भले काम को कल पर मत छोड़ो

      मानव जीवन की स्वर्णिम घडियाँ कितनी मूल्यवान है इससे तो सभी परिचित ही है। माया मे आसक्त होकर ये जीव अपने वास्तविक कर्त्तव्य से विमुख हो जाते है और उत्तम शरीर से लाभ न उठा कर कर्त्तव्य कर्मो को भविष्य मे करने की आशाओ पर ही छोड़ देते है परन्तु कर नही पाते। फलतः अन्त समय मे वे हाथ मल-मल कर पछताते है।

      इसी विषय पर यह दृष्टान्त प्रसिद्ध है –

      रणभूमि मे जब रावण मृत्यु शय्या पर पड़ा था, तब श्री रामचन्द्र जी ने उस नीति-निपुण पुरूष से कोई उपयोगी ज्ञान प्राप्त करने के लिए लक्ष्मण जी ने कहा – हे तात ! इस समय धरा-धाम से चारो वेदो के ज्ञाता एवं युद्ध विद्या के प्रकण्ड पण्डित और ब्राह्मण-कुलोत्पन्न रावण जा रहे है। इसलिए तुम उनके पास जाकर कुछ राजनैतिक शिक्षा प्राप्त कर आओ।
      श्री रामचन्द्र जी की आज्ञा पाकर सुमित्रानन्दन जी लंकाधीश जी के निकट गए और प्रणाम कर उनके सिर की तरफ खडे हो गए। कुछ देर प्रतीक्षा की किन्तु जब लंकेश ने उन्हें कुछ ज्ञान प्रदान न किया तब लक्ष्मण जी निराश होकर श्री रामचन्द्र जी के पास आकर कहने लगे – ‘महाराज ! वे तो कुछ बता नही रहे, बस ‘हाय राम! हाय राम!’ किये जा रहे है।
      तब रामचन्द्र जी ने पूछा – शिक्षा ग्रहण करने के समय तुम किस दिशा मे खडे थे ?
      लक्ष्मण जी ने उत्तर दिया कि ‘मै उनके सीस की तरफ जा कर खड़ा हुआ था।’ इस पर श्री रामचन्द्र जी ने कहा – भ्राता ! यह सिद्धान्त है कि जब भी किसी के पास शिक्षा ग्रहण करने के लिए कोई जिज्ञासु जाता है तो उसे विनम्रता के साथ चरणों की ओर ठहरना चाहिये। इसलिए अब तुम उनके पैरो की तरफ खडे होकर उनसे विनम्र प्रार्थना करना।
      उनकी आज्ञा पाकर लक्ष्मण जी लंकेश के पैरो की तरफ जा खडे हुए और विनम्रता से कहा – ऐ पूज्य ब्राह्मण! आप अन्तिम समय हमे कुछ नीति- ज्ञान बता जाओ।
      यह सुनकर रावण ने नेत्र खोले और कहने लगे कि ‘ऐ लक्ष्मण! अब तो मेरे प्राण निकलने वाले है। मुझमे इतनी सामर्थ्य ही नही कि आपको कुछ ज्ञानोपदेश कर सकूँ, फिर भी एक रहस्य भरा सिद्धान्त बताता हूँ’ इसको सदैव स्मरण रखना, इससे आपको बहुत लाभ प्राप्त होगा – वह यह कि ‘भले काम को कल पर कभी न छोड़ना।’ यद्यपि मैने समस्त दैविक शक्तियो को अपने वश मे किया हुआ था, मेरे इतने उच्चतम विचार थे कि समस्त प्राणियो के लिए सब कुछ सुलभ हो जाए, मै चाहता था कि समुन्द्र के खारे जल को मोठा बना दूँ तथा मर्त्यलोक के निवासी स्वर्ग तक बिना किसी कठिनाई के आ जा सके। यह सब कठिन कार्य मै सुगमता से कर सकता था क्योकि मुझे हर प्रकार की शक्ति प्राप्त थी परन्तु प्रत्येक श्रेष्ठ कार्य को कल पर छोड़ता रहा और विषयोन्मुख हो दुष्कर्म तत्क्षण कर लेता था किसका परिणाम आज मेरी आँखो के समक्ष है कि मै इतनी अतुल सम्पत्ति रखते हुए भी परलोक के लिए प्रभु भक्ति का कुछ धन एकत्र न कर निर्धन बन कर इस संसार से खाली हाथ विदा हो रहा हूँ। अतः तुम मेरे पश्चाताप पूर्ण जीवन से यह शिक्षा ग्रहण करो ओर अपने इस जीवन को आदर्शमय बनाओ कि जितने भी श्रेष्ठ कर्म करने योग्य हो मानव जीवन मे उन्हे तत्क्षण कर लेना तथा बुरे कर्मो को भविष्य के लिए छोड़ देना इससे मनुष्य जीवन की स्वर्णिम घडियो का समुचित मूल्यांकन हो जायेगा।’ यह कहकर रावण ने नेत्र मूंद लिये और सदैव के लिए मृत्यु की गोद मे सो गया।
       तात्पर्य यह है की मुनष्य इस संसार मे केवल प्रभु बन्दगी की खातिर ही जन्म लेकर आया था परन्तु मायावी झिलमिलाहट को देख इसी मे आसक्त हो चौरासी लाख योनियां खरीद लेता है तथा शुभ कर्म न करके अन्त मे पछताता है। इसकी दयनीय दशा को देख सत्पुरूषो को दया आती है और समय बीतने से पहले वे सदुपदेश द्वारा चिताते है। जैसे कि
।। दोहा ।।
      ऐ जीव ! जिस जन्म को प्राप्त करने के लिए तू चौरासी लाख योनियो मे भटकता रहा, अब जब कि सौभाग्य से तुझे यह अवसर प्राप्त हो गया है तो उसे पाकर अब सावधान क्यो नही होता ? क्यो नही मनुष्योचित कर्म करके जिस लक्ष्य सिद्धि के लिए तुझे यह जन्म मिला है उसे प्राप्त करता ? इसलिए हर एक मानव को चाहिये कि जीवन मे श्रेष्ठ कर्मो को महत्तव देकर उन्हे तत्क्षण कर ले तथा बुरे कर्मो को कल पर छोड़ दे। श्रेष्ठ कर्म यह है कि सन्त सत्पुरूषो की संगति ग्रहण कर भजन-अभ्यास तथा उनकी पावन सेवा करके अपने जीवन को भक्तिमय बना कर मालिक की प्राप्ति करे जिससे यह लोक भी सुखी और परलोक भी सुखप्रद बन सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published.