बुरे कर्मो का भयानक परिणाम

।। दोहा ।।
जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोये तू फूल।
तोको फूल कै फूल है वाको है तिरसूल ।।
      अर्थात् मानव जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है। कोई किसी के लिए यदि भलाई करेगा तो उसका अपना ही भला होगा। यदि कोई किसी की बुराई करेगा तो मानो वह अपने लिए ही दुःखो के बीज बोयेगा। अतएव प्राणीमात्र को अपने जीवन मे श्रेष्ठ कर्म ही करने चाहिए। भूल कर भी कभी किसी का अहित नही करना चाहिये। कहावत है कि अगर कोई किसी के लिए गड़ढा खोदता है तो वह पूर्व स्वयं ही उसमे गिरता है। इसका विस्पष्ट प्रणाम निम्नलिखित दृष्टान्त मे मिलता है –
      किसी गाँव मे दो पडोसी रहा करते थे। उनमे एक तो गाँव के मुखिया का घर था तथा दूसरा घर अत्यन्त निर्धन एवं दरिद्री का। मुखिया का घराना तो धन धान्य से सम्पन्न और सुखी था – रहने को विशाल हवेली, गाय-भैंस, नौकर-चाकर सब कुछ थे। दूसरी तरफ बूढ़े किसान के पास कुछ भी नही केवल एक टूटा-फूटा झोपड़ा और थोड़ी सी जमीन थी। जिस पर कि वह गरीब जीवन व्यतीत करता था।
      संयोग की बात दोनों पड़ोसियो के इकलौते बेटे थे। और लगभग सम आयु के ही। अतः दोनों बच्चो साथ-साथ खेलते है। जिससे उनमे परस्पर घनिष्ट प्यार हो गया। मुखिया का बेटा धनवान होने के कारण अपने निर्धन मित्र को मित्रता के नाते कभी-कभी अपने घर से खाने के पदार्थ ला देता तथा अपने पुराने कपड़े भी उसे पहनने को दे देता। जैसा की प्रायः मित्रो मे हुआ करता है। परन्तु मुखिया अपने पुत्र की निर्धन बालक से मैत्री को देखकर मन ही मन कुढ़ जाता लेकिन प्रत्यक्ष मे वह उस भोले-भाले दरिद्र लड़के के भावो को किसी प्रकार की भी ठेस नही पहुँचाना चाहता था।
      दोनों लड़के जब कुछ बड़े हुए तब मुखिया ने तो निकटवर्ती गाँव मे अपने पुत्र को विद्याध्ययन के लिए भेज दिया क्योकि उस गाँव मे कोई पाठशाला न थी। ‘मनमोहन’ जब पढ़ने के लिए दूसरे गाँव मे गया तो निर्धन बाप का बेटा ‘बिहारी’ अपने मित्र मनमोहन की याद मे बेचैन रहा करे। शाम के समय मनमोहन घर लौटा। उसे भी सारा दिन बिहारी की याद ने उद्विग्न किया हुआ था। घर पहुँचते ही वह अपने साथी के पास गया और उसे दूसरे गाँव की पाठशाला मे प्रवेश करने की अपनी सारी बात कह सुनाई तथा बिहारी को भी यह सम्मति दी की वह उसी पाठशाला मे शिक्षा प्राप्त करने के लिए चले जिससे दोनो मित्र एक साथ हो जाएँगे और मन लगा रहेगा। किन्तु बिहारी का पिता अत्यन्त निर्धन था। वह पाठशाला का शुल्क व पुस्तको का खर्च दे सकने की सामर्थ्य नही रखता था फिर ऊँचे विद्यालयों मे पढ़ने के लिए बच्चों को अच्छी वेश-भूषा भी तो रखनी पड़ती थी। बिहारी के एक बार कहने से तो उसके पिता ने साफ इन्कार कर दिया परन्तु जब वह बार-बार आग्रह करने लगा तो उसका पिता पुत्र का मन रखने के लिए सहमत हो गया।
      दूसरे दिन पिता बिहारी को साथ लेकर दूसरे गाँव की पाठशाला मे गया। वहाँ जाकर उसने अध्यापक को अपनी सारी स्थिति स्पष्ट शब्दों मे कह सुनाई। अध्यापक दयावान् था। अतः उसने अपने बच्चे को निःशुल्क पढ़ाना स्वीकार कर लिया तथा कुछ पुरानी पुस्तके भी उसे पढ़ने के लिए दे दी। अब मनमोहन और बिहारी साथ-साथ विद्याध्ययन करने लगे।
      मनमोहन तो उजले और बढ़िया किमती वस्त्र धारण कर और नई-नई पुस्तके और मखमली बस्ते मे डाल बगल मे दाबे हुए होता था और बिहारी फटे-पुराने चीथड़ो मे लिपटा हुआ व मैले थैले मे पुरानी पुस्तकें डाले पाठशाला जाता। फिर भी विलक्षण मस्तिष्क रखने वाला बिहारी अध्यापक की आँखो का तारा बन गया। जब कि मनमोहन धनाढ़य होने पर भी उन्हे इनता प्रिय न लगता था क्योकि वह मन्दबुद्धि व पढ़ने मे भी असावधान रहता था। बिहारी वैसे भी तीव्र बुद्धि वाला, होनहार सरल स्वभाव का भद्र एवं विनय सम्पन्न लड़का था। परिणाम यह हुआ कि समस्त अध्यापक मनमोहन की अपेक्षा बिहारी से अधिक स्नेह रखते और उस पर कृपा भी करते। मनमोहन को तो पढ़ाई मे कमजोर होने के कारण पाठशाला मे प्रायः मार पड़ती जबकि बिहारी को आशातीत योग्यता के कारण अध्यापको से पुरस्कार भी प्राप्त हो जाया करता। इतनी विषमता होने पर भी दोनो मित्रों मे परस्पर स्नेह के तार लम्बे ही होते गये। वे पूर्ववत् हार्दिक प्रीति करते थे। इसी प्रकार दो तीन वर्ष निकल गए।
      समय बितने पर परीक्षा के दिन आए। परिश्रमी विद्यार्थी बिहारी तीव्र बुद्धि होने के कारण विद्यालय मे सर्वप्रथम रहा और मनमोहन मन्द बुद्धि के कारण असफल रहा। किन्तु जब मनमोहन के पिता ने बिहारी के सर्वप्रथम आने की एवं अपने पुत्र के अनुत्तीर्ण होने की बात सुनी तो उसके हदय मे पूर्व-सचित ईर्ष्याग्नि प्रचण्ड हो उठी। वह तो पहले ही निर्धनता के कारण उससे द्वेष रखता था तथा अब कहने लगा कि ‘निर्धन बिहारी की संगति ने मेरे लाडले पुत्र को बुरा बना डाला है। वहा! भला यह कैसे हो सकता है कि निर्धन-पुत्र सर्वप्रथम आये और धनवान का पुत्र असफल रह जाए।’ इतना कहता-कहता आग बबूला हो उठा।
      क्रोधावेष मे उसकी मनोवृत्ति ने पाशविक रूप धारण कर लिया तथा उसने बिहारी के प्राण हर लेने की योजना बना डाली। तत्पश्चात उसने गाँव के एक जल्लाद को बुला कर उसकी मुट्ठी गर्म करके उसे यह नीच कर्म करने को बाध्य किया कि जब स्कूल से दोनों बच्चे लौट रहे हो तब मार्ग मे तलवार के एक ही वार से बिहारी का सिर धड़ से अलग कर मेरे पास ले आना। तब मै तुझे और भी पुरस्कार दूँगा।
      सच है धन का लोभ मनुष्य को अन्धा कर देता है। जल्लाद भी लोभाधीन हो गया। उसने मुखिया से कहा कि मैने तो दोनो बच्चो मे से किसी को देखा तक नही, सो मै कैसे पहचान पाऊँगा कि मनमोहन कौन हैं? तथा आप यह भी बता रहे है कि दोनों अवस्था मे एक समान है। मुखिया ने उत्तर दिया – हमारे मनमोहन ने तो नीले रंग का रेशमी कुर्ता और धारीदार पायजामा पहन रखा है। तथा वह पैरो मे काले बूट व बगल मे मखमली बस्ता लिये होगा। इसके विपरीत बिहारी खद्दर का मैला कुचेला कुर्ता व फटा पयजामा तथा बगल मे फटा-पुराना बस्ता पकड़े होगा, बस उसी का ही तुम्हे वध करना है।
      जल्लाद ने दोनों की पहचान कर ली। अब मार्ग मे वह एक घनी झाड़ी मे छिप कर बैठ गया कि सायंकाल जब दोनों बालक इधर आयेगें तो वह तलवार के भरपूर एक ही वार से बिहारी का काम तमाम कर देगा।
      उधर भगवान् की अनोखी लीला देखिये – जब दोनो मित्र पाठशाला से अवकाश पाकर घर की और चले तो मनमोहन के अन्तःकरण मे अपने निर्धन मित्र के प्रति दया उमड़ आई। दिल मे सोचने लगा कि एक मै हूँ कि मुझे किसी प्रकार की कमी नही, पहनने को रेशमी कपड़े, बिछाने को मखमली गददे व खाने को स्वादिष्ट भोजन, नोकर-चाकर आदि सब भगवान ने दे रखे है किन्तु एक बुद्धि का धनी नही हूँ। इधर बिहारी इतनी कुशाग्रबुद्धि का बालक है जिसकी की अध्यापक प्रसंशा करते करते नही अघाते। बेचारे की निर्धनावस्था मुझसे तो देखी नही जाती। न तन पर पहनने को पर्याप्त वस्त्र, न पाँव मे जूते, किताबे भी तो पूरी नही। भर-पेट खाना उसे कभी प्राप्त नही होता। कभी-कभी तो भोजन के लिए भी वह तरस जाता है। ऐसे दरिद्र मित्र की सहायता करना मेरा कर्त्तव्य है। भगवान ने तो मुझे बहुत कुछ दे रखा है। ऐसा दिल मे विचार करते-करते उसने बिहारी से कहा – मित्र बिहारी! तुम्हारी यह दीन दशा मुझसे देखी नही जाती। आओ! आज तुम और हम आपस मे कपड़े परिवर्तन कर ले। तुम मेरे ये नये कपड़े पहन लो तथा मै तुम्हारे फटे-पुराने कपड़े पहन लेता हूँ। मुझे तो घर से ऐसे नये कपड़े और भी मिल जायेगे परन्तु तुम्हे कहा ….।
      इस पर बिहारी ने आपत्ति की – तुम्हारे पिताजी धनाढ़य है – बड़े आदमी है। ऐसा देख वे तुम्हे नाराज होगे, कदाचित् मारे भी।
      परन्तु मनमोहन तो आज अपने हठ पर अड़ा हुआ था। भाग्य उससे कुछ और जो कराना चाहता था। वह बोला – अजी! यदि पिताजी कपड़े देने पर मुझे रूष्ट होते है तो उन्हे होने दो। अरे! मेरे पास का कपड़ो की कमी है ? लो, ये मेरे कपड़े पहन लो जल्दी से उतार दो ये चीथड़े। तुम जैसे प्रतिभा सम्पन्न बालक के तन पर ये गन्दे कपड़े शोभा नही देते। लाओ! जरा हम भी आज गरीब वेष धारण करने का आनन्द ले ले। यह कहकर मनमोहन ने बरबस अपने बढिया कपड़े बिहारी को पहना दिये तथा बिहारी के मैले-फटे कपड़े स्वयं धारण कर लिये। इसके बाद उसने अपने काले रंग के बूट रेशमी फीते वाले बिहारी को पहना दिये और अन्त मे अपना मखमली बस्ता भी नई किताबों सहित बिहारी को देकर उसका फटा बस्ता स्वयं थाम लिया। इसके बाद दोनों मित्र हँसते-खेलते घर की और चल दिये।
      दुष्ट जल्लाद साहूकार के धन के लोभ मे बँधा हुआ झाड़ी मे छिपा बैठा था कि दोनों बच्चे इधर से गुजरेगे तो वह गरीब बिहारी के प्राण ले लेगा।

      “हमरे मन कछु और है, विधना के कछु और” वाली कहावत यहाँ अक्षरशः घटित होती है। जल्लाद को क्या मालूम था कि बच्चो का रंग ढ़ग बदल चुका है। उस ने बस यही पहचान याद रखी थी कि बढ़िया वस्त्रो और काले बूटो वाला मुखिया का पुत्र मनमोहन है और गरीब वेशभूषा धारण किये हुए बिहारी है। अब दोनों बच्चो के पास से गुजरने पर वह झाड़ी मे से एकाएक गुर्राते हुए भयानक भूखे भेड़िये की भाँति उन पर झपटा और उनसे एक ही वार मे मौत के घाट उतार दिया। दूसरा बालक भय के मारे चीखता चिल्लाता एक और भाग खड़ा हुआ। परन्तु जल्लाद ने उसका पीछा न किया। मारे जाने वाले बालक का सिर व लहु से भीगा खंजर उठाकर आया और आन की आन मे कटा सिर मुखिया की गोद मे ला पटका।

      मुखिया ने जब अपने प्रिय पुत्र का कटा सिर देखा तो उसके मुँह से निकला ‘हाय जालिम! यह क्या किया तूने! हाय मेरा लाडला बच्चा!’ और एक दर्द भरी चीख के साथ उसके हदय की धड़कन मन्द पड़ गई। दुष्ट ने अपनी करनी का फल पा लिया था।
      यह किसी ने सत्य ही कहा है कि ‘जो दूसरो के लिए गड़ढ़ा खोदता है, वह पूर्व स्वयं उस मे गिरता है।’
      बाज के निष्ठुर आक्रमण से बच कर निकल आने वाले सहमे हुए चिडिया के बच्चे के सदृश बिहारी थर्राता और कांपता हुआ घर पहुँचा तथा पिताजी की गोद मे गिरकर निश्चेष्ठ पड़ गया। उस गरीब को क्या मालूम की आज विधाता ने एक बुराई सोचने वाले को बुराई का कितना भयानक परिणाम दिखला दिया है।
      भावार्थ यह है कि प्रत्येक मनुष्य अपने कर्मो का स्वयं ही उत्तरदायी है। किये हुए कर्म के परिणाम से किसी भी रूप से कदापि कोई भी व्यक्ति बच नही सकता। कर्मफल से तो ऋषि मुनि तक न बच सके तो फिर एक साधारण मनुष्य की तो बात ही क्या है ? इसलिए सन्त महापुरूष जीवों को वर्तमान मे श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा देते है तथा यह भी शिक्षा प्रदान करते है कि दूसरो के लिए सदैव शुभ भावनाएँ रखनी चाहिये। जैसा कि ऊपर प्रसंग मे बताया गया है कि तुम दूसरो के लिए फूल बोवोगे तो तुम्हे फूल ही मिलेगे। अतएव सब के प्रति श्रेष्ठ भावनाएँ होनी चाहिए क्योकि आत्मा तो एक ही है जो सब के हदयो मे विद्यमान है। अतः दूसरो को भी अपनी आत्मा के रूप मे समझ कर समभाव से व्यवहार करना चाहिए। 
                                                                          

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