मनुष्य की 100 वर्ष की आयु का चित्र

प्राचीन काल मे ऋषि-मुनियो ने मनुष्य की आयु को चार भागों मे विभक्त किया था –

    jindgi ki hakikat

  1. ब्रह्मचर्याश्रम – इसमे बाल्यावस्था से युवावस्था अर्थात् 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य पूर्वक गुरू चरणों मे रहकर विद्याध्ययन करना होता था।  
  2. गृहस्थाश्रम – इस काल मे गृहस्थ मे प्रवेश किया जाता था। विवाह होना, सन्तान का पालन-पोषण करना ये मनुष्य का कर्त्तव्य माना जाता था। इसके अतिरिक्त माता-पिता की सेवा करना तथा अपने धन को दान-पुण्य व धर्म के कार्यो मे लगाना। ऐसे कर्म करने वाले को ‘आदर्श गृहस्थी’ कहा जाता था। 
  3. वानप्रस्थाश्रम – इस अवस्था मे घर छोड़कर तपोवन मे रहते हुए मोह-ममता को दिल से निकालना होता था। अपने शरीर व विचारधारा को मालिक के भजन-स्मरण व ध्यान मे लगाने को वानप्रस्थाश्रम कहा जाता था।
  4. संन्यासाश्रम – चौथी अवस्था संन्यास की मानी .गई है। आयु के चौथे भाग मे स्त्री, पुत्र, घर, धन-दौलत, रिशते-नातो आदि का दिल से त्याग करके किसी एकान्त अथवा साधु-महात्माओ के आश्रम तथा गुरूकुल, जंगल या पहाड़ो की कन्दराओ (गुफाओ) मे जाकर आयु के शेष समय को वहाँ व्यतीत किया जाता था। भजनाभ्यास और साधना से आत्मा का साक्षात्कार करना ही मनुष्य का अन्तिम देह है।
  इन चारो अवस्थाओ के नियम पर चलने वाले मनुष्य का जीवन सफल समझा जाता है। परन्तु आज के युग मे इन नियमो पर चलना सबने नितान्त विस्मृत कर दिया है। अपितु ऐसा कहा जाये कि वर्तमान काल मे प्राचीन मर्यादा अधिकांशतः लुप्त हो चुकी है तो ऐसा कहना अनुचित न होगा। इसलिए वर्तमान समय मे जनसाधारण की दीन अवस्था देखकर किसी एक महात्मा जी ने मनुष्य की 100 वर्ष की आयु को 10 भागों मे विभक्त करके पंजाबी कविता के रूप मे चित्रित किया है। 
जिसका वर्णन इस प्रकार है –
1. ‘इक डहाके डा खेडन दा वडा चा ।’
      जन्म से लेकर दस वर्ष की आयु तक मनुष्य के मन मे खेलने-कूदने का शौक रहता है। इन दिनो मे खाने-पीने की कोई चिन्ता नही होती। यह निश्चिन्तता की अवस्था होती है। 
2. ‘दो डहाके वी, ज्यूं बेले बोकन सी ।’

      दस वर्ष की अवस्था से ऊपर उठने पर बीस वर्ष की अवस्था तक यौवन का ऐसा प्रबल नशा रहता है जैसे कि सिंह (शेर) जंगल मे गजरता और दहाड़ता है। इसी तरह यह मानव भी यौवन के मद मे अपने तुल्य किसी को कुछ न समझ धरती से ऊँचा-ऊँचा चलता है।
3. ‘त्रै डहाके त्री, मँगे पुत्तर ते नाले धी ।’

      तीस वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते मनुष्य परिणय सूत्र मे बँध जाने पर सन्तान प्राप्ति का इच्छुक रहता है। यहीं से ही मोह ममता के बन्धन की नींव पड़ जाती है। 
4. ‘चार डहाके चाली, गल विच पई पंजाली ।’

      चालीस वर्ष की आयु मे स्त्री, पुत्र, परिवार आदि खाने तथा पढ़ाई इत्यादि के लिए खर्च मांगते है। उनकी इच्छापूर्ति के लिए मनुष्य को अधिक से अधिक परिश्रम करना पड़ता है। जैसे बैल के गले मे जुआ (पंजाली) पड़ा होता है। किसान डंडे मारकर उसे गाड़ी व हल मे जोतते है। इसी तरह चालीस वर्ष की आयु मे परिवार पालने हेतु धनोपार्जन करने की मनुष्य के गले मे पंजाली पड़ जाती है। अर्थात् वह धन प्राप्ति के लिए कार्यो मे जुटा रहता है।
5. ‘पंज डहाके पँजाह, गल विच पया फाह ।’

      पचास वर्ष की आयु मे पहुँचने पर घर के बहुत से काम-धन्धे व झमेले बढ़ जाते है। जिसमे कि वह मकड़ी की भाँति जाल मे फँसा रहता है उसने किसी भी प्रकार से छूट नही पाता। पुत्र-पुत्रियो के विवाह की चिन्ता, साथ ही घर के खर्च की चिन्ताओ मे डुबा रहता है। यद्यापि इन झंझटो से मुक्त होना चाहता है। लेकिन सांसारिक कार्य-व्यवहार मे ऐसा धँसा होता है कि उनमे से निकल नही सकता। 
6. ‘छः डहाके सठ, हथ विच फड़ लई लठ ।’

      साठ वर्ष की उमर तक जब पहुँचता है तो घर मे बहुँए आ जाती है। वे कहती है कि पिता जी! आपके हर समय घर मे रहने से हमे मुँह ढाप के रहना पड़ता है। हम स्वतन्त्रता पूर्वक घर मे चल नही सकती, न ही किसी से बातचीत कर सकती है। इसलिए आप डयोढ़ी मे चारपाई डालकर वही बैठा किजिये। रोटी-पानी हम वही पर आपको पहुँचा देगे। अतएव आप बार-बार अन्दर आने का कष्ट मत करना। शरीर के समस्त संग शिथिल पड़ जाने के कारण लाठी का आश्रय लेना पड़ता है। हाथ मे लाठी को देख घरवाले यह भी कहते है कि ‘कुत्ते आकर हमे तंग करते है जरा इनका भी ख्याल रखा करे।’ अब लाठी से उन कुत्तो को हाँकने का काम भी करना पड़ता है। इस प्रकार साठ वर्ष की आयु मे घर से बाहर डेरा लगाना पड़ता है।
7. ‘सत्त डहाके सत्तर, घर वाले कहन बहत्तरा ।’

      सत्तर वर्ष की आयु मे पहुँचने पर मनुष्य घरवालों की दृष्टि मे ‘बहत्तरा’ अर्थात् बुद्धिहिन समझा जाता है। पुत्र-पोते उससे किसी काम की सलाह नही लेते। वे लोग बूढ़े को स्वयं से अधिक समझदार समझ कर असकी बातो पर ध्यान नही देते। यदि बूढा कभी अपनी और से उनकी भलाई के लिए कुछ कह भी देता तो तब वे कहते है कि बाबा! तुम व्यर्थ मे हमारी किसी भी बात मे टाँग मत अडाया करो। इस प्रकार उनके दारूण वचन सुनकर बेचारा बूढ़ा दिल मे मसोस कर रह जाता है। 
8. ‘अठ डहाके अस्सी, मंगे दूघ ते मिले लस्सी ।’

      अस्सी वर्ष की आयु पहुँचते-पहुँचते शरीर और भी निर्बल हो गया। घर वालो के रूखी-सूखी रोटी देने पर बूढ़े ने कहा कि – और तो मै तुमसे कुछ नही मांगता क्योकि घर के मालिक तो अब तुम ही बन गए हो। मै दिन-प्रतिदिन निर्बल हुआ जा रहा हुँ। इसलिए केवल एक पाव भर दूध का ही सवाल है। यह सुनकर बहुएँ उत्तर देती है – बाल! बच्चो का घर है। आजकल महँगाई में दूध मिलता ही कहां है। इसलिए चाय का एक कप पीकर ही निर्वाह कर लिया करो। प्रत्यक्ष तो ये बात हुई। अन्दर जाकर बहुँए फुसफुसाने लगी कि खाते-खाते तो बूढ़े के दांत घिस गये परन्तु जिवहा का रस अभी तक नही गया। इधर बूढ़ा भी मन मे कुढ़ने लगा की सारी आयु इनके लिए परिश्रम करता रहा लेकिन अब मेरा अधिकार पाव भर दूध का भी नही रहा।
9. ‘नौ डहाके नव्वे, उठे ते ढहे पवे ।’


      नब्बे वर्ष की आयु मे शरीर की समस्त नस-नाडियाँ ढीली पड़ गई। जिससे शारीरिक क्रिया करनी भी दुष्कर हो गई। यहां से उठता है तो वहाँ गिर पड़ता है और अपने जीवन को कोसता रहता है। परन्तु इतना होने पर भी सम्बन्धियो की ममता मे आसक्त होने के कारण प्रभु-भजन की और ध्यान नही देता।

10. ‘दा डहाके सौ, हुण ते भागे-भरया मगरों लौ ।’


      सौ वर्ष की आयु मे मित्र-सम्बन्धी तो कूच कर जाते है। सान्त्वना देने वाला कोई नही होता, बहुँए व पोते कहते है कि इस बूढ़े ने तो जीवन पट्टी लिखवाई है। कोई कहता है कि इससे तो मौत भी भय खाती है तथा कोई कहता है कि यह मौत से लड़कर आया है। भाव यह है कि सब यही चाहते है कि कब यह बूढ़ा मरे और सर से बला टले। इस प्रकार उसकी मौत के लिए सभी याचना करते है। परन्तु मोह माया की पट्टी फिर भी इस जीव की आँखो पर इतनी सुदृढ़ता से बँधी होती है कि जिससे यह भक्ति की और प्रवृत्त न हो, जीवन के अन्तिम क्षणो मे भी मायावी कीच मे धँसने का प्रत्यन करता है।

jindgi ki hakikat

      यह है मनुष्य की 100 साल की आयु का चित्र। जो प्रारम्भ के 25 वर्ष के पश्चात मानव की तृष्णा बढ़ जाने के कारण जीवन दुःख व कष्टो से परिपूर्ण हो जाता है। जो मनुष्य इस प्रकार संसार मे अज्ञान पूर्वक समय व्यतीत करेगा मरणोपरान्त उसकी आत्मा को चौरासी लाख योनियो के कष्ट भोगने पड़ते है।
      वे जीव कितने भाग्यशाली है जो अपने संचित सस्कारों अथवा दैवयोग से सत्पुरूषो की संगति प्राप्त कर मोह-ममता के झमेलो से बचने का प्रयत्न करते है तथा संसार मे कमल की भाँति न्यारे रहते है और मानव जन्म के लक्ष्य को एवं संसार की नश्ववरता को समझते हुए भजन-अभ्यास व सत्संग के शाश्वत सुख व सांसारिक सुखो का बलिदान कर देते है। ऐसे गुरूमुखो का जीवन संसार मे धन्य समझा जाता है। मरने के बाद उसकी रूह को चौरासी लाख योनियो के कष्ट नही भोगने पड़ते और वे मरणाेपरान्त मालिक के चरणो मे ही लीन हो जाते है।

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