मनुष्य का आत्मिक दर्पण

      मनुष्य इस संसार मे रहते हुए साधारण तौर पर इस बात से अजान रहता है कि वह क्या है? और वह इस संसार मे किस कारण से आया है तथा यह अनमोल शरीर उसे क्यो मिला है? अथवा वह जिस कारण से संसार मे आया है वह कार्य इस जीवन में हो भी रहा है या नहीं?  

      यह मानुष शरीर अति उत्तम है यह एक ऐसी अनमोल वस्तु है जिसका मूल्य लगाना भी कठिन है परन्तु मनुष्य इस शरीर का और अपने समय का मूल्य स्वय नही जनता है

      माया और शरीर के चक्कर मे पड़ कर तथा स्वार्थपरता मे लग कर यह मनुष्य अपने वास्तविक रूप को बिल्कुल भूल चुका है इसका सब समय शरीरऔर इन्द्रियो मे व्यतीत हो रहा है और यह इस शरीर सम्बन्धी व्यवहार मे इस कदर अपने आप को विलीन कर चुका है कि इससे और भी अधिक कुछ भी उसके ध्यान मे नही आता

      मनुष्य जीवन के समस्त पुरूषार्थ और दौड़-धूप पर एक दृष्टि डाली जाए तो जो कुछ उसका दिन-रात का कार्यक्रम है वह क्या है? शरीर के सुख शरीर के आराम और शरीर के सेवन मे रात-दिन लगा हुआ है यदि कुटुम्ब-परिवार का मोह है तो वह भी शरीर का ही नाता होने से है धन- प्राप्ति की इच्छा है तो वह भी शरीर के लिए और इसके अतिरिक्त जो भी उद्यम और पुरूषार्थ इस मनुष्य के द्वारा होता या हो रहा है वह सब शरीर के ही निमित्त है  

      तो क्या मनुष्य संसार मे यही कुछ करने के लिए आया था? क्या जीवन का लक्ष्य और ध्येय केवल शरीर ही का सेवन मात्र है? इस पर विचार करने की आवश्यकता है   

      मान लो कि इच्छानुसार शरीर के भोग भी मिल जावे और धन-दौलत भी मिल जावे और परिवार का सुख भी मिल जावे और शरीर की मान बड़ाई और प्रतिष्ठा भी प्राप्त हो जाये, परन्तु अंत मे इन सब का परिणाम क्या होगा? 

      यही कि शरीर मिट्टी मे मिल जायेगा और जीवन की समस्त कार्यवाही भी मिट्टी मे मिल जायेगी

      तो फिर मनुष्य की विशेषता क्या हुई? शरीर के भोग तथा शारीरिक जरूरते तो अन्य योनिया भी पूरा कर रही है, यह कौन सी बड़ी बात हुई? अर्थात्‌ अन्य योनियो को भी जब भूख प्यास सताती है तो वे भी दौड़-धूप करके किसी न किसी प्रकार अपनी भूख प्यास की तृप्ति का साधन प्राप्त कर ही लेते है यदि मनुष्य भी इसी प्रकार शरीर और इन्द्रियो के सेवनार्थ ही दौड़-धूप करता रहा तब तो इस का जीवन भी अन्य योनियों के समान ही हुआ

      यदि कोई लाखो की जायदात भी बना लेवे और अनेको सम्बधी भी मिल जाये, तब भी क्या हुआ? इससे पहले भी तो अनेको जन्मो मे यह जीव इस प्रकार के अनेको सगे सम्बन्धियो को छोड़ कर आया है ऐसे पदार्थ और ऐसे सम्बन्ध तो अनेको बार मिल मिल कर बिछुड़ गये, इस जन्म मे भी उन की प्राप्ति कर के मनुष्य ने कौन सा बड़ा काम कर लिया? सहजोबाई जी का वचन है –

।। दोहा।।

बार बार नाते मिलै, लख चौरासी माही।

सहजो सतगुरू ना मिलै, पकड़ निकासै बाहिं।।

      सोचना चाहिए की मनुष्य वास्तव मे क्या है और क्या वन बैठा है? इस की तो उसे खबर तक नही यह तो वास्तव मे कुल मालिक का अंश है और इसी मानुष शरीर के द्वारा उसी मालिक से मिल कर मालिक का स्वरूप बन सकता है परन्तु यह स्वयं को शरीर मानता है शरीर तो मिट्टी का पुतला है यदि मनुष्य अपने को शरीर समझता और मानता है, तब तो मिट्टी की ही परख और समझ रखता है 

      सन्त सतगुरु इस भुले हुए जीव को चिताते और जगाते है वे बतलाते है कि तू तो स्वयं सब प्रकार की शक्तियो और सब प्रकार के सुखों का भण्डार है खेद है कि सब प्रकार के सुखो का भण्डार होकर भी तू क्यो दिन-रात दुःख और कल्पना मे व्यतीत कर रहा है?

      तू क्यो नही अपने वास्तविक स्वरूप की परख करता और अपने को पहचानता? तू जो कि पाक साफ रूह है, अपने आप को देख और समझ!   

      परन्तु यह मनुष्य शरीर के झंझट मे इस कदर उलझ चुका है कि इसे रूह का ध्यान तक नही आता, जो कि इसका वास्तविक स्वरूप है  

      जिस प्रकार अपने ही नेत्रो से अपना ही मुख किसी को दिखाई नही दे सकता और यदि अपना मुख देखना हो तो दर्पण या दर्शनी की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार अपनी आत्मा का निज स्वरूप देखने के लिए भी आत्मिक दर्पण की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार अपनी आत्मा का निज स्वरूप देखने के लिए आत्मिक दर्पण की आवश्यकता होती है

      अब यदि तुमसे कोई कहे कि तुम्हारे मुख पर दाग और धब्बे है तुम स्वयं तो अपने मुख के दाग धब्बे नही देख सकते तब तुम तत्काल दर्पण की खोज करोगे, यह निश्चय करने के लिए कि क्या वास्तव मे मेरे मुख पर दाग और धब्बे है या नही यदि है तो जब तक तुम उन्हे दूर न कर लोगे, तुम चैन आराम नही मिलेगा क्योंकि तुम्हे सदैव यह ध्यान बना रहेगा कि यदि मेरे चेहरे से दाग और धब्बे दूर नही हुए तो मै प्रतिष्ठित पुरूषो की सभा मे बैठने योग्य नही रहूंगा तब तुम कितनी चिन्ता मे  पड़ जाते हो और । कितना शीघ्र उसे दूर करने के उपाय मे लग जाते हो परन्तु कब, जबकि पहले तुम्हे दर्पण मे अपना मुख देख लेने से दाग और धब्बे होने का निश्चय हो जाता था 

      इसी प्रकार ही तुम जोकि वास्तव में आत्मा या रूह हो और तुम्हारी रूह पर माया कि मलिनता के अनेको दाग और धब्बे पड़ चुके है जो कि तुम्हे स्वयं दिखाई नही दे सकते इसके लिए आत्मिक दर्पण मे ही अपने स्वरूप को देखो

     आत्मिक दर्पण क्या है? सन्त सतगुरू का सत्संग, उनका वचन और ध्यान उनके सत्सग और ध्यान में ही तुमको रूह की मलिनता का ज्ञान होगा और यही से ही उसके दूर करने का उपाय भी हाथ आयेगा 

।। दोहा।।

साध संग मे चाँदना, सकल, अंधेरा और।

सहजो दुर्भल पाइये, सत्सगत मै ठौर।।

      सन्त सतगुरू के सत्संग मे आकर तुम प्रकाश मे आ जाते हो, तुम्हे अपनी आत्मा का निज स्वरूप स्पष्ट देखने को मिलता है और तभी तुम अपने आप को जान सकते हो  

      अब जो इस आत्मा पर मलिनता के दाग धब्बे पड़ गये है सो इनके दूर करने का उपाय भी सोचना चाहिए 

      यदि इन दाग धब्बे को साफ करने का उपाय है, तो यह केवल एक ही है कि सन्त सतगुरु के वचन और ध्यान मे अपना स्वरूप देखो। सन्त सतगुरु तुम्हरे लिए आत्मिक दर्पण के सदृश है उनके स्वरूप को पहचानो कि वह तुम्हारी आत्मा के निज-स्वरूप है  

।। दोहा।।

अलख पुरूष की आरसी, सन्तन ही की देह।

लखा जो चाहे अलख को, इन्ही मे लखि लेह ।।

     और यदि आत्मनुभव और आत्म कल्याण की इच्छा है तो सन्त सतगुरू के स्वरूप प्रीति और  प्रतीति करो, यही एकमात्र साधन है।

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