष्य मे पाये जाते है। अगर कोई भी मनुष्य किसी के गुण न देखकर अवगुण पर दृष्टि रखे तो उस मनुष्य की बड़ी भूल है। विशेष कर जिज्ञासुओ को दूसरे के गुण देखने का ही प्रत्यन करना चाहिये। 
जैसे हंस के सामने दूध व पानी मिलाकर रख दिया जाये तो हंस केवल दूध पीकर पानी को छोड़ देगा। मनुष्य को भी दूसरे के गुण ग्रहण करने का स्वभाव बनाना चाहिए।  
      तभी तो सन्त सत्पुरूषो ने गुरूमुखो की हंस से तुलना की है तथा अवगुण ग्रहण करने वाले मनुष्यो को जोंक के समान बताया है।  
      इसी विषय को प्रदर्शित करने के लिए एक दृष्टान्त दिया जा रहा है –
      किसी मनुष्य के पास एक अति सुन्दर कपिला गाय थी। वह उसे अति प्रिय लगती थी। दिन होते ही धेनु मीठा अमृत तुल्य दूध देती थी। जब वह व्यक्ति कार्य करता-करता श्रान्त हो जाता तो संध्या समय वह कपिला गाय पुनः एक लोटा दूध का देती कि लो, यह दूध पियो और अपने श्रान्त शरीर मे नवीन शक्ति का संचार करो।
      उस व्यक्ति के अपने शब्दो मे –
      सूर्योदय से पूर्व एवं सूर्यास्त के पश्चात मै गाय का दूध निकाला करता था। इसी प्रकार पर्याप्त समय आमोद-प्रमोद मे व्यतीत हो गया। एक दिन की घटना है कि कपिला कुएँ का पानी न पीकर एक जोहड़ (गंदे पानी का तालाब) की और पानी पीने चली गई और उसके भीतर पानी मे घुस गई। जोहड़ के पानी मे जोंकों थी। एक जोंक उसके स्तनों से चिपट गई। उस दिन सांयकाल को दूध दोहने से पूर्व जब मैने बछड़े को छोड़ा बड़े लाड़-प्यार से अपनी माता के थनों को चूँघने लगा ही था कि थनों के पास कोई जीव देखकर ठिठक गया। बछड़े ने पुनः दूसरी और होकर गाय माता का दूध पिना शुरू किया। जब मैने बछड़े को अलग करके गाय के थनों को हाथ लगाया तो मुझे थनों के पास एक नितान्त काला व लम्बा सा कोई जीव चिपटा हुआ दृष्टिगत हुआ। जब मै ध्यान से देखने लगा तो मेरे मुँह से अनायास निकल गया ‘जोंक! जोक!!’
      अब मेरे मन मे विचार आया – अच्छा! यह जोंक भी कपिला माता के दूध रूपी पीयूष (अमृत) से आज तृप्त होने के लिए आई है, तो लो; आज इसे भी दूध पी लेने दो। सम्भव है, आज के दूध मे इसका हिस्सा भी सम्मिलित होना होगा। पर यह क्या ? मेरी प्रिय कपिला रह-रहकर दुलत्ती क्यो मार रही है ? पहले तो बछड़े के दूध पिते समय व मेरे दूध दोहने के समय यह शान्त चित्त हो खड़ी रहती थी, न मालूम आज यह इस प्रकार बेचैन क्यो है ?
      अब मैने जो जोंक को हाथ लगाया और देखा कि यह दूध नही अपितु रक्त पान कर रही है। मैने बलपूर्वक उसे खींच कर थनों से अलग किया तो उस समय दूध की अपेक्षा रक्त की धारा बह निकली। गो माता का खून प्रवाहित होता देख मुझे अत्यधिक दुःख हुआ। उफ! यह तो खून पी रही थी। इसलिए तो इसका मुँह भी लाल हो रहा है। मैने जोंक को मारे क्रोध के अपने पाँव से कुचल डाला। अब उसे मरा देख मैने दिल मे कहा कि यही परिणाम तुम्हारा होना चाहिए था। जिस प्रकार की तुमने मेरी परम प्रिय कपिला को अकारण कष्ट पहुँचाया है। 

      अब मै दूध दोह रहा था परन्तु रह-रहकर जोंक के दुर्व्यवहार की और मेरा ध्यान आकृष्ट हो जाता कि वह थनों के साथ चिपट कर भी अर्थात् दुग्ध-कोष तक पहुँच कर भी दुग्ध पान क्यो नही करती ? उस भाग्यहीन को दुग्ध क्यो नही अच्छा लगता ? वह रक्तपान क्यो करती है ? वह अमृत के स्रोत से अमृत ग्रहण न कर अपवित्र वस्तु की और प्रवृत्त होती है ? ऐसे ही विचार बार-बार मेरे दिल मे उठने लगे तथा गाय माता की अवस्था पर मुझे करूणा हो आई कि जोंक ने कपिला का खून पीकर उसे दुःखी किया। जोंक के थनों से अलग हो जाने पर अब कपिला चैन से खड़ी थी और मै दूध दोहने मे तत्पर था।
      इस दृष्टान्त को पढ़कर अब सोचना इस बात को है कि हमारा स्वभाव तथा हमारी भावना किस प्रकार की है। यह मनुष्य जिसे कि ईश्वर ने दो टाँगे, दो हाथ, दो कान और दो आँखो आदि के अतिरिक्त सोचने व समझने के लिए दिल और दिमाग दिया है। सो इस बात पर विचार करना है कि कहीं हम जोंक की न्यायी दूसरो की बुराई रूपी रक्त तो नही ग्रहण कर रहे। जिसप्रकार जोंक दूध मिलते हुए भी अपनी प्रकृति अनुसार खून ग्रहण करती रही। इसी प्रकार संसार मे भी गुण व अवगुण दोंनों ही पाए जाते है। जिस प्रकार तुलसीकृत रामायण मे भी लिखा है –
।। दोहा ।
जड़ चेतन गुण दोषमय, विश्व कीन्ह करतार ।
सन्त हंस गुण गहहिं पय, परिहरि वारि विकार ।।
      अर्थात् गुण और दोष सहित यह संसार विधाता ने रचा है। इसमे से सन्त रूपी हंस गुण रूपी दूध को ग्रहण कर अवगुण रूपी पानी का त्याग कर देते है तथा दुष्ट जन जोंक सदृश अवगुण रूपी खून को ग्रहण करते है। फिर दोष दृष्टि रखने वाले मनुष्य एवं जोंक मे क्या अन्तर रहा ? नही, ऐसा कदापि नही होना चाहिए अपितु हम सबको गुण-ग्राहक बनना चाहिये तथा मालिक के गुणानुवाद गाकर एवं सुनकर भक्ति रूपी दूध को ग्रहण करना चाहिए। जिससे हमारा जीवन संसार मे लोकप्रिय बन सके और मरणोंपरान्त भी हमारा यशोगान होता रहे।                        

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