बाबा गंभीरनाथ

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      हिन्दू धर्म, दर्शन, आध्यात्म और साधना मे ‘नाथ सम्प्रदाय’ का प्रमुख स्थान है। पूरे भारत मे इस संप्रदाय के विभिन्न मठो, एवं मन्दिरो की देखरेख गोरखनाथ मंदिर से की जाती है। गोरखनाथ मन्दिर की स्थापना के बाद से ही यहाँ पीठाधीश्वर या महंत की परम्परा रही है। गुरू गोरखनाथ के प्रतिनिधि के रूप मे सम्मानित संत को महंत की उपाधि से विभूषित किया जाता है। इन्ही प्रतिनिधियो मे से एक सन्त योगिराज बाबा गभींरनाथ है। बाबा गंभीरनाथ बीसवीं सदी के नाथ संप्रदाय के महान सिद्ध पुरूष माने जाते है।
      गंभीरनाथ जी का जन्म जम्मू और कश्मीर राज्य के एक समृद्ध परिवार मे हुआ था। वे बहुत ही सरल स्वभाव के थे। युवावस्था मे ही इन्हे सांसारिक जीवन से वैराग्य उत्पन्न हो गया। वे शान्ति की तलाश मे इधर-उधर भटकते रहे। वह अकसर घर से निकल पड़ते और जाकर श्मशान मे बैठ जाते थे। एक दिन नाथ संप्रदाय से सबंधित एक सन्यासी गंभीरनाथ से मिले। गंभीरनाथ उनसे सत्संग करके बहुत प्रभावित हुए और उनसे दीक्षा प्रदान करने का निवेदन किया। उस संन्यासी ने गंभीरनाथ को स्वयं दीक्षा देने से मना कर दिया और उन्हें उत्तर प्रदेश राज्य के गोरखपुर मे स्थित गोरखनाथ मन्दिर के महंत से दीक्षा लेने की सलाह दी।
      गंभीरनाथ उस ‘नाथ संन्यासी’ की सलाह को मानकर गोरखपुर के गोरक्षपीठ को ही अपने जीवन की तपस्थली बना लिया। ये पीठ की एक छोटी सी कोठरी मे रहकर ही गुरू गोरखनाथ द्वारा प्रतिपादित योग की निरन्तर साधना करने लगे। इन्होने अनेक हिन्दू धर्मशास्रो का गहनता से अध्ययन किया। इनकी श्रीमदभगवदगीता मे अनन्य निष्ठा थी।
      बाबा गंभीरनाथ ने नाथ संप्रदाय के योग सिद्धान्त को पुनर्जीवित किया। ‘नाथ योग परंपरा’ मे बाबा गंभीरनाथ का विशिष्ट स्थान है। इन्होने मानवता को योगशक्ति से सम्पन्न किया तथा हठयोग, राजयोग और लययोग के क्षेत्र मे सिद्धि प्राप्त की।
      गंभीरनाथ ने बीसवी सदी मे योगी गोरखनाथ की योग साधना पद्धति का प्रतिनिधित्व करते हुए योग एवं ज्ञान का समन्वय स्थापित किया। इन्होने महर्षि पंतजलि एवं गौरखनाथ की योग परम्परा का भी समन्वय किया।
      इन्होने वारणसी, प्रयाग, अमरकटंक आदि तीर्थस्थलो सहित लगभग सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया। इस यात्रा मे ये बहुत से ऋषियो व सन्तो से मिले। बाबा गंभीरनाथ ने स्वयं कभी भी अपनी सिद्धियो का प्रदर्शन नही किया। उन्होने अपनी सिद्धियो का उपयोग केवल मानव कल्याण के लिए किया। गंभीरनाथ जी ने आगे चलकर अपने अनुयायियो से कहा कि साधु सन्तो का आदर-सम्मान तथा सेवा करना आप सभी का कर्त्तव्य होना चाहिए।
      बाबा गंभीरनाथ जी मे एक और विशेषता थी कि वे बहुत अच्छा सितार बजाते थे। सितार की धुन पर भजनों का मधुर गायन भी करते थे। उनका मानना था कि सदा सत्य बोलना चाहिए, छल-कपट से दूर रहना चाहिए। समस्त धर्मो और मतों का सम्मान करना चाहिए। उनके परम शिष्य और श्री अक्षय कुमार बंदयोपाध्याय ने ‘योगिवर गंभीरनाथ’ नामक पुस्तक की रचना की।
      बाबा गंभीरनाथ पुरी (उड़ीसा) मे श्री मत विजयकृष्ण गोस्वामी से आध्यात्मिक संवाद के उपरान्त 1906 से अपने अन्तिम समय तक स्थायी रूप से गोरखपुर के मठ मे ही रहे। मानवता का कल्याण करते हुए अंत मे बाबा गंभीरनाथ ने 21 मार्च, 1917 को त्रयोदशी के दिन अपना नश्वर शरीर त्याग दिया। गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) के गोरक्षनाथ मंदिर के दिव्य, शान्तिमय और पवित्र प्रांगण मे ही उनकी समाधि स्थापित है, जो शाश्वत सत्य और शान्ति का प्रतीक है।

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