भक्त चरित (श्री भानुदास)

      श्री भानुदास ऋग्वेदी ब्राह्मण थे। श्री विट्ठल की उपासना इनकी कुलपरम्परा से चली आ रही थी। फिर भी भगवद-भक्ति मे जुड़ने के लिए गुरू-कृपा और गुरू-दीक्षा का माध्यम ही प्रमुख अंग है। वह चाहे कुल के बड़े बुजुर्ग बताये या भगवान स्वयं प्रत्यक्ष होते हुए भी सत-मार्ग दरसाये। क्योकि पूर्व पुण्य एवं भक्ति के अनुसार भगवान अनन्य भक्तो को यदा-कदा दर्शन देकर कृतार्थ किया करते है। जैसे नामदेव जी के जीवन-चरित्र मे प्रत्यक्ष देखा गया है।
      कुल परम्परानुसार इनका उपनयन हुआ। यानि सांसारिक नियम पूरे हुए। दस वर्ष की अवस्था मे थे कि सूर्य-उपासक की संगति से इनके मन में सूर्यदेव के प्रत्यक्ष दर्शन की इच्छा जाग्रत हुई। एक प्राचीन जीर्ण मन्दिर के तहखाने में बैठकर इन्होंने सात दिन तक सूर्य नारायण की अखण्ड उपासना की। आठवें दिन भगवान सूर्य ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर इन्हें कृतार्थ किया। इसके बाद गायत्री-मन्त्र के तीन बार पुरश्चरण यानि विधि-विधानपूर्वक मन्त्र जाप किया। इनता करते हुए भी इनके मन मे एक अज्ञात अभिलाषा यही रहती कि विट्ठल भगवान भा साक्षात्कार हो गया।
      सन्तो की आज्ञा से इन्होंने गृहस्थ जीवन मे प्रवेश किया। सन्तान हुई। सत्य-धर्म की कमाई करने का आदेश मिला था। काम-धन्धा कुछ जानते नही थे। शारीरिक निर्वाह कैसे हो? भगवान विट्ठल ही सर्वस्थ थे, सुहद थे। उनकी पूजा मे लगे रहते। भगवान को सर्वस्थ बनाया तो वे भूखा क्यो रखेगे। किसी भक्त (सम्बन्धी) को प्रेरणा दी और उसने इनको कुछ रूपये देकर कपड़ा बेचना सिखा दिया।
      यह गाँव मे अपनी दुकान रखते और आठवें दिन घोडे पर कपड़ा लादकर आस-पास के गाँवो मे बेच आते। कभी झूठ न बोलते। ग्राहको से बहुत ज्यादा दाम न लेते। निर्वाहमात्र कमाई करते और घर-गृहस्थी चलाते। इनकी सच्चाई को देखकर चतुर व्यापारी यही कहते कि यह व्यापार मे कुछ कमा न सकेगे। एक बार व्यापार में अत्यधिक घाटा पड़ा गया; परन्तु इन्होंने अपनी सच्चाई न छोड़ी। सत्य-मार्ग अपनाने वालों को कितनी कठिनाइयाँ और बाधाये आये वे अपने व्रत (प्रतिज्ञा) पर दृढ रहते है।
      उनकी दृढ़ता ही प्रभु-हदय को द्रवित कर देती है। कभी-कभी तो भक्त भगवान को उलाहना भी दे देते है कि भगवन! यदि सत्य-धर्म पर चलनेवालो को कठिनाइयो, कष्टो मे डालकर परीक्षा लेते रहोगे, तो सर्वसाधारण का विश्वास आप पर से उठ जायेगा। इसालिए आप भी उनका मार्ग निष्कंटक कर दिया करे।
      भानुदास की सच्चाई को देखकर अन्ततः ऐसी साख जमी कि ग्राहक इन्ही की दुकान पर आने लगे। धन नदी की बाढ के समान इनके पास आने लगा। चार-पाँच वर्षों मे धनी बन गये। बहुत बड़े धनी बनने पर भी अहं इनमे लेशमात्र नही था। झूठ-कपट का आश्रय कभी नही लिया। इतने बडे व्यापारी होने पर भी भगवान को नही भूले। नित्यप्रति नियमानुसार भजन-सुमिरण करते और व्यवसाय भी करते।
      समय-समय पर कथा-कीर्तन करना, करवाना एवं सन्त-सेवा का लाभ उठाना इन्होंने कर्तव्य बना लिया। इसके साथ आषाढ़ी-कार्तिकी एकादशी पर पण्ढरपुर मे जाकर विट्ठल भगवान के दर्शन करने का व्रत ले लिया। चाहे उस समय उन्हें कोई कितना भी फुसलाये कि भक्त जी! सब कुछ छोड़कर निशि्चन्त चले जाते हो; व्यापार ठप हो जायेगा। उत्तर मिलता है; जिसने व्यापार बढ़ाया वही सम्भालेगे, मै उनका सेवक हुँ। उनके चरणो में जाकर विश्राम मिलता है। भक्तो एवं सर्वसाधारण के हदय मे उनके प्रति आदरभाव समा गया। वे जान गये कि यह एक महान भक्त है।
      इन दिनो महाबली महापराक्रमी कृष्णराय विजय नगर के राजा थे। इन्होंने साम्राज्य का विस्तार चारों ओर कर लिया। श्री विट्ठलनाथ जी की ख्याति को सुनकर यह एक बार पण्ढरपुर आये और लौटते हुए श्री विग्रह को अपनी राजधानी में ले गए।इनकी आँखो के सामने वह एक पत्थर की मूर्ति थी और राजा के सामने कोई अपनी नही चला सकता। श्री विट्ठल का मन्दिर बनने पर प्रेमी-भक्त उधर आयेगें और राजा की कीर्ति को फैलायेगे। राजा ने वह श्री मूर्ति राजधानी में एक मन्दिर मे स्थापित कर दी।
      भक्तजन इस मूर्ति में प्रत्यक्ष भगवान को मानते और कई दर्शन भी करते थे। भगवान भी अपनी लीला रचाकर समय-समय पर भक्तों की भक्ति की कीर्ति बढाते है और सत्य-संकल्प, दृढ आस्था, विश्वास का प्रमाण दिखाते है। आषाढ़ी एकादशी पर भक्तजन पण्ढरपुर मे आये ओर देखा कि भगवान विट्ठल की मूर्ति नही है। पता चला की विजयनगर के राजा ले गए है और वहाँ उन्हें स्थापित किया है। यह देख-सुनकर उनके मन व्याकुल हो गये।
      उन्होने यह संकल्प किया कि जब तक भगवान फिर यहाँ लौटकर नही आयेगे, तब तक हम लोग भजन करते हुए यही पडे रहेगे। उन भक्तो में श्री भानुदास भी थे। इन्होंने कहा कि मै विजयनगर से भगवान को अवश्य लेकर आकगाँ।
      यह कहकर भानुदास विजयनगर गये। मध्य रात्रि में मन्दिर के किवाड़ बंद थे। ताले लगे हुए थे। इन्होंने आँखे बन्द करके अपनी प्रतिज्ञा (विनय) एवं भक्तो का सकंल्प प्रभु तक पहुँचाया। मन्दिर मे प्रवेश स्थान पर गये ओर ताले खुलते गए। पहरेदार गहरी नींद मे सो गये। भानुदास मन्दिर मे भगवान के चरणो में खड़े थे।
      श्री चरणो मे नतमस्तक हो प्रेमश्रुओं से चरण पखारे। हाथ जोड़कर साथ चलने के लिए विनय की। भगवान ने अपने गले का नवरत्न हार भानुदास के गले मे डाल दिया। पुनः भगवान ने नई लीला रचा दी। कपाट तड़ाक से बन्द होने लगे। पहरेदार जाग गये और रतनजड़ित हार भानुदास के गले मे देख कर उसे रंगे हाथों पकड़ लिया।
      प्रातः सिपाही (पहरेदार) भानुदास को राजा के पास ले गये। राजा ने सूली पर चढाने की आज्ञा दे दी। लोगो मे हाहाकार मच गया। परन्तु भक्त जी निश्चित सिपाहियो के साथ सूली पर चढने के लिए चल दिये। उन्हें न राजा से क्षमा चाहनी थी, न ही लोगो से गवाही दिलवानी थी, न सच्चाई दरसानी थी। राजाज्ञा से सिपाही उन्हें सूली पर चढ़ाने के लिये ले गये।
      उस समय भानुदास ने भगवान विट्ठल को पुकारकर कहा – ‘चाहे आकाश टूट पड़े या ब्रह्मान्ड फट जाये या तीनो लोक दानवदल के ग्रास बन जाये, तो भी हे विट्ठल! मै तुम्हारी ही प्रतीक्षा करूंगा।’ इस प्रकार भक्त जी भगवान के ध्यान मे लीन हो गये।
      इतने मे जिस सूली पर वे चढाये जानेवाले थे, उसमे पत्ते निकल आये। देखते ही देखते फल-फूलो से लदा लहलहाता एक सुन्दर वृक्ष बन गया। सिपाही इस चमत्कार को देखते ही रह गये कि सूली कहाँ गयी? वृक्ष के आगे-पीछे चहुँ ओर देख लिया परन्तु सुन्दर वृक्ष के बिना कुछ न दिखाई दिया।
      राजा कृष्णराय को जब मालूम हुआ तो जान गये कि यह चोर नही, कोई महान पुरूष है। वे दौड़कर भानुदास के पास आये ओर चरणो मे गिरकर क्षमा माँगने लगे। चहुँ ओर भगवान के अदभुत कौतुक और भक्त की भक्ति की जय-जयकार होने  लगी।
      भक्त भानुदास जी ने कहा कि राजन! मै तो श्री विट्ठल भगवान को पण्ढरपुर ले जाने के लिए यहाँ आया था। राजा में रत्नजड़ित पालकी मे भगवान को विराजनमान कर रक्षा के लिये थोड़ी-सी सेना साथ देकर भानुदास के ठाट-बाट से विदा किया। कार्तिकी एकादशी से पहले भगवान के श्री विग्रह को लेकर भानुदास पण्ढरपुर लौट आये।
      भक्तो के दिल-कमल खिल गये। पण्ढरपुर जय-जयकारो के स्वर में गूँज उठा। चहुँओर प्रसन्नता छा गयी। देवताओं ने पुष्प वृष्टि की। शंख, मंजीरा, ढोलक के ताल पर नृत्य करते हुए भक्तो ने अपने विट्ठल भगवान का स्वागत किया।
      कार्तिकी एकादशी के दिन पंचामृत एवं मन्त्र-उच्चारण से पुनः अभिषेक किया गया। तब से इसी उपलक्ष से कार्तिकी एकादशी के दिन बड़ी धूमधाम से भगवान की सवारी निकलती है और उत्सव मनाया जाता है।
भक्त और भगवान की जय

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