भेड़ाचाल

      भेड़चाल (भेड़ाचाल) किसे कहते है ? 

 जब कोई व्यक्ति बिना सोचे समझे तथा बिना कारण जाने किसी की नकल कर उसका अनुसरण करता है। उसे ‘भेड़चाल’ अथवा भेड़ाचाल कहा जाता है। 

      भेड़े ऐसा क्यो करती है ?

     भेड़ (Sheep) एक बहुत ही सीधा, सुस्त और डरपोक प्राणी है। जिसे हरदम खतरा महसूस होता रहता है। इसलिए भेड़े झुण्ड बनाकर रहा करती है। जिससे भेड़ो को सुरक्षा का अहसास होता है। तथा वह सबसे आगे वाली भेड़ का बिना सोचे समझे उसका अनुसरण करती है।
      जिस प्रकार की एक भेड़ के पीछे सारी भेड़े चला करती है तथा वह यह नही देखती कि पहले वाली भेड़ कहा जा रही है। तथा एक भेड़ कुँए मे जा गिरी तो सारी भेड़ भी कुँए मे गिर कर प्राण त्याग देती है। आज वर्तमान काल मे यही हालत मानव की होती जा रही है। वह भेड़ाचाल की भाँति ही चल रहा है।
      आज सभी कुछ त्यौहार, व्रत आदि रीति-रिवाज आदि सभी मात्र भेड़ाचाल ही रह गये है। प्राचीन काल मे एकादशी व्रत आदि को अत्यन्त उपयोगी माना जाता था तथा इससे शारीरिक एवं मानसिक शक्तियो के विकास मे अच्छी सहायता मिलती थी तथा पूरे दिन भगवान के चरणों मे ध्यान लगाते थे।
      लोकिन विपरित इसके आज के युग मे व्रत-उपवास वाले दिन सैकड़ो तरह के चटपटे पदार्थ आदि खाकर उदर पूर्ति किया करते है। परिणाम क्या होता ? तन व धन दोनों का अपव्यय होता है। ये प्रथाएं तो थी किन्ही उददेश्य के लिए परन्तु वर्तमान मे ये मात्र रीति-रिवाज ही रह गये है।
      इसी को समझाने के लिए यहाँ एक रोचक दृष्टान्त दिया जा रहा है।
      किसी के घर मे शादी हो रही थी। उनकी एक छोटी सी बच्ची जो अभी साल-छः महीने की थी रोने लगी। रो-रोकर उसने सारा घर ही सर पर उठा रखा था। उसका रोना-चिल्लाना इतना था कि परिवार वाले कुछ काम न कर पा रहे थे। जब पण्डित जी आये और विवाह के कार्य का समय हुआ तो वह नन्ही बच्ची और भी ऊँची आवाज मे रोने लगी। उसकी माँ ने उसे चुप कराने का भरसक प्रत्यन किया कि किसी तरीके से बच्ची चुप हो जाये परन्तु सब व्यर्थ। ज्यों-ज्यों माँ दुलार कर उसे चुप कराती तो वह उतना ही अधिक चीख-चीख कर रोने लगती। तब लड़की के पिता ने कहा कि ‘भाग्यवति! बच्ची को थोड़ी सी अफीम की घुट्टी दे दो। जिससे वह सो जायेगी। तब कहीं हम कोई कार्य कर सकेगे।’
      स्त्री ने ऐसा ही किया। अफीम देने पर वह अबोध बालिका सो गई। तदुपरान्त विवाह की रस्में व अन्य रिति-रिवाज उन्होने पूर्ण किये। उनका वह पुत्र जिसका विवाह हो रहा था वह वहाँ विवाह मण्डप पर बैठा हुआ था। और तो उसे कुछ ज्ञात न हुआ परन्तु अपने पिता के मुख से बच्ची को अफीम खिलाने की बात सुन ली।
      जब वही लड़का समय आने पर परिवार वाला बना और अपने बड़े पुत्र का विवाह करने लगा उस समय वह अपनी स्त्री से कहने लगा कि – देखो, छोटी बच्ची को अफीम खिलाकर वेदी के पीछे सुला दो। स्त्री ने पूछा – किसलिए ? तब उसने उत्तर दिया – यह हमारे कुल की परम्परा है। जब मेरी शादी हुई थी तब मेरी छोटी बहन को भी अफीम खिलाकर मण्डप के समीप सुला दिया था। तदुपरान्त विवाह के कार्य शुरू हुए थे। स्त्री ने पति का कहना मान हंसती-खेलती बच्ची को अफीम खिलाकर विवाह मण्डप के पीछे सुला दिया। उसके सो जाने के पश्चात ही विवाह के कार्य किए गये। इस प्रकार इस परिवार मे तो यह परम्परा ही चल पड़ी कि विवाह के समय बालिका को अफीम खिला कर सुलाने के बाद ही विवाह-विधि सम्पूर्ण की जाती, उससे पूर्व नही।
      तीन-चार पीढ़ियाँ बीत जाने पर एक बार उनके घर लड़के का विवाह था। दैवयोग से उनके यहाँ छोटी बच्ची न थी। पुरूष ने स्त्री से कहा – भाग्यवति! पहले छोटी बच्ची को अफीम खिलाने की रीति पूर्ण करो तब कही शादी के अन्य कार्य सम्पन्न हो सकेगे। उनके घर जो उस समय रिश्तेदार-सम्बन्धी थे उन स्त्रियो के पास लड़के ही लड़के थे। किसी की गोद मे लड़की न थी। उधर पंड़ित जी जल्दी-जल्दी मचा रहे थे तब वह स्त्री भागी-भागी गई ओर अपनी पड़ोसन से उसकी छोटी लड़की माँग लाई। उसे अफीम खिलाकर वेदी के पीछे सुलाया गया। उसके पश्चात विवाह के सब कार्य किये गये।
      अब सोचना यह है कि बात क्या थी और नासमझी के कारण बात क्या से क्या बन गई। प्रायः लोग देखा देखी एक-दूसरे के अनुसार कार्य करने लगते है तथा अपनी बुद्धि द्वारा उसका परिणाम नही सोचते। यह बात प्रसिद्ध भी है कि दुनिया की चाल भेड़चाल सी है। जैसे एक भेड़ जिस और चलती है तो सभी भेड़े उसे देख उसी की और कदम बढ़ाने लगती है। चाहे पहली भेड़ कुएँ मे क्यो न गिर रही हो। जैसे कहा भी है –

      अर्थात् जीव भक्ति-पथ की और अग्रसर न होकर मायासक्त लोगों की धारणाओ (विचारों) को अपनाते है। परिणामतः अन्त मे कई प्रकार की उन्हें नरक-यातनाएँ सहन करनी पड़ती है। इसकी अपेक्षा जो भक्तिवान् सज्जन होते है वे अपने उददेश्य को दृष्टि मे रख महापुरूषो की शरण मे जाकर उनसे परमार्थ के गूढ़ रहस्य को समझ कर अपनी मंजिल की और कदम बढ़ाते है। वे जगत् की भेड़चाल को नही पकड़ते अपितु वास्तविक ज्ञान् की प्राप्ति कर एवं मनुष्योचित कर्म करके भक्ति रूपी संजीवनी वटी का पान करते हुए अपना जीवन आनन्दमय बना लेते है।             
      

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