बुद्धिमान और मूर्ख मे अन्तर

आज के युग मे तो प्रायः अपनी वाक्-पटुता द्वारा लम्बी लम्बी बातें करके अथवा विद्वता का प्रदर्शन करके प्रत्येक जन अपने को बहुत बुद्धिमान समझता है। अल्प-विद्या जानने वाला भी स्वयं को सबसे ज्ञानवान् व चतुर बताता है। ऐसे लोगों की सभा मे यदि कोई भक्ति भाव रखने वाला सज्जन मूक बैठा हो, तो देखने वाले उसे अनजान मूर्ख ही समझते है। परन्तु वह सज्जन तो सहनशीलता की प्रतिमूर्ति होता है। ऐसे लोग क्षमाशील व सात्त्विक वृत्ति होने के कारण परस्पर के वार्त्तालाप मे से भी भक्ति के गूढ़ रहस्य ढूँढ़ते रहते है। इसका स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत कहानी मे दिया जा रहा है –

      प्राचीन समय की बात है कि एक राजा साहब अपने राजदरबार मे बैठे हुए थे। उस समय उन्होने एक छड़ी हाथ मे पकड़ी हुई थी जिसे देख सभा मे से किसी व्यक्ति ने पूछा – ‘महाराज! आज आप यह कैसी छड़ी पकड़े बैठे है? इस पर राजा ने कहा – सुनो! यह छड़ी उसकी है, जो सबसे बड़ा मूर्ख होगा। अभी वार्त्तालाप चल ही रहा था कि इतने में एक विदूषक आ पहुँचा। उसे देख किसी व्यक्ति ने विदूषक की ओर संकेत पाकर राजा ने वह छड़ी विदूषक को देते हुए कहा – ले, यह छड़ी अपने पास रख ले और याद रख की जब कोई तुझे अपने से बढ़कर मूर्ख मिले तो यह छड़ी उसी को दे देना।  
      विदूषक राजा की बात सुनकर चुप हो रहा। उसने राजा से वह छड़ी ले ली और उनकी बात पल्ले बाँध ली। यह विदूषक चतुर-चालाक न होकर प्रत्युत एक सीधा-सादा भोला-भाला व्यक्ति था। इसलिए दरबारी लोग उसे मूर्ख ही समझते थे। वास्तव मे वह एक सत्संगी, विचारवान् और ज्ञानी पुरूष था। राजा द्वारा कही गई बात का बुरा न मान कर उसे दिल मे रख लिया। अब वह हर घड़ी छड़ी को अपने हाथ मे रखता क्योकि उसने यह निश्चय कर रखा था कि जो सब से बढ़कर मूर्ख होगा, उसी को ही यह छड़ी दूँगा। राजा प्रतिदिन दरबार मे उसके साथ मजाक करते, ‘क्यो भाई! क्या अभी तक तुम्हे अपने से बढ़कर मूर्ख नही मिला, जो यह छड़ी अब तक तुम्हारे पास है।’  
      तब विदूषक ने उत्तर दिया, ‘नही महाराज! अभी तक तो मुझे कोई नही मिला परन्तु जब भी कोई सबसे अधिक मूर्ख मिल जायेगा, तो मै तत्काल ही उसको यह छड़ी सौंप दूँगा।   
      सत्य है कि समय बीतते देर न लगती। इधर विदूषक छड़ी को हर समय अपने पास सम्भाले रखता, उधर अकस्मात् राजा साहब जी अत्यधिक रोग ग्रस्त हो गए। यह एक लम्बी बीमारी थी क्योकि राजा साहब अब वृद्ध भी हो चुके थे, इससे अब वे दिन प्रतिदिन दुर्बल होते गए। चिकित्सा के लिए सुयोग्य वैद्य हर समय समीप होने पर भी रोग निरन्तर तीव्र गति से बढ़ता चला गया। कहते भी है कि जब किसी का अन्तकाल निकट आता है, तब कोई भी औषधि प्रभाव नही डाल पाती। अस्तु राजा साहब जी अब मृत्यु-शय्या पर पड़े थे क्योकि राजा साहब की शारीरिक अवस्था उत्तरोत्तर शोचनीय रुप धारण करती गई। यहां तक की असाध्य रोग जानकर राज्य-वैद्य ने भी जवाब दे दिया था। 
      मन्त्रीगण एवं दरबारी लोग सभी शोक मनाते हुए राज्य के पास उनके स्वास्थ्य का हाल पूछने आया करते थे। परन्तु अब तो उनके बचने की कोई आशा शेष न रही थी। राजा साहब जीवन से निराश हो आँखे मूँद लेटे हुए थे कि इसी समय विदूषक (जब कि समस्त मन्त्री-मण्डल व राजा के अन्य सम्बन्धी भी वहां पर बैठे थे) वहां आया और राजा को नमस्कार कर पलंग के निकट बैठ गया। राजा द्वारा दी गई छड़ी अब भी उसके हाथ मे थमी हुई थी। आहट पाकर राजा ने आँखे खोली। उस समय सादर खड़े होकर विदूषक ने राजा साहब की तबीयत का हाल पूछा।
      उत्तर मे राजा जी बोले – क्या पूछते हो भाई? अब अन्तिम बार ही मिल लो, चूंकि मै यहाँ से विदा होने वाला हूँ।
      विदूर्षक – (आश्चर्यचकित हो) क्यो महाराज! कहाँ की तैयारी है?
      राजा – हाँ भाई! अब मै यहां से कूच करने वाला हूँ। 
      विदूषक – महाराज! पहले जब आप यात्रा पर जाते थे, तो कई दिन पूर्व ही हर तरफ समाचार दिया जाता था और जाने की तैयारियां हुआ करती थी।    
      राजा – (झल्लाते हुए) अरे भाई! तुम्हारी समझ मे जो यह बात न आए, तो मै क्या कहूँ? अब जिस यात्रा पर मैने जाना है, इसमे किसी को समाचार देने का अवकाश तक नही मिल पाता, अपितु एकदम ही चल देना पड़ता है।   
      विदूषक – अच्छा महाराज! तनिक यह तो बताने की कृपा करे कि आखिर कितनी दूर, किस देश मे आपने जाना है?
      राजा – (विवश होकर) भाई! यह भी ज्ञात नही, कि मैने कहाँ जाना है और यह इतनी लम्बी यात्रा है कि जिसका अनुमान लगाना भी दुष्कर (कठिन) है।  
      विदूषक – तब महाराज! इस यात्रा के लिए तो फिर आपने सवारी आदि का प्रबन्ध कर ही लिया होगा।  
      राजा – ना भाई! इस यात्रा मे किसी प्रकार की भी सवारी साथ नही जा सकती। 
      विदूषक – क्यो महाराज! आखिर इस रास्ते मे से सवारी क्यो नही जा सकती?  
      राजा – भाई साहब! यह तो परलोक का सफर है। अस्तु इसमे सवारी का क्या काम? हाँ! जिन लोगों ने मालिक का भजन कर सत्यतापूर्वक जीवन व्यतीत किया है, उनके लिए सवारी का प्रबन्ध होता है। वे लोग देवलोक से आये हुए विमानों पर जाते है, लेकिन मुझे तो इसकी आशा ही नही। 
      विदूषक – महाराज! यह तो बड़े आश्चर्य की बात है। अच्छा यह तो बताये कि आपके साथ जायेगे कौन-कौन?
      राजा – (निश्वास छोड़ते हुए) परलोक की यात्रा मे कोई भी साथी साथ नही जाता। अकेला ही जाना पड़ता है। 
      विपूषक – क्योकर! आपके कुटुम्बी, मित्र-सम्बन्धी, मन्त्री आदि क्या सभी यही रह जायेगे?   
      राजा – हाँ भई! इनमे से कोई भी मेरे साथ नही जा सकता।  
      विदूषक – अच्छा महाराज! यात्रा-खर्च के लिए आप क्या ले जायेगे? यह धन, माल, इतना बड़ा राज्य, लाखो की संख्या मे सेना – क्या इनमे से कुछ भी साथ नही जायेगा?
      राजा – नही! ये सब यही के यही धरे रह जायेगे, इनमे से कुछ भी साथ नही ले जाऊँगा।  
      विपूषक – तो महाराज! सफर खर्च के बिना कैसे निर्वाह होगा? क्या आप जहां जा रहे है वहां आपके स्वागत सत्कार का कुछ प्रबन्ध होगा?
राजा – नही।
      विदूषक – आप इतने बड़े राजा है फिर आपका अभिनन्दन वहां क्यो नही होगा?
      राजा – अरे भाई! अभिनन्दन तो वहाँ उन लोगो का होता है, जिन्होने मालिक का भजन किया हो। मेरे जैसो का स्वागत करने वाला वहाँ कौन है? 
      विदूषक – अच्छा महाराज! एक बात और पूछ़ूँ? वहाँ जाकर आप रहेगे कहाँ पर? आपके रहने के लिए कोई महल भी बनाया गया है अथवा नही? 
      राजा – (खीझता हुआ) मैने पहले ही कहाँ था ना, कि वहां स्वागत-सत्कार तथा ठौर ठिकाना उनके लिए ही है, जो मालिक का भजन करते है। मेरे जैसे मायासक्त प्राणियो को एवं पापियो को तो वहां धक्के ही खाने पड़ेगे।
      विदूषक – यह तो बड़े आश्चर्य की बात है कि आप जैसे महाराजा परलोक मे जाये तो वहां भी आपके स्वागत का कोई प्रबन्ध न हो। यहां से भी इतने बड़े राज ऐश्वर्य मे से, मित्र-कुटुम्बी आदि में से कुछ भी साथ न ले जा सके, वहां भी रहने के लिए आपको कोई स्थान प्राप्त न हो, क्या इसका कोई प्रबन्ध नही हो सकता?
      राजा – हो, क्यो नही सकता, पर क्या कहूँ।  
      विदूषक – अच्छा तो फिर महाराज! क्षमा करना – आप यह अपनी दी हुई छड़ी मुझसे वापिस ले लिजिए।   
      राजा – यह क्यो?
      विदूषक – मेरे विचार मे आप ही इसके योग्य है तथा आप स्वयं ही कह रहे है कि इस बात को जानते हुए भी आपने अमूल्य समय का लाभ क्यो न उठाया? जबकि मालिक ने आपको इतनी दया करके यह मनुष्य जन्म का अनमोल रत्न दिया था। राज्य, मान, बड़ाई, धनपदार्थदि किसी बात की कोई कमी न थी और जो काम भी आप करते आपको इसका पूरा अधिकार था, समय भी आपके पास बहुत था, परन्तु खैद है कि आपने अपने अनमोल समय का मूल्यांकन न कर उसे विषय-भोगों मे ही नष्ट कर अपने वास्तविक उद्देश्य को नितांत विस्मृत कर डाला। यदि आप इस जीवनकाल मे सत्संग व मालिक का भजन करते, तो परिणाम यह होता कि आप उज्जवल मुख लेकर बड़े सम्मान के साथ विमान पर सवार होकर मालिक के धाम जाते, लेकिन अफसोस! आपने इसका कोई प्रबन्ध नही किया अब तो सिवाय पछताने के और कुछ न मिलेगा। अब आप ही बताइये, महाराज! भला इससे बढ़कर मूर्खता क्या होगी कि अवसर हाथ मे रहते हुए भी आपने परलोक को न सँवारा।           
      राजा – (अफसोस करते हुए) यही तो मुझसे भी बड़ी भारी मूर्खता हुई है। 
  
      अन्त में विदूषक राजा को छड़ी सौंप चलता बना। राजा के दुख का कोई पारावार न था। इसी दु:ख मे राजा के प्राण पँखेरू उड़ गये।  
      दृष्टान्त का भाव यह है कि राजा के कथनानुसार ज्ञानवान् विदूषक ने किसी प्रकार का बुरा न मान कर छड़ी ले ली। यद्यपि वह ‘मूर्ख’ शब्द का अर्थ समझता था परन्तु राजा तो राजमद के कारण ही उसे सीधा-सादा व्यक्ति जान ‘मूर्ख’ नाम से पुकारता था। वास्तव मे वह विदूषक मनुष्य-जन्म की सार्थकता एवं उद्देश्य से परिचित था। जब राजा का अन्तिम समय आया तो किस प्रकार उचित अवसर पर उसने अपनी पराबुद्धि का ज्ञान राजा पर प्रकट किया, जिसे सुनकर राजा के होश ठिकाने लगे, परन्तु अब तो समय हाथ से निकल चुका था। सिवाय अफसोस के उसके हाथ कुछ न लगा। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को इस कहानी से शिक्षा ग्रहण कर अपने दुर्भल मानव जन्म का यथार्थ मूल्याकंन करना चाहिए तथा संसार मे विचरते हुए मालिक का भजनाभ्यास कर अपना परलोक सँवारना चाहिए, जिससे मालिक की प्रसन्नता व सच्चा आनन्द प्राप्त हो।                   
         

Leave a Reply

Your email address will not be published.