बुद्धिमान सेठ

   

     

      किसी समय कोई एक सेठ विदेश से व्यापार करके पैदल ही चला आ रहा था । क्योकि आज की भाँति पहले यातायात के साधन न होते थे । प्रायः पद यात्रा ही करनी पड़ती थी । सेठ के पास व्यापार द्वारा कमाया हुआ पर्याप्त मात्रा मे धन तो था ही । चलते चलते वह एक जंगल के समीप पहुँचा । कुछ दूर आगे बढ़ने पर उसे सुनसान स्थान पर तीन चोरों ने आ घेरा । उन्होने आते ही कहा – सेठ जी ! आप कहाँ जा रहे हो ?
      इस पर सेठ ने उत्तर दिया – मै अमुक शहर की और जा रहा हूँ ।
      तब चोरो ने कहा की हमने भी वही जाना है । यह सुनकर सेठ जी दिल मे भांप गये कि यह तीनों ही चोर है और मेरे धन को लुटने के लिए यह मेरे साथ चलने की बात कर रहे है । उसने दिल मे सोचा कि इस समय घबराना बिल्कुल नही चाहिए अपितु युक्तिपूर्वक बुद्धिमत्ता से बच निकलना चाहिए ।    
      चोर सेठ के साथ हो लिये । मार्ग मे परस्पर चारो वार्त्तालाप करते जा रहे थे । वार्त्तालाप करते हुए सेठ ने उनसे पूछा कि तुम किस वर्ण (जाति) के हो ? तब उनमे से एक ने कहा – मै ब्राह्मण हूँ, दूसरे ने क्षत्रिय और तीसरे ने कहा मै वेश्य जाति का हूँ । यात्रा करते करते जब चारों श्रान्त हो गए, तब विश्राम लेने के लिए ये सब कुछ देर एक वृक्ष की छाया में बैठ गए । वैश्य जाति वाले व्यक्ति से साहूकार ने कहा – तुम सामने वाले कुँए से जल ले आओ । जलपान करके पुनः आगे चलेंगे ।
      जब वह जल लेने चला गया तब सेठ ने ब्राह्मण व क्षत्रिय दोनो से कहा – मै जानता हूँ कि तुम तीनो चोर हो और मेरा सब धन लूट कर तुम तीन हिस्से करोगे । तुम मुझे मार्ग मे लूटने से पाप के भागी बनोगे तथा परलोक मे भी इसका दण्ड़ मिलेगा । इसीलिए मै स्वयं तुम्हे एक ऐसी युक्ति बताता हूँ जिससे तुम्हे आगे दण्ड न मिले तथा पाप भी न होने पाए एवं धन भी तुम्हे प्राप्त हो जाये ।
      सेठ की बात सुनकर दोनों चोरों ने प्रसन्न होकर कहा – हाँ हाँ, आप युक्ति बताइए ।
      इस पर सेठ ने कहा – सुनो ! मेरे पास जो धनराशि है । उसके हम तीन भाग करेगे । ब्राह्मण की और उन्मुख हो सेठ कहने लगा – हे ब्राह्मण देव ! धन का एक भाग तो संकल्प करके तुमको दान दे दूँगा । दूसरा यह क्षत्रिय वर्ण का है और मै भी इसी जाति का हूँ । अतः जाति भाई होने के नाते इसे भी एक हिस्सा दे दूँगा । परन्तु वैश्य जोकि पानी लेने गया है उसे मै क्यो व्यर्थ मे धन दूँ क्योकि धन के चार भाग करने पर हमे कम मात्रा मे सम्पत्ति मिलेगी ।
      सेठ की यह बात दोनों चोरों को पंसद आई वे कहने लगे – आपने तो हमे बहुत अच्छी युक्ति सुझाई । 
      जब वैश्य जल लेकर आया तो उस समय ब्राह्मण कहने लगा – अरे वैश्य ! तुम यहां से चले जाओ, यह साहूकार तो हमारा यजमान है । पुनः क्षत्रिय कहने लगा – यह हमारी जाति का भाई है अर्थात् जैसे मे क्षत्रिय वर्ण का हूँ वैसे यह भी उसी जाति का भाई है । इसीलिए हम इसे लूटेगे नही अपितु इसे हर प्रकार से सुरक्षित कर गांव तक छोड़ आवेंगे ।
      वैश्य उन दोनो की बातों का भाव समझ गया । वह दिल मे सोचने लगा कि इस समय यह तीन है और मै अकेला हूँ । अतएव मै इनसे मुकाबला नही कर सकता मेरे लिए अब यही उचित है कि वापिस घर लौट जाऊँ । ऐसा सोच वह अपना सा मुँह लेकर वापिस लौट आया ।
      उसके चले जाने के बाद सेठ, ब्राह्मण व क्षत्रिय तीनो आगामी यात्रा की और कदम बढ़ाने लगे । कुछ देर चलने पर सेठ ने चुपके से ब्राह्मण से कहा – अब किसी उपाय से क्षत्रिय से भी पिण्ड छुड़ाना चाहिए जिससे इस धनराशि को दो भागों मे परस्पर बांटकर हम पूर्णरूपेण लाभ उठाये । व्यर्थ में इसको अपना धन क्यो देवे । ब्राह्मण सेठ की बात सुनकर धन के लालच मे आ गया । जिससे वह अपनी बुद्धि को खो बैठा । यहां तक की वह सेठ द्वारा रचाये जाने वाले षडयन्त्र को भी न समझ सका । सेठ के बहकावे में आकर ब्राह्मण ने क्षत्रिय को मार्ग मे चलते हुए कही से पानी लाने को कहा ।
      उसके कहने पर वह पानी लेने के लिए चल दिया । इधर सेठ व ब्राह्मण दोनों लम्बे लम्बे डग भरते हुए शीघ्रता से आगे बढ़ने लगे जिससे क्षत्रिय उन्हे ढूढ़ ही न सके । इतने मे ये दोनो बातों ही बातों मे गाँव के निकट आ पहुँचे । गाँव के समीप पहुँचकर सेठ ब्राह्मण को एक कुँए की और ले गया जिसके निकट ही एक उद्यान था । उस उद्यान मे कई व्यक्ति बैठे हुए थे । उन्हें देखकर सेठ ने उच्च स्वर मे कहा – भाइयो ! यह चोर मेरा धन लूटने के लिए मेरा कब से पीछा कर रहा है इससे मुझे बचाओ ।
      सेठ की आवाज सुनकर सब व्यक्ति दौड़ते हुए आ गये । अत्यधिक मनुष्य को देख व प्राण संकट मे जान वह ब्राह्मण चोर बौखलाता हुआ वहाँ से भाग खड़ा हुआ ।
      इस प्रकार सेठ ने अपने बुद्धि कौशल से युक्तिपूर्वक उन चोरो से अपने धन व प्राणों की रक्षा की ।  

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