बादशाह जहाँगीर (सलीम)

      जहाँगीर अकबर का पुत्र था। उसके बचपन का नाम सलीम था। जहाँगीर एक न्यायप्रिय शासक था और अपने उत्तरदायित्व को ईश्वर के प्रति अपना कर्त्तव्य मानता था। वह सुशिक्षित, सुसभ्य एवं प्रजापालक था। उसने अपने पिता से प्राप्त साम्राज्य को सुरक्षित और सम्पन्न रखा।


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जहाँगीर (1605-1627ई.)

      जहाँगीर का जन्म 31 अगस्त सन् 1569 ई. मे फतेहपुर सीकरी मे शेख सलीम चिश्ती की कुटीया मे हुआ। अकबर के नवरत्न अब्दूर्रहीम खानखाना से सलीम ने तुर्की तथा फारसी भाषाओ का ज्ञान प्राप्त किया। अकबर की मृत्यु के बाद 1605 ई. मे सलीम का राज्यभिषेक नूरूद्दीन मुहम्मद जहाँगीर से हुआ। उन्होने 22 साल तक शासन किया।
विद्रोह एवं दमन
      गद्दी पर बैठते ही जहाँगीर को सर्वप्रथम अपने पुत्र खुसरो के विद्रोह का सामना करना पड़ा। जहाँगीर ने खुसरो को आगरा के किले मे नजरबंद कर लिया किन्तु खुसरो कैद से भागकर लाहौर पहुँचा। वहाँ उसने सिखो के पंचम गुरू अर्जनदेव से अपनी सेना के लिए आर्थिक सहयोग लिया लेकिन शाही सेना से खुसरो की सेना परास्त हो गई। खुसरो की सहायता के कारण गुरू अर्जनदेव को मृत्युदण्ड दिया गया। सिख गुरू की फाँसी जहाँगीर के लिए नीति विरूद्ध कार्यवाही सिद्ध हुई क्योकि इससे सिखो का, जो तब तक एक शान्तिप्रिय समुदाय था, मन खट्टा हो गया और वे साम्राज्य के शुत्रओ के रूप मे परिवर्तित हो गये।
      जहाँगीर की सबसे बड़ी सफलता मेवाड़ के साथ युद्ध का अन्त था। जहाँगीर ने मेवाड़ पर आक्रमण के लिए अपने पुत्र खुर्रम (शाहजहाँ) को भेजा। खुर्रम ने वहाँ के राणा अमरसिंह को संधि करने के लिए विवश किया। दक्षिण भारत अहमद नगर पर जहाँगीर के पुत्र खुर्रम ने आक्रमण करके मुगल साम्राज्य का अंग बना लिया। इस उपलब्धि के कारण ही जहाँगीर ने खुर्रम को ‘शाहजहाँ’ की उपाधि प्रदान की। जहाँगीर ने अकबर की सुलहनीति का अनुसरण करके मेवाड़ को उदार शर्ते देकर राजपूतो की राजभक्ति प्राप्त कर ली। जो औंरगजेब की अनितियो से पहले तक मुगल साम्राज्य के प्रति बनी रही।
    जहाँगीर ने कई शक्तिशाली सरदारो एवं राजपूतो को ऊँची पदवी दी जिससे उसका साम्राज्य सुदृढ़ हो सके।

जहाँगीर : एक व्यक्तित्व

      जहाँगीर ने सभी लोगो के हदय मे विजय पाने का प्रयत्न किया। उसने अपने विरोधियो को सामान्य रूप से क्षमादान कर दिया, बंदियो को मुक्त किया। उसने कई घोषनाएँ भी करवायी जिससे उसके राज्य के लोगो मे अच्छे आचरण की प्रवृत्ति का विकास हो। जहाँगीर कला एवं साहित्य का प्रेमी था। वह स्वयं विद्वान था। उसने फारसी मे ‘तुजुके जहाँगीरी’ नामक आत्मकथा लिखी। उसे उद्यान लगाने का भी शौक था। जहाँगीर चित्रकला का बड़ा कुशल पारखी था। वह एक ही चित्र मे विभिन्न चित्रकारो द्वारा बनाये गये मुख, शरीर तथा पैरो को अलग-अलग पहचान सकता था।

न्याय की जंजीर

      जहाँगीर ने अपने शासन काल मे ‘न्याय की जंजीर’ लगवायी। जहाँगीर जनता के कष्टो और मामलो को खुद ही सुनता था और उनकी समस्याओ को हल करने की पूरी कोशिश करता था, एवं उन्हे न्याय दिलवाता था।
इसके लिए जहाँगीर ने आगरे के किले शाहबुर्ज और यमुना तट पर स्थित पत्थर के खंबे मे एक सोने की जंजीर बंधवायी थी। जिसमे करीब 60 घंटिया लटकी हुई थी, जो ‘न्याय की जंजीर’ के रूप मे प्रसिद्ध हुई। जिसे कोई भी बजाकर बादशाह से फरियाद कर सकता था।
      यह करीब 40 गज लम्बी थी। जिसे बनवाने मे जहाँगीर को काफी लागत खर्च करनी पड़ी। वही आज भी जहाँगीर को न्याय की जंजीर के लिए याद किया जाता है।
      जहाँगीर के शासन काल मे पूर्तगालियो में अपनी व्यापारिक स्थिति मजबूत ही रखी। उसके काल मे अग्रेजों तथा मुगलो के मध्य नवीन सम्बन्धो का विकास हुआ। जहाँगीर पुर्तगालियो और अंग्रेजो को नजरअंदाज नही कर सका क्योकि इन दोनों की नौसैनाएँ सुदृढ़ थी।

      इग्लैण्ड के सम्राट जेम्स प्रथम ने व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए हॉकिन्स को तथा उसके बाद सर टॉमस रो को आधिकारिक राजपूत बनाकर भारत भेजा। उन्होने जहाँगीर से अंग्रेजो के लिए भारत में व्यापार करने की आज्ञा प्राप्त कर ली। जहाँगीर अंग्रेजो के जहाजी बेड़े से पहले से ही प्रभावित था। अतः उसने अंग्रेजो को भारत मे व्यापार करने की आज्ञा दी। अंग्रेजो द्वारा भारत मे ब्रिटिश राज्य स्थापित करने का यह प्रथम चरण था।
      जहाँगीर को मंदिरा पान की बुरी आदत थी जिससे उसके चरित्र के उत्तम पहलू धीरे-धीरे नष्ट हो गये तथा उसके स्वभाव मे असंगति आ गयी जो उसके पतन का कारण बनी। मुगल सम्राट जहाँगीर की 28 अक्टूबर सन् 1927 ई. मे मृत्यु हो गयी। उन्हे पाकिस्तान (लाहौर) मे रावी नदी के किनारे मे बसे बागसर के किले मे दफनाया गया।

जहाँगीर के काल में नूरजहाँ का प्रभाव

      नूरजहाँ का बचपन का नाम मेहरून्निसा था। उसका पिता गयासबेग तेहरान का निवासी था। उसका विवाह शेर अफगान नामक एक ईरानी के साथ हुआ था। शेर अफगान की मृत्यु के बाद जहाँगीर ने मेहरून्निसा से विवाह कर लिया। उसकी बुद्धि एवं सुन्दरता के कारण उसे जहाँगीर द्वारा नूरजहाँ की उपाधि दी गयी।
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      नूरजहाँ ने जहाँगीर का भव्य मकबरा बनवाया। जो आज भी लाहौर मे पर्यटको के आकर्षण का मुख्य केन्द्र है। जहाँगीर के बाद इन्ही का पुत्र (खुर्रम) शाहजहाँ मुगल सिहांसन का बादशाह बना।

      जहाँगीर के शासन काल मे नूरजहाँ की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। नूरजहाँ योग्य महिला थी। उसने राज्य के कार्यो मे जहाँगीर को पूरा सहयोग दिया एवं बादशाह के व्यसनों पर नियंत्रण किया। नूरजहाँ बड़ी बलवती एवं साहसी महिला थी। वह जहाँगीर के साथ शिकार को जाती, शेरो को स्वयं मारती तथा युद्ध मे भी सक्रिय योगदान देती थी। वह एक सुशिक्षित तथा सुसंस्कृत महिला थी। कला मे उसकी विशेष रूचि थी।

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