भक्त पुरन्दर दास पर ईश्वर की लीला

      भगवान् की माया बड़ी विचित्र है। जीवो के अपने-अपने पूर्व जन्मों के शुभ संस्कार स्वयमेव उदित हो जाते है। किस जीव के संस्कार और कर्म किस प्रकार के है इसे तो केवल अन्तर्यामी भगवान ही जान सकते है। जीव की क्या सामर्थ्य जो इन गूढ़ रहस्य को जान सके। वर्तमान व्यवहार को देख कर सब कोई यह अनुमान लगाते है की अमुक व्यक्ति पापात्मा है या पुण्यात्मा। जो शुभ संस्कार वाले जीव होते है उन्हें माया की दलदल मे फँसा देख भगवान को करूणा हो आती है। उन्हें इस कीच से निकालने के लिए वे किसी न किसी रूप मे प्रकट हो अनेको कष्ट सहनकर उन्हे सत्पथ पर ले आते है। जैसा कि इस दृष्टान्त से स्पष्ट होता है –


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       दक्षिण भारत के किसी नगर मे एक धनाढ्य ब्रह्मण रहता था। अपार सम्पदा होने के कारण इनका व्यापार दूर-दूर के देशो मे भी चलता था। चारों तरफ इनका प्रभुत्व छाया हुआ था। इनका एक इकलौता लड़का था जिसका लालन-पालन बड़े प्यार से हुआ एवं उसका नाम ‘श्री निवास नायक’ रखा गया। पिता की मृत्यु के पश्चात समस्त धन-सम्पत्ति का उत्तराधिकारी उनका पुत्र ही बना। उसने हीरे-जवाहारातो का व्यापार करना आरम्भ कर दिया। व्यापार मे निपुण होने के कारण इसने आशातीत लाभ प्राप्त किया। ‘गोलकुण्डा’ की प्रसिद्ध कानों में से हीरे-मोतियो को खुदवा कर व्यापार आगे बढ़ाया। विख्यात जौहरी होने के कारण दक्षिण भारत की रियासतों के राजा लोग भी इनका सम्मान करते थे। इस प्रकार उनका घर धन-धान्य से भर गया।
      धन के साथ दो चीजों का चोली-दामन का सा सम्बन्ध है – एक लोभ दूसरा मद। धन का लोभी एक एक पाई पर अपनी जान वार देता है। इसी प्रकार श्री निवास नायक भी धन के मद और लोभ मे बुरी तरह जा फँसा। धर्म व शुभ कर्मादि का नाम सुन कर वह कानों में अंगुलियां दबा लेता और चाहता की भूलकर भी मुझे यह शब्द कोई न सुनाये। फिर भला वह उपकार के काम मे एक पाई भी कैसे लगाता। कोई गरीब अथवा साधु उससे कुछ देने को कहता तो वह उसे ऐसे आड़े हाथों लेता मानो वह उसके प्राणों का ग्राहक हो। एक कोड़ी भी कभी भगवान के नाम पर न लगाने की तो उसने शपथ ले रखी थी।
      ऐसे अभिमानी, क्रोधी, लोभी, कृपण और धन के पतंगे श्री निवास के भी पूर्व संचित शुभ संस्कार कभी उदित होगे ? यह कौन जान सकता है ? प्रभु की लीला प्रभु ही जाने कि वे कब किस को किस उपाय से अपने चरणों की और आकर्षित कर लेते है। यह जीव क्या जान सकता है। इस माया के मद से छुड़ाने एवं नरकों की ज्वाला से बचाने के लिए अर्थात् श्री निवास नायक के जीवन-सुधार हेतु श्री भगवान् ने एक अद्भुत कौतुक रचा। प्रभु ने स्वयं एक दरिद्र ब्राह्मण का वेष बनाया और वे चल पड़े उसे सन्मार्ग सुझाने।
      श्री निवास ने जब एक फटे हाल बूढ़े भिखारी को अपनी और आते देखा तो पहले से ही यह समझ कर कि यह कुछ माँग न ले, इधर-उधर सरकने लगा। परन्तु यह कोई साधारण भिक्षुक तो था नही अपितु वह तो स्वयं भगवान ही भिखारी का रूप धारण करके आये थे, उन्होने तत्काल ही उसके हदय के विचारों को पढ़ लिया। समीप आकर कहने लगे – आप बड़े धनी-मानी पुरुष है, अपार सम्पत्ति के मालिक है। आपकी प्रतिष्ठा को सुनकर मै आया हूँ, मेरी लड़की का विवाह होने वाला है। मै कंगाल ब्राह्मण हूँ। इसलिए आप मेरी कुछ सहायता किजिये।
      श्री निवास नायक ने पीछा छुड़ाने के लिए कह दिया – बाबा! आज मुझे इस समय अवकाश नही कि तुम्हारी बात ध्यान से सुन सकूँ। इसलिए तुम कल आना। बूढ़ा याचक सुन कर और ‘बहुत अच्छा’ कह कर चल दिया। श्री निवास ने यह समझा कि चलो इस प्रकार सरलता से पिए। श्री निवास ने यह समझा कि चलो इस प्रकार सरलता से पिण्ड छूट जायेगा। परन्तु विप्र भिक्षुक तो पुनः दूसरे दिन मे आ पहुँचा और अपना प्रश्न उसे सुना दिया। श्री निवास ने उसे फिर कल आने को कह दिया। तीसरे दिन ब्राह्मण के आने पर फिर उसे चौथे दिन आने का आदेश दिया। इस प्रकार भिखारी नित्यप्रति भिक्षार्थ आता और वह उसे ‘कल आना’ की बात कहकर टाल देता। इस प्रकार करते-करते छः महीने बीत गये। किसी प्रकार भी पीछा छूटते न देखकर श्री निवास ने इस मुसीबत से सदा के लिए छुटकारा पाने के लिए एक उपाय सोचा – खोटे पैसों से भरी हुई दो थैलियाँ जो कि उसके पास चिरकाल से बेकार पड़ी थी। ब्राह्मण के आने पर उसने वहीं उठा कर उसकें आगे फैंक दी और बोला – ‘इन मे से जो भी एक पैसा अच्छा लगे ले जा सकते हो परन्तु याद रखना – एक पैसें से अधिक मत उठाना।’
      ब्राह्मण देवता ने आँख उठाकर उन पैसों को देखा तत्पश्चात वे बिना कुछ कहे मुसकराते हुए वहां से चल दिये।
      श्री निवास ने शुक्र मनाया कि किसी प्रकार मुसीबत से छूटकारा तो मिला परन्तु वह ब्राह्मण देवता कहां टलने वाले थे। वे सीधे वहाँ से चलकर उसके घर जा पहुँचे और श्री निवास की स्त्री को सब समाचार कह सुनाया तथा अपनी पुत्री के विवाह के लिए उससे सहायता देने को कहा।
      प्रभु की लीला; श्री निवास नायक जितना अभिमानी, लोभी और कृपण था उसकी स्त्री पति की तुलना मे उतनी ही सरल हदय, विनम्रता की साक्षात् प्रतिमा व उदार चित्त वाली थी। उसने द्विज रूप धारी भगवान् के मुख से अपने पति की कठोरता का जब यह समाचार सुना तो वह अत्यन्त दुःखी हुई। वह पति के स्वभाव से पूर्व ही परिचित थी, दूसरा यह भी जानती थी कि यदि पति को बिना बताये अपनी तरफ से इस भिखारी को कुछ दे देगी तो पतिदेव मेरे साथ दुर्व्यवहार करने मे कदापि पीछे न हटेगें। इधर साधु-सन्त को द्वार से खाली लौटाने के लिए भी उसकी आत्मा तैयार न थी। अन्त मे उसने अपने मुल्यवान् आभूषणो मे से जोकि उसने मायके से प्राप्त किए थे एक हीरोजड़ित नाक-फूल उस विप्र को दे दिया। ब्राह्मण नाक-फूल पाकर आशीर्वाद देता हुआ विदा हो गया।
      नाक-फूल श्री निवास की पत्नी से लेकर वह पुनः उसकी दुकान पर गया तथा आभूषण दिखा कर कहा – इसकी कीमत मुझे दिजिये। नाक-फूल हाथ मे लेकर जब श्री निवास ने देखा तो आश्चर्यचकित हो उसे एकटक देखता ही रह गया क्योकि वह नाक-फूल तो उसकी पत्नी का ही आभूषण था। सोचने लगा – यह आभूषण जो कि इतना मूल्यवान् है इसे यह भिखारी मेरी पत्नी से किस प्रकार प्राप्त कर लाया है ? भीतर ही भीतर वह अपनी स्त्री पर क्रोधित होने लगा। उसने नाक-फूल को तिजोरी मे अच्छी तरह बंद करके याचक से कहा कि ‘इस समय मेरे पास इतनी मोहरे नही है और न ही मुनीम जी के पास। अतः तुम कल आना। अच्छा – और सुनों! इस आभूषण के बदले एक सौ मोहरे ही मिल सकेगी – अधिक नही।’ यह सुन ब्राह्मण देवता चले गये और श्री निवास नायक भी दुकान बंद कर तत्काल ही घर जा पहुँचा।                   
      छः महीने से चली आ रही जिस विपदा से श्री निवास ने बड़ी कठिनता से पीछा छुड़ाया था वही बला उस के घर पर आ टूटी। यह सोच कर श्री निवास क्रोध से भरा हुआ आया और आते ही उसने अपनी स्त्री से यह प्रश्न किया कि तुम्हारा वह नाक-फूल कहाँ है जिसे तुम सुबह पहने हुई थी ?
      श्री निवास का यह प्रश्न सुनते ही स्त्री चौंकी। उस बेचारी न तो दयार्द्र होकर ब्राह्मण को वह आभूषण दे दिया था परन्तु उसे क्या ज्ञात था कि इतने शीघ्र ही उसके पति को यह समाचार मिल जायेगा। पति के कठोर स्वभाव से परिचित होने के कारण वह हक्की-बक्की होकर भयभीत सी भूमि को ताकने लगी तथा कोई उत्तर न दे सकी।
      श्री निवास दो-चार मिनट तक मौन रहा परन्तु फिर कड़क कर बोला – अपना नाक-फूल अभी इसी क्षण मुझे लाकर दिखला कहाँ है वह ? अभी अभी ला दे – नही तो याद रख! जीवित ही तू मेरे हाथो से भूमि मे गाड़ दी जायेगी।
      पति की कड़कती आवाज और भयानक धमकी  सुन कर बेचारी लक्ष्मीबाई के मुँह से घबराहट मे निकल गया कि नाक-फूल आभूषणो के डिब्बे मे रखा है अभी लाय देती हूँ। यह कहकर वह अपने कमरे के भीतर भाग गई। कहने को तो वह कह आई कि नाक-फूल लाती हूँ पर लाए कहां से उसे तो वह विप्र को दान मे दे चुकी थी ? अब वह क्या करे और क्या न करे इसी चिन्ताग्नि मे सुलगती जा रही थी। उधर श्री निवास क्रोध से लाल-पीला हुआ गरज रहा था। अन्त मे बचने का कोई चारा न देख सरल-हदय, प्रेम की सजीव मूर्ति लक्ष्मीबाई ने आत्महत्या करने की मन मे ठानी। उसने एक कटोरी मे विष घोला तथा उसे हाथ मे लेकर मन ही मन श्री भगवान के चरणों मे प्रार्थना कि – हे प्रभु! अन्तर्यामी!! मैने आपके निमित्त वह नाक-फूल ब्राह्मण को दिया था। अब वैसा का वैसा नाक-फूल कहां से लाकर दूँ ? करूणामय भगवान! मेरे पति की मलिन बुद्धि नष्ट करके उसे सदबुद्धि प्रदान करे। जिससे वह तुम्हारी पवित्र भक्ति की और प्रवृत्त हो जाए तथा उसका यह मिथ्याभिमान, लोभ और क्रूरवृत्ति नष्ट हो। बस प्रभु! मै और कुछ नही चाहती आपके श्री चरणों मे मेरी तो केवल यही प्रार्थना है और मै यह विष की कटोरी पीकर आपके चरणों मे पहुँच रही हूँ। मुझ पर कृपा करो।
      यह प्रार्थना करके उसने कटोरी मुँह की और बढ़ाई ही थी कि ऊपर से कोई चीज खट् से कटोरी मे आन पड़ी। आश्चर्यचकित हो उसने देखा तो वही नाक-फूल था। जो प्रातः ही उसने श्री भगवान के नाम पर भेटं किया था। उस कमरे मे जो कि चारों और से बन्द था। जिसमे पक्षी तक भी पंख नही फड़फड़ा सकता था यह कैसे और कहाँ से आ गिरा ? प्रभु की विचित्र लीला का चमत्कार देख उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। मन ही मन उसने प्रभु को धन्यवाद दिया। विष की कटोरी वही पर ही गिरा दी और नाक-फूल लाकर बाहर खड़े हुए आग-बबूला हो रहे पति के हाथो मे रख दिया।
      उधर श्री निवास नायक तो अपने मन मे यही समझे हुए था कि वह नाक-फूल तो उसकी तिजोरी मे बन्द पड़ा है क्योकि उसने स्वयं अपने हाथो उसके बीच मे रख कर ताला लगा कुँजी अपनी जेब मे सँभाल ली थी। अब, जब उसकी पत्नी ने वही का वही नाक-फूल उसके हाथो मे धर दिया तो मारे आश्चर्य के उस की आँखे फटी की फटी रह गई। वह सोचने लगा कि यह यहाँ पर कैसे आ गया ? जब कि उसे स्वयं मैने ही तिजोरी मे रखा था। बहुत दिमाग लड़ाने पर भी वह किसी निष्कर्ष पर नही पहुँच सका तो नाक-फूल ले सीधा दुकान पर चला आया। जाकर देखा कि तिजोरी तो बन्द पड़ी है। जेब से चाबी निकाल कर तिजौरी खोली तो वहाँ नाक-फूल विद्यमान नही था। अब तो उसका माथा ठनका कि यह क्या जादू का चमत्कार है ? घर आकर पत्नी से पूछा – ‘सच-सच बता! यह क्या मामला है ?’
      लक्ष्मीबाई ने सारा वृत्तान्त अपने पति को कह सुनाया, बोली – पतिदेव! यह श्री प्रभु की विचित्र लीला का चमत्कार है जिससे आज मेरे प्राण बच गए। आप अब भी अपनी क्रूरता, क्रपणता को छोड़कर प्रभु के शरणागत हो जावें इसी में ही आपकी भलाई निहित है।
      श्री निवास नायक को अब बोध हुआ। श्री भगवान की कृपा से अब उसकी आँखो से अविद्या और अज्ञान के आवरण हट चुके थे। वह अपने दुष्कर्मो पर अति पश्चाताप करने लगा और बोला – मैने धन के मद मे आकर भगवान को एक गरीब भिखारी समझ उन को बार-बार आने पर दुत्कारा परन्तु धन्य है प्रभु! आपकी उपकारक वृत्ति की मेरे बार-बार क्रूरता का व्यवहार करने पर भी आप मेरे कल्याणार्थ सब कुछ सहते गए तथा अब मेरी स्त्री के प्राण बचा कर तो आपने मुझे बिना मूल्य ही खरीद लिया है। अब तो यह समस्त धन-सम्पत्ति आपकी ही है और आज से मै आपका तुच्छ सेवक हूँ।
      तत्पश्चात श्री निवास नायक ने अपनी समस्त धन-सम्पत्ति परमार्थ मे लगा दी और स्वयं उसी दिन से पत्नी सहित फकीरी वेष धारण कर लिया। अपने और पत्नी के तन को ढांपने के लिए केवल धारण किये हुए वस्त्र के सिवाय कुछ पास न रखा। अब तो वह एक अलमस्त साधु बन गया था।

      यहाँ से चलकर श्री निवास को अब सच्चे रूहानी गुरू को प्राप्त करने की चिन्ता होने लगी क्योकि बिना पूर्ण सदगुरू धारण किये भक्ति और परमार्थ का लाभ प्राप्त नही हो सकता। बहुत समय तक पति-पत्नी सदगुरू की खोज मे इधर-उधर भटकते रहे। अन्त मे ‘विजयनगर’ पहुँचे। विजयनगर का राजा तो पहले ही श्री निवास नायक को अच्छी तरह पहचानता था क्योकि हीरे, जवाहरातों के व्यापार मे वह कई बार उनके दरबार मे जा चुका था। अब राजा ने जब श्री निवास को इस अवस्था मे देखा तो बहुत ही विस्मित हुआ। इतने बड़े धनपति को आज फकीरी की दशा मे देख और उनके त्याग को सोच राजा के मन मे उनके प्रति हार्दिक श्रद्धा उत्पन्न हो आई। राजा के रूहानी गुरू ‘श्री व्यासराय’ जी थे। राजा श्री निवास व उसकी पत्नी को भी उनके चरणों मे ले गये। वे सच्चे मन से शरणागत हुए और अपने गुरू के आश्रम मे ही रहने लगे। गुरू जी ने श्री निवास का नाम बदल कर ‘पुरन्दर दास’ रख दिया।

      उसी दिन से पति और पत्नी तन-मन से गुरू चरणों की सेवा करते। गुरू चरणों में जीवन बिताते हुए उन्होने सच्ची भक्ति व शान्ति को प्राप्त किया। ये बड़े प्रसिद्ध महात्मा हो चुके है। इन्होने प्रेम-भक्ति की बहुत सी रस भरी वाणियां लिखी है जो दक्षिण मे प्रचलित है।
      जैसे कहा भी है –

      अर्थात् जैसे धतूरा खाने से व्यक्ति बावरा हो जाता है उसी प्रकार धन पाने से व्यक्ति का दिमाग अहंकार के वशीभूत होकर अपना अनर्थ कर बैठता है। अस्तु श्री निवास को भी लोभ ने पहले इतना लक्ष्मी का पुजारी व कृपण बना दिया कि वह धर्म के नाम पर भी नाक-भौ सिकोड़ने लगता था। दान करना तो एक किनारे रहा परन्तु उसके पूर्व शुभ संचित क्रम इतने प्रबल थे जिसके कारण स्वयं भगवान भिखारी ब्राह्मण का रूप धारण कर उसे बार-बार चिताने आये। उनके समझाने पर उसे दारूण अनुताप हुआ और माया को क्षणभंगुर समझ व उनके अभिमान को त्याग उसे परमार्थ के कार्यो मे लगाकर उसने अपने जीवन को सुखरूप बना लिया।
       “धन्य है उस करूणेश – दयानिधि प्रभु की लीला।”

        

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