भूल का परिणाम

       भूल तो लगभग हर मनुष्य से होती है। क्योकि शायद इस सृष्टि ऐसा कोई मनुष्य हो जिसने कभी कोई गलती न करी हो, लोकिन आज हम गलती की नही बल्कि भूल की बात करेगे क्योकि गलती तो बहुत बड़ी होती है, लेकिन भूल मात्र छोटी सी होती है। मात्र एक छोटी सी भूल का कितना भयानक परिणाम होता है। हम आपको एक कहानी के माध्यम से बताते है तो आइये जानिये –
      प्राचीन समय की बात है कि एक देहाती गँवार को पेट दर्द की शिकायत हुई। उस गाँव मे कोई हकीम या वैद्य न था। वहाँ से कुछ कोस पर एक शहर था। वह देहाती वहाँ के वैद्य के पास गया। वैद्य ने रोग देख कर दवा दे दी और साथ ही कहा की ‘घर जाकर भोजन न करना’ उसने पूछा – तब क्या खाँऊ ?
      वैद्य ने बतलाया की खिचड़ी बना कर खा लेना। देहाती बेचारा सीधा सादा था। उसने कभी खिचड़ी का नाम तक न सुना था। वैद्य ने पूछा कि ‘महाराज! खिचड़ी क्या चीज होती है ?’ वैद्य ने उत्तर दिया – तुम केवल खिचड़ी का नाम याद रखना। गाँव मे जाकर किसी से पूछ लेना कि खिचड़ी क्या चीज होती है। वह तुम्हे बता देगें।
      सीधे-सादे देहाती न ऐसा ही किया। शहर से निकलते ही वह लगा ‘खिचड़ी-खिचड़ी’ रटने लगा। पहले तो वह मन ही मन रटता रहा फिर लगा जोर-जोर से पुकारने लगा। उसने सोचा इस प्रकार ‘खिचड़ी’ शब्द याद रहेगा। चलते-चलते वह एक नदी के किनारे पहुँचा तो वह हाथ-मुँह धोकर पानी पीने लगा। पानी पीते समय खिचड़ी की रट बन्द हो गई। पानी पीकर उठा तो वह शब्द भूल चुका था। अब लगा दिमाग दौड़ाने कि वैद्य ने खाने को क्या बताया था। कई बार दिमाग लड़ाने पर अन्त मे उसके मस्तिष्क मे यह विचार आया कि ‘खा चिड़ी, खा चिड़ी।’
      मार्ग में एक खेत पड़ता था। उसमे बाजरे की फसल तैयार खड़ी थी। किसान खेत मे से चिड़िया उड़ा रहा था। उधर से गुजरता हुआ यह देहाती अपनी ही धुन में ‘खा चिड़ी-खा चिड़ी’ जोर-जोर से पुकारता चला जा रहा था। किसान ने जब यह आवाज सुनी तो सिर से पाँव तक गुस्से से भर उठा और कहने लगा – अरे मूर्ख! यहाँ तो हम चिडियो को उड़ाते-उड़ाते पसीना-पसीना हो रहे है और तू कहता है खा चिड़ी-खा चिड़ी! किसान ने दौड़ कर उसकी गर्दन पकड़ी और दो-चार तड़ातड़ तमाचे जड़ दिये, और बोला – क्यो बे! तेरे बाप का खेत है ? जो तू कहता है ‘खा चिड़ी’ मेरा तो इन चिड़ियो को उड़ा-उड़ा कर नाक मे दम हुआ जा रहा है। तू कहता है ‘खा ले-खा ले।’
      वह हाथ जोड़ कर काँपता हुआ बोला – भले आदमी! मै तो निर्दोष हूँ। मै तो वैद्य का बताया पाठ घोट रहा हूँ। अब जो तुम बताओगे वही मै कहूँगा। किसान कड़क कर अब आया सीधी राह पर! खबरदार! कभी ऐसी बात मुँह से न निकालना। तुम कहो कि ‘उड़ चिड़ी-उड़ चिड़ी।’ देहाती बोला अच्छा यही कहूँगा और ‘उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी’ कहता हुआ अपने गाँव की और बढ़ चला।

      अभी थोड़ी दूर ही पहुँचा था कि आगे एक बहेलिया जंगल मे जाल बिछाये बैठा था। इधर उधर फुदकती हुई चिड़िया दाने के लोभ में जाल के नजदीक हो ही रही थी और सम्भव था कि वे जाल मे फँस जाती और इतने मे ही वह उधर से निकला। इसकी ‘उड़-चिड़ी उड़-चिड़ि’ की ऊँची आवाज से जाल के निकट आती हुई सब चिड़िया उड़ गई। यह देख व्याध ने आव न देखा ताव, बेचारे देहाती को जा पकड़ा और लगा उछल उछलकर मारने – अबे कम्बख्त! मै चिड़ियो को जाल मे फँसा रहा हूँ, मै क्या तेरे बाप का नुकसान करता हूँ जो तू कहता है ‘उड़ चिड़ी-उड़ चिड़ी’ बोल! मैने तेरा क्या बिगाड़ा है ? देहाती बेचारा मार खा कर भोचक्का तो हो ही रहा था पर फिर भी हाथ जोड़ कर कहने लगा – जैसे उस खेत वाले ने कहा था वैसे ही तो कर रहा हूँ। अब तू ही बता, क्या कहूँ ? व्याध बोला – अब यो कह कि आते जाओ- फँसते जाओ।

      बहुत खूब! ऐसा ही कहूँगा कहकर वह चलता बना और कहता जाता कि ‘आते जाओ-फँसते जाओ।’ दूसरी और से चोरो का दल चला आ रहा था। वे किसी धनाढ़य घराने मे चोरी करने जा रहे थे। यह ऊँची आवाज मे आते जाओ-फँसते जाओ’ कहता हुआ चला आ रहा था। चोरो ने जब यह सुना तो उसे पकड़कर धर पीटा, बोले – अरे नालायक! तेरे बाप का घर तो नही लूटा हमने जो हमे कह रहा है ‘आते जाओ फँसते जाओ।’ वह बेचारा फिर हाथ बाँधकर भय से कांपता हुआ – अच्छा जो आप बोलोगे – मै वही कहूँगा। चोर उसे बेतहासा पीट-पीट कर बोले – देख! ऐसा न कह, तुम कहो की ये रख आओ और ले जाओ, भोले देहाती ने कहा – अच्छा! अब यो ही कहूँगा।   
      यहाँ से मार खाकर बेचारा यही रटते हुए चलने लगा ‘ये रख आओ, और ले जाओ।’ मार्ग मे एक गांव के मुखिया की मृत्यु हो गई थी। ग्रामवासी मृतक को उठा उसी रास्ते से जा रहे थे। इधर से उसकी आवाज को उन्होंने सुना की ‘ये रख आओ, और ले जाओ।’ वे सब दुःखी तो पहले से ही थे। इसके शब्दो ने उनके कटे पर नमक छिड़का। ऐसे शोक के समय भी इस अनाड़ी को हँसी करने की सूझ रही है। उनमे से कुछ एक ने उसे जा पकड़ा और मार-मार का अधमरा कर डाला। उन्होने कहा – अरे अक्ल के धनी! क्या बकता है ? ऐसे समय मे तो यों कहना चाहिए कि ऐसा दिन भगवान किसी को ना दिखाये। देहाती गिड़गिड़ाया – बोला मुझे मत मारो मै निर्दोष हूँ, जैसा तुम कहते हो मै वैसा ही कहूँगा। 
      तत्पश्चात ऊँची आवाज मे ‘ऐसा दिन भगवान किसी को न दिखाए’ कहता जा रहा था। कुछ आगे चला तो मार्ग मे किसी के घर विवाह हो रहा था। खूब धूम-धाम मची हुई थी। उधर से इसका गुजरना हुआ। यह तो बोलता ही जा रहा था। बारातियो ने जब शब्द सुने तो वह आग बबूला हो उठे। अब फिर पूर्ववत् बेचारे की पिटाई हुई। कुछ व्यक्ति गरज कर बोले -खबरदार! ऐसा कभी न कहना। तो फिर क्या कहूँ ? देहाती थिरकती हुई आवाज मे बोला। वे बोले – यो कहना ऐसा दिन सबको नसीब हो। उसने मान लिया और वही दोहराने लगा।
      इस वाक्य को ‘ऐसा दिन सबको नसीब हो’ रटता हुआ बढ़ता जा रहा था। जहाँ से वह निकला वहाँ एक बच्चे को फोड़ा निकला हुआ था और वह उसकी पीड़ा से कराह रहा था। बच्चे के सम्बन्धियो ने जब उसे यह कहते सुना तो उनका पारा चढ़ गया। उन्होने बेचारे को बुरी तरह से पीटा। देहाती भर्रायी हुई आवाज मे पूछने लगा – तो फिर क्या कहूँ ? अरे मूर्खराज! ऐसा मत कह, तू यो कह कि यह सूख जाये, यह सड़ जाये। उन्होने समझाया।
      उसके बाद वह यही कहते हुए चला जा रहा था। कुछ आगे पहुँचा ही था कि एक माली पौध लगा रहा था तो वह क्या सुनता है कि ‘यह सूख जाए – यह सड़ जाए।’ माली को अत्यन्त दुःख हुआ कि यह कौन है जो मेरी मेहनत पर पानी फेरने की कोशिश कर रहा है। सिर उठाकर देखा तो एक देहाती कहता जा रहा था ‘यह सूख जाये – यह सड़ जाये।’ वह गुस्से मे लाल पीला होकर उसकी मरम्मत करने लगा। यह रो रोकर कहने लगा – मत मार भय्या! जो तू कहेगा – वही मै कहूँगा। इस पर माली ने कहा – अब यो कहना इधर भी लग जाये, उधर भी लग जाये। उसका मतलब था कि मेरी पौध सब तरफ लग जाये। देहाती अब यही वाक्य दोहराता हुआ चलने लगा।
      वह अब अपने गाँव के निकट आ पहुँचा था। गाँव के बाहर कुछ झोपड़ो मे आग लगी हुई थी। आग की लपटें उठ उठ कर आकाश से बाते कर रही थी। सभी लोग कमर बाँधकर आग बुझाने मे व्यस्त थे। कोलाहल सा मचा हुआ था। इधर यह देहाती ‘इधर भी लग जाये, उधर भी लग जाये’ कहता हुआ निकला। लोगो ने सुना तो आवेश मे भर गए कि हम बड़ी मुश्किल मे है, आग पर नियन्त्रण नही किया जा रहा है और यह कहता है कि ‘इधर भी लग जाये, उधर भी लग जाये।’ सब ने मिलकर उसे पीटना शुरू कर दिया। उनमे से एक वृद्ध गुस्से से उबलता हुआ बोला – ‘मारो! इस अक्ल के धनी को। यहाँ तो हम आग से अधजले हो रहे है और यह और भी अधिक आग लगाना चाहता है। मारो इसे! इतना मारो की मार-मार के इसकी खिचड़ी बना दो। 


      ‘खिचड़ी’ शब्द का उसके कान मे पड़ना ही था कि उसकी जान मे जान आई। वह चौंका और हाथ बाँध कर बोला – बस बस! और ज्यादा न मारो!! अब मै कुछ न बोलूँगा। जिसके लिए मै इतनी देर से मार खा खाकर अधमरा सा हुआ चला आ रहा हूँ वह ‘खिचड़ी’ शब्द मुझे मिल गया है। अब मुझ निरपराध को छोड़ो। इस पर लोगों ने उसे छोड़ दिया और उसने भी ‘खिचड़ी-खिचड़ी’ की रट लगाते हुए घर की राह ली।

       इस कथा कितनी रोचक और शिक्षाप्रद है। जिस प्रकार की देहाती वैद्य द्वारा बताये हुए नाम को भूल कर अपार दुःखो का शिकार बना। इसी प्रकार आम मनुष्य भी मालिक के द्वारा दिए गये नाम को भूल चुके है। वह माया व सासांरिक पदार्थों में ही उलझे हुए है। तथा वह कितने कष्ट व दुःख झेलेगे तथा चौरासी लाख योनियो का शिकार बनेगे। इसलिए इससे बचने के लिए हमे महापुरूषो द्वारा बताये गये नाम का स्मरण करना चाहिए।जो की हम भूले हुए है उसे याद करे तथा अपना जीवन सफल बनाये।

Leave a Reply

Your email address will not be published.