भारतीय इतिहासकार स्वामी विवेकानन्द के कुछ गज्ब तथ्य

स्वामी विकेकानन्द का एक सत्य तथ्य

स्वामी विवेकानन्द
      रामकृष्ण परमहंस के मिलने से पूर्व विवेकानन्द महर्षि देवेन्द्रनाथ से मिलने गये। देवेन्द्रनाथ बड़े ज्ञानी, मर्मज्ञ पड़ित थे। आधीरात गंगा मे बजरे में ध्यान-मग्न महर्षि का दरवाजा खोला ओर विकेकानन्द ने पूछा- मै आपसे पूछने आया हुँ- क्या ईश्वर है? मुझे स्वयं के अनुभव इस सम्बन्ध मे बताये। मै हाँ या ना से उत्तर चाहता हुँ। महर्षि बोले-बैठो। मै तुम्हे शास्त्रो के अनुसार समझाता हुँ। विवेकानन्द बोले, शास्त्र तो मैं भी पढ लूँगा। मै तो आपकी स्वयं की अनुभूति, स्वयं की शोध, स्वयं का निष्कर्ष सुनने आया हुँ। यदि स्वय का कोई अनुभव आपके पास नही है तो मै जाता हुँ ओर देवेन्द्र जो इतने वर्षों से साधना करते आ रहे थे हाँ न कर सके ओर विकेकानन्द को लोटने से रोक न सके। किन्तु विवेकानन्द जब रामकृष्ण के पास गये ओर यही प्रश्न उनसे किया। उन्होने आँखे खोली तो विवेकानन्द जी की कँपकँपी बँध गई। रामकृष्ण बोले ‘ईश्वर है या नही, यह छोड़ो तुम्हे जानना है तो बोलो ओर अभी जानना है तो हाँ करो या ना करो। है या नही ये सवाल बेकार है।

      विवेकानन्द जी लिखते है कि उनकी हिम्मत ही न पड़ी कि फिर उलट कर उनसे पूछा जाये क्योकि वे वेद, उपनिषद, शास्त्र, बुद्ध, कृष्ण किसी की भी गवाही बीच मे लाये ही नहीं। वे तो इस बात पर तुल गये कि जैसा मैने अनुभव किया है वैसा तू भी कर, अभी कर, इसी क्षण कर। कहा जाता है कि काली का साक्षात्कर स्वामी विवेकानन्द को रामकृष्ण परमहंस ने कराया था।


अमेरिका के राजनेता ने अपने बचपन का एक संस्मरण लिखा।

      “मै लुहार की दुकान के सामने से गुजर रहा था। मेरा दूसरा साथी कही चला गया था। अकेला ही धौकनी धौकता ओर लोहा पीटता। मुझे अजीब लगा सो दुकान के सामने ठिठक गया।
      लुहार ने अपनी कारिस्तानी दिखाई उसने छूटते ही किसी बड़े खानदान से सम्बन्धित ओर अपनी कक्षा का मेधावी छात्र बताया, साथ ही भविष्य मे कोई बड़ा आदमी बनने की संभावना भी व्यक्त की। उसके इस कथन से मेरे मन में उसके प्रति सदभावना जगी। उसने कहा यदि ओर भी कुछ सुनना ओर देखना चाहो तो मेरे पास बैठो। मै दुकान पर बैठा। उसने धौंकनी थमा दी ओर कहा देखो इसका चलाना कितना मजेदार काम है। मै उसकी बातो मे आ गया ओर देर तक उसी मे जुटा रहा। जब भी उठने का मन करता तभी अपनी चिकनी चुपड़ी बातो मे फँसा लेता। हाथ भी दुखने लगे। निदान में उठकर चल ही पड़ा।
      स्कूल पहुँचा तो परीक्षा मे गैरहाजरी लग गई थी। शिक्षक ने बहुत पीटा ओर परीक्षा मे फेल कर दिया। धौंकनी धौंकने से उत्पन्न बाँहों का दर्द ओर भी बढ गया। बुखार आया ओर चारपाई पर पड़ा पछताता रहा। इसके बाद जीवन भर याद रखा की चापलूसी मे फँसना कितनी बड़ी मूर्खता है। अब किसी चापलूस को पास नहीं फटकने देता ओर झूठी प्रशंसा करने वालो से सदा दूर ही रहता हुँ। तभी वर्तमान पद तक पहुँचने में सफल हो सका हुँ।”

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