भक्तिहीन मानव की दशा

।। दोहा ।।
तन पवित्र गुरू सेवा  से, धन  पवित्र  कर दान ।
मन पवित्र होय स्मरण मे, तीनों विधि कल्याण ।। 
      तन की पवित्रता का साधन सत्पुरूषो की वाणियो ने सतगुरू की सेवा बताया है। जो सतगुरू दरबार की श्रद्धापूर्वक सेवा करते है – उन भाग्यशाली जीवो के शरीर पावन है। जैसे गुरूवाणी मे भी कहा गया है कि ‘साचा नावण गुरू की सेवा’ सतगुरू की पवित्र सेवा ही सच्चा स्नान है। इससे मन की समस्त मलिनता दूर होती है। 
अपने द्वारा कमाये हुए धन को दान व उपकार के कार्यो में लगाना चाहिये, जिससे प्रमार्थ लाभ प्राप्त हो सके। 
मन के ऊपर जो मल-विक्षेप-आवरण के तीन पर्दे चढ़े हुए है, यह परमात्मा के भजन व स्मरण करने से ही दूर होगे तथा मन मे पवित्रता व निर्मलता आयेगी। अगर किसी ने अपनी आयु भर यह श्रेष्ठ कार्य न किये तो उस मृतक अपवित्र देह से जंगली जानवर तक भी घृणा करते है। इस प्रस्तुत दृष्टान्त मे इसी तथ्य का समर्थन किया गया है –   
      धन्नामाल नाम का कोई सेठ था, जो कि अपने व्यापारिक कार्य-व्यवहार मे बहुत प्रवीण था। चन्द्रमा उसका बली था। लक्ष्मी मानो उस पर न्यौछावर थी। दिन दुगनी और रात चौगुनी धन की आमदनी से उसने अपने घर में धन से खजाना भर लिया। इस प्रकार धन्ना सेठ अपने इस एश्वर्यमय जीवन से फूला न समाता है। चाँदी के रूपयों के अम्बार, सोने की ईटें, रत्न-मणियाँ और पन्नो के ढ़ेरो के ढ़ेर देखकर उसका वक्ष:स्थल मारे प्रसन्नता के पृथ्वी से गज़ों ऊपर उछलता था।
      इतना कुछ प्रचुर मात्रा मे होते हुए भी माया के पुजारी सेठ का स्वभाव इस प्रकार था कि अगर कोई उसके द्वार पर भिखारी भिक्षार्थ आ जाता तो उस समय मानो उसको साँप सूँघ जाता। आपे से बाहर होकर यह भिखारियो को धिक्कार देता – उन्हे जली-कटी बातें सुनाता, परन्तु पर भी वह सन्तुष्ट न हो पाता। अपने नौकरो से कहकर उन बेचारो को धक्के देकर निकलवा देता। यदि कभी कोई अनाथालय, गोशाला, मन्दिर, कुआँ आदि परोपकार के कार्यो के लिए दान माँगने आता तो उस समय सेठ जी की तो नानी ही मर जाती। झट से तुनक कर बोल उठते – अरे, मेरे पैसो के दुश्मनो! तुम्हे और कोई भी घर नही सूझता, जो सीधे इधर ही भागे चले आते हो। जाओ! जाओ!! अपना रास्ता नापो। बस, फिर क्या मजाल जो कही किसी के पल्ले एक फूटी भी पड़ जाये।
      विपरीत इसके सेठ के लड़के कुछ धार्मिक विचारों के थे। वे अपने पिता के इस दुर्व्यवहार को पंसद नही करते थे। वे चाहते थे कि पिता जी अपने धन व समय को पालोक सुधार की और लगाये परन्तु सेठ जी अपने लड़को की कब सुनने वाले थे।
      बच्चो ने एक दिन कहा, पिताजी! आज हमारे नगर मे एक अच्छे, मधुरभाषी और विद्वान महात्मा जी कथा करने के लिए पधार रहे है। रात्रि 9 से 10 बजे तक एक घण्टा श्रीरामायण की कथा करेगे। इसलिए आपको भी हमारे साथ वहाँ चलना है।

       यह सुनकर सेठ जी झट से बोले – क्या कहा ? रामायण की कथा होगी, मन्दिर के आँगन मे! तो फिर मै क्या करू ? मुझे कथा-वथा सुनने की फुर्सत ही कहाँ है … मै तो पहले भी कभी नही गया और न ही अब जाऊँगा। अभी तो बहुत आयु पड़ी है, कथा वार्त्ता करने और सुनने की।
       इस पर बच्चो ने दोबारा कहा – पिताजी! यदि आप कथा सुनना पंसद नही करते तो उन तेजोमय, ईश्वर रूप सन्त जी के पवित्र दर्शन ही करके चले आइयेगा। उनके आर्शीवाद से ही हमारा और आपका कितना कल्याण हो जायेगा। पिताजी! आपको पता नही कि सन्त-महात्माओ के दर्शन बड़े भाग्यों से मिलते है। जैसे कहा भी है –
।। दोहा ।।
सुत दारा और लक्ष्मी, पापी के भी होय ।
सन्त समागम हरि कथा, तुलसी दुर्लभ देह ।। 
      बस, यह सुनना था कि सेठ जी को तो आग लग गई। कहने लगे – अच्छा! कल के छोकरो! आज तुम भी मुझे समझाने लगे। बहुत देखे है ऐसे महात्मा मैने। यदि तुम्हे उन पर ऐसी श्रद्धा है तो तुम ही जाकर अपने भाग्य जगा लो। मुझे यह तुम्हारी झिकझिक अच्छी नही लगती। अपने ‘मनीराम’ को तो न तीर्थो के दर्शन अच्छे लगते है और न ही पूजा-पाठ, सत्संगादि। हमे तो जैसे-तैसे इस उदर पूर्ति की ही धुन सवार रहती है। हमारा यह सिर किसी के आगे झुकना नही सीखा। किसी ने सत्य ही कहा है –
 सूरज नूँ देख के उल्लू नूँ डर आवे, 
        चन दी जो चाँदनी चोराँ नूँ नही भावंदी ।
             चोपड़ी हुई रोटी जिवें भावंदी नही बन्दरा नूँ
गधयां नूँ मिश्री तो रूढ़ी है सुहावंदी ।
        मशाल दी जो रोशनी भावे न अन्हयां नूँ,
        डोरयाँ नूँ राग वाली धुनि नही सुहावंदी।
                 भावंदा नदी हाथियाँ नूँ अत्तर जिवें सज्जन जी!
                  तिवें कर्मा दे मारिया नूँ हरि-कथा नही भावंदी ।

      अर्थ – सूर्य के प्रकाश से सारी सृष्टि जगमगा उठती है, परन्तु उसी सूर्य के प्रकाश को उल्लू देख नही पाता।
      चाँदनी रात को सब पंसद करते है, परन्तु चोरों को चाँदनी रात अप्रिय लगती है। वे चाहते है सदैव अन्धेरी रात ही हो और हम अपना कार्य सिद्ध कर ले। 
      घी से स्निग्ध की हुई रोटी से बन्दर घृणा करता है जब कि अन्य सब लोग उसे चाव से खाते है। 
      गधे मिश्री की अपेक्षा गंदगी मे मुँह मारना अधिक पंसद करते है। 
      मशाल का प्रकाश नेत्रहीन मनुष्य को दुःखप्रद प्रतीत होता है। जब कि सब लोग उसकी रोशनी से लाभ उठाते है।
      जो कानों से बहरा हो उसके लिए राग गाने आदि सब निरर्थक है अर्थात् जिस प्रकार कहा भी है कि ‘भैंस के आगे बीन बजाये – भैंस खड़ी पगुराय।’
      इत्र की सुगन्धि से हाथी को क्या लाभ ? जिसने की स्नान करके अपने ऊपर फिर सूँड़ से मिट्टी व किचड़ डाल लेना है।
      इसी तरह से जो भाग्यहीन मनुष्य को उसको हरि-कथा व सन्तो के सत्संग आदि रूचिकर नही लगते वह उनसे दूर ही रहना चाहता है। 
      अब आइये अपनी कहानी पर कि इसी तरह से सेठ धन्नामाल का माया के धन्धो मे जीवन व्यतीत हो रहा था। दैवयोग से उनको किसी कार्यवश नगर से 15 मील की दूरी पर किसी गाँव में जाना आवश्यक हो गया। संध्या समय था। भगवान भास्कर अस्ताचल की ओट मे अपना मुख छिपा चुका थे। अन्धकार छा रहा था। सेठ जी अपने दो विश्वासपात्र साथियो सहित घोड़ो पर सवार होकर एक घने जंगल मे से जा रहे थे। ऊबड़-खाबड़ मार्ग था। यह तो सबको विदित ही है कि हिंसक पशु रात्रि होने पर ही प्रायः अपने-अपने शिकार की टोह मे निकलते है। सो यहाँ भी जंगल होने के नाते अकस्मात् एक सिंह दहाड़ता हुआ एवं हदय विदारक गर्जन करता हुआ उस की और ही आ निकला, जिस दिशा मे यह सेठ जी जा रहे थे। एकाएक सिंह को समक्ष देखकर सबको हाथों के तोते उड़ गये। मारे भय के सेठ जी के अश्व ने ज्योहीं उछाली भरी कि वह स्वयं को संभाल न पाये और घोड़े पर से गिर पड़े। नीचे पड़े एक नोकदार पत्थर से उसका सिर जा लगा। इसका सिर टकराने से पत्थर का तो क्या बिगड़ना था, परन्तु सेठ जी के सिर पर बहुत भारी चोट लगी। गुदगुदे शयन पर आराम करनेवाले, नौकरो-चाकरो पर प्रभुत्व रखने वाले तथा सदैव मायावी रंगरलियो मे लीन रहने वाले सेठ जी भला इस घातक चोट को कहाँ सहन कर सकते थे। कुछ देर वेदना से कराहते रहे और तड़पते रहे – पश्चात कुछ ही देर मे उनके प्राण-पखेरू शरीर में से उड़ान भर गये।
      अब पाठकगण तनिक उन दो व्यक्तियो का भी स्वल्प परिचय ज्ञात कर लेवें जो कि सेठ जी के साथ ही यात्रा पर जा रहे थे। अपने समक्ष सिंह को आते देख इनकी ‘काटो तो खून नही’ वाली स्थिति बन गई क्योकि उस समय तो सबके प्राण संकट मे थे। उधर सेठ जी तो पहले ही घोड़े से नीचे गिर कर तड़प रहे थे। ऐसी दशा मे हर किसी को अपने प्राणों की पड़ी थी। अतः बलपूर्वक घोड़े की लगाम खींच कर इन्होने आव न देखा ताव और बौखलाते हुए सीधे घर पहुँचे। तब कही जाकर इन्होने सुख का श्वास लिया तथा कुछ देर के बाद समस्त वृत्तान्त अथ से इति तक सेठ जी के सम्बन्धियो को कह सुनाया।
      इस प्रकार जीवन के अन्तिम समय मे सेठ जी मन की बातें मन मे लेकर चले गये। अब उनका पाँच भौतिक शरीर निष्प्राण होकर भूमि पर पड़ा था। रात्रि होने को आई, जंगली जानवर इधर-उधर अपने शिकार की टोह मे बाहर निकल पड़े। एक सन्त वही कही निकट ही जंगल मे कुटिया बना कर रहा करते थे, सयोंगवश वे भी उधर आ निकले। उन्होने चुपचाप यह सारी कार्यवाही देखी। तब कुछ देर रूककर शान्त भाव से लौटने ही वाले थे कि सामने से एक गीदड को आते देखा! यह गीदड़ अपनी बहन लोमड़ी को यह परामर्श दे रहा था कि चलो चल कर इस मृतक देह से अपना पेट ही भर ले। ज्योही उन्होने उस की और कदम बढ़ाये और निकट पहुँचे कि उसी समय वहाँ आकाशवाणी हुई –

      हे सियार! इस पापिष्ठ शरीर को मत छूना क्योकि इसके हाथों ने कभी दान देने का नाम नही लिया। कानों ने कभी पवित्र कथा अथवा सत्संग सुनने की चेष्टा नही की। सन्त-महात्माओ के पावन दर्शनो के लिए इन आँखो ने कभी प्रत्यन नही किया। इनके पाँव भूल कर भी कभी तीर्थ स्थानो पर नही गये। इनके पेट में सदा उस अन्न की कमाई जाती रही जो धन अन्याय और अधर्म से एकत्र किया गया था तथा यह मस्तक आजीवन किन्ही सन्त-महापुरुषो के चरणों मे नही झुक पाया। अतः इस देह का अंग-प्रत्यंग निन्दा और घृणा के योग्य है। तुम इसको तुंरत त्याग दो तथा किसी दूसरे भोजन की तलाश करो। 
      वे तो आकाशवाणी सुनकर दूसरे शिकार की खोज मे आगे बढ़ गया लेकिन वहाँ पर उस समय जो महात्मा जी उपस्थित थे उन्होने ने भी यह आकाशवाणी सुनी और यह शिक्षाप्रद सन्देश जन-साधारण के लिए उपस्थित कर गये जिसका की एक-एक शब्द कितना सच्चाई व श्रेष्ठता से भरा हुआ है।
      इस दृष्टान्त से हमें दो प्रकार की शिक्षा मिलती है। पहली यह कि यह काल भी एक अनूठा खिलाड़ी है। समस्त विश्व के साथ खिलवाड़ करता रहता है। जब भी चाहा, किसी को भी उठाकर झोली मे डाल लिया। चलते-फिरते चोग चुगते रहना ही इसका स्वभाव है। जैसे कहा भी है –
      मृत्यु का कोई निश्चित समय नही कि कब सिर पर आ धमके। देश-विदेश अथवा जहाँ कही भी उसकी इच्छा हुई आकर जीवों का गला दबोच डाला। इसलिए कभी भी यह नही सोचना चाहिये कि अभी मेरी बहुत उम्र पड़ी है।  
      दूसरी शिक्षा यह मिलती है कि जिस प्राणी ने अपने तन, मन, धन को सतगुरू, साधु-सन्तो की सेवा, तथा मन से भजन-सुमरण तथा धन को दान-पुण्य मे न लगाकर शरीर के सुख भोगो मे ही जीवन व्यतीत कर दिया तो उस मनुष्य का एक-एक अंग दूषित व अपवित्र है। जैसा की हम ऊपर पढ़ ही चुके है।         

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