बादशाह फिलिफ्स का अनोखा घोड़ा

      बादशाह फिलिफ्स का नाम तो अपने सुना ही होगा, नही सुना तो आपको बता दे कि बादशाह फिलिफ्स सिकन्दर महान के पिता जी है। सिकन्दर का पिता बादशाह फिलिफ्स घोड़े की सवारी का बड़ा शौकिन था। इसलिए उस ने अपनी घुड़शाला मे अच्छे से अच्छे घोड़े रखे हुए थे। चूँकि उन दिनों आधुनिक युग की भाँति युद्ध के सामान एटमबम, टैंक, मशीनगंज, बारूद आदि कुछ नही हुआ करते थे। प्रत्युत हाथी, घोड़ो पर सवार हो मैदान मे आमने-सामने होकर तलवारों से ही लड़ना पड़ता था। इसी विचार से ही उस समय के राजा लोग अपनी सेना मे अच्छे-अच्छे शस्त्र और बाढ़िया जाति के घोड़े जो फुर्तीले तथा तीव्र गति से चलने वाले होते थे, सदैव इकट्ठे करने के लिए प्रयत्नशील रहा करते थे। इसी सिद्धानुसार बादशाह फिलिफ्स भी ऐसा करता था।
      एक बार अरब देश का सौदागर एक सुन्दर घोड़ा लेकर फिलिफ्स के दरबार मे उपस्थित हुआ। बादशाह ने खुश होकर वह घोड़ा खरीद लिया और सौदागर को उचित दाम देकर घोड़े को अपने अस्तबल में भिजवा दिया। दूसरे दिन अपने सवारों से कहा कि इस घोड़े को खुले मैदान में ले जाकर परखो की यह अपनी आकृति के अनुरूप गुण भी रखता है या नही ताकि इसे सवारी के लिए तैयार किया जाए। 
      बादशाह की आज्ञानुसार दूसरे दिन सवार उस घोड़े को लेकर मैदान मे पहुँचे। घोड़े को परखने के लिए एक  सवार ज्योही उस पर चढ़ा त्यों ही घोड़ा आपे से बाहर हो गया तथा सवार को नीचे गिरा दिया। तत्पश्चात घोड़ा इधर उधर भटकने लगा। बड़ी मुशिकल से पकड़ कर उसे बाँधा गया। इसके बाद अन्य शाही सवार उस पर चढ़ा तो उसकी भी वही दशा हुई। इस प्रकार जब पाँच-सात शाही सवार चोटें खाने के उपरान्त असफल रहे तो यह सूचना बादशाह तक जा पहुँची। बादशाह सोचने लगा कि कोई अच्छे से अच्छा सवार मिले तो जो इस घोड़े को हमारे योग्य बना सके। क्योकि देखने मे यह घोड़ा अन्य अश्वो से बिल्कुल अनोखा, निराली चाल-ढ़ाल व अति सुन्दर था, अतः बादशाह इसे छोड़ना भी न चाहता था। उसने कई बलवान व चतुर सरदार इस कार्य के लिए नियुक्त किये परन्तु अन्त मे वह भी घोड़े द्वारा प्रताड़ित किये जाने पर निराश हो गए। उन्हे भी बादशाद के समक्ष लज्जित होना पड़ा। भाव यह कि घोड़ा किसी के भी नियन्त्रण न हो सका। फलतः बादशाह परेशान हो गया। सोचने लगा कि मै इतने बड़े साम्राज्य का मालिक हूँ पर आज एक साधारण से पशु को वश मे करने के लिए हमारी सेना मे से कोई भी वीर योद्धा न निकला। इस कारण संसार हमे कायर व निर्बल न कहेगा, तो क्या कहेगा ?
      बादशाह सवारो मे इसी विषय पर वार्त्तालाप कर रहा था कि उसी समय उसका पुत्र सिकन्दर आया। घोड़े की वार्त्ता सुनकर उसने प्रार्थना कि – पिता जी! मै स्वयं इस घोड़े को सिद्ध करने का प्रयास करूँगा। यह कार्य मुझे सौंपा जाए और कुछ दिन का अवकाश भी दे दिया जाए। देखता हुँ यह कैसे वश मे न होगा। 
      पुत्र की बात सुनकर पिता ने निराशा से कहा – ‘जहाँ इतने बड़े-बड़े योद्धा हार मान गए फिर वहाँ तेरी क्या बिसात। यह घोड़ा तो अपने ऊपर किसी को सवार होने ही नही देता इसलिए तू क्यो व्यर्थ मे अपनी जान खतरे मे डालता है।’ परन्तु सिकन्दर के दृढ़ विचारो ने पिता को विवश कर ही दिया। अन्तत: उसने इस कार्य के लिए पुत्र को प्रसन्नतापूर्वक विदाई दे दी और सिकन्दर को घोड़े की लगाम थमा दी।
      दूसरे दिन पूरी तैयारी की गई। इसके साथ बादशाह ने कुछ सैनिक अंग रक्षस के रूप मे इसके साथ कर दिये। सिकन्दर विचारवान्, होनहार, अत्यन्त गंभीर व साहसी था। अतएव उसने सर्वप्रथम घोड़े की चाल ढ़ाल व उसके उछलने व कूदने के कारणों को बड़ी सूझ-बूझ के साथ विचारा। अन्त मे सिकन्दर इस परिणाम पर पहुँचा की यह घोड़ा अपनी ही छाया से भयभीत होता है। इस विचार को उसने अपने हदय मे बैठा लिया और एक खुले मैदान मे जाकर घोड़े की कमरबन्ध को अच्छी तरह जकड़ लिया। बागों को अत्यन्त दृढ़ता व सावधानी से हाथ मे थाम झट से उस पर सवार हो शीघ्रता से घोड़े का मुँह सूर्य के सम्मुख करके तेजी से दौड़ाना शुरू किया। इस प्रयत्न से घोड़ा हवा से बातें करने लगा। बागों को तनिक भी ढ़ीला न छोड़ा। घोड़ा अपनी आदत के अनुसार इधर-उधर होने का प्रयास करता रहा किन्तु चतुर सिकन्दर ने तो पूर्व ही उसकी प्रकृति का ज्ञान प्राप्त कर उसे वश से करने का कार्यक्रम बना लिया था। अन्त मे जब घोड़ा दौड़ते-दौड़ते श्रान्त हो गया तब उसने दौड़ाना बंद कर दिया। घोड़ा थक कर चूर हो चुका था अब सिकन्दर घोड़े से नीचे उतरा और उसकी पीठ सहलाने लगा।
      इस प्रकार निरन्तर सात दिन तक यह कार्य रहा। पहले तो सिकन्दर घोड़े को सूर्य के सन्मुख दौड़ाने का प्रयास करता रहा, फिर आगे-पीछे, दाये-बायें पुनः चारो दिशाओ की और घुमाकर दौड़ाने का अभ्यास करा के उसे पूर्णतया अपने वश मे कर लिया।
       बादशाह को जब घोड़े के नियन्त्रण कर लेने की सूचना मिली तो वह स्वयं पुत्र की वीरता को देखने के लिए उस स्थान पर आया। आज मात खाये हुए सब सवार व स्वयं बादशाह अत्यधिक प्रसन्न हो रहे थे। पिता ने पुत्र की पीठ थपथपाते हुए पूछा – क्या तूने कोई जादू-मन्त्र के द्वारा इस घोड़े को सिद्ध किया है? आखिर इस चंचल घोड़े को वश में करने का क्या रहस्य है तेरे पास ?
       सिकन्दर ने उत्तर मे कहा – ‘पिता जी! सर्वप्रथम मैने इसकी चाल ढ़ाल को देखकर तत्क्षण ही भांप लिया कि यह घोड़ा अपने प्रतिबिम्ब को देखकर ही ड़रता है। यह अपनी परछाई को भूत समझकर इधर-उधर भागता है और इसी कारण ही यह अपने ऊपर किसी को नही टिकने देता। अतः मैने इसकी प्रकृति से परिचित होकर प्रथम इसकी बागों को कसकर अपने हाथों मे थाम लिया, पश्चात उसका मुँह सूर्य के सामने किया जिससे घोड़े की परछाई जिसे वह भूत समझता है न दिखाई पड़े प्रत्युत उसकी छाया उसके पीछे ही रहे। ऐसा करने से शनैः शनैः इसके मन से भूत का भ्रम जाता रहा और चंचल स्वभाव भी परिवर्तित हो गया। अब इसको इतना साध लिया गया कि चाहे जिधर भी चलाना चाहे, बिना उछल कूद किये सवार को उसके लक्ष्य की और ले जायेगा। 
      इस तरह सिकन्दर महान ने अपनी वीरता और चुतराई का परिचिय देते हुए। उस अनोखे चंचल घोड़े पर विजय पा ली। जिससे की कई बड़े-बड़े सवार चोटे खा चुके थे। लेकिन सिकन्दर के दृढ़ संकल्प ने उस पर विजय पाई और उसे अपने वश मे कर लिया।     

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