प्रेम का सौदा

।। दोहा ।।
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा प्रजा जेहि रुचै, सीस देय ले जाय ।।

       प्रस्तुत दोहे मे परम सन्त श्री कबीर साहिब जी कथन करते है कि प्रभु का दिव्य प्रेम एक ऐसी अलौकिक देन है। जिसे चाहते तो सब है परन्तु पा नही सकते क्योकि पूर्ण आत्म-समर्पण कर देने से ही इसकी उपलब्धि हुआ करती है। प्रेम कोई खेती-बाड़ी मे तो पैदा नही होता, न ही यह दुकानों पर मिल सकता है। यह तो केवल अपने इष्टदेव मालिक के चरणो मे आपाभाव न्यौछावर कर देने से ही मिल सकता है। चाहे वह राजा हो अथवा साधारण पुरूष, जब तक की मन के सिर का बलिदान न किया जायेगा तब तक इस अदभुद्ध प्रेम को कोई नही पा सकता। जैसा की इस दृष्टान्त से स्पष्ट होता है कि –
      किसी स्थान पर एक उच्च कोटि के सन्त-सत्पुरूष रहा करते थे। उनके सत्संग प्रचार व परमार्थ के कार्यो की प्रशंसा की चारो तरफ धूम मची हुई थी। जिसे सुनकर दूर व समीप के जिज्ञासु उनके पवित्र दर्शन, सत्संग के उपदेश से लाभान्वित हुआ करते थे। जैसे ही जिज्ञासु उनकी संगति मे आता उनके साथ वैसा ही वार्त्तालाप किया करते थे। उनके पवित्र आचरण, व्यवहार व मस्तक के अलौकिक तेज व आभा को देखकर सत्संग मे आने वाले जिज्ञासुओ के हदयों में सन्त जी के प्रति अत्यधिक श्रद्धा बढती जाती थी।
      एक बार का वृत्तान्त है कि दो जिज्ञासु आश्रम पर आए और उन्होने सन्त जी के दर्शन तथा वार्तालाप करने के लिए समय प्राप्त करना चाहा। उनकी बात को स्वीकार कर सन्त जी ने उन्हें कुछ देर रूक जाने को कहा। तत्पश्चात उनमे से एक जिज्ञासु को अपने निकट बुलाया और पूछा – कहिये! आपका कैसे आना हुआ ?
      तब जिज्ञासु ने सादर विनय की – ‘महाराज! मैने सुना है कि आप प्रभु-प्रेम का मार्ग दर्शाते है। इस भावना से ही मै आपके पास आया हूँ। आप कृपा करके मुझे ईश्वर-प्रेम पाने का साधन बताइये।’ यह सुनकर सन्त जी ने कहा – हाँ! प्रभु-प्रेम का मार्ग तो हम अवश्य जनसाधारण को दिखलाते है और हमारा सबके लिए प्रयास भी यही है कि अधिक से अधिक लोग इस भक्ति-पथ पर अग्रसर हो। लेकिन हम यह मार्ग उसको बतलाते है जो इसका मूल्य चुकाने की सामर्थ्य रखता हो।
      तब जिज्ञासु ने (आश्चर्य) से पूछा – क्या मालिक का प्रेम भी मूल्य देने से प्राप्त होता है ?
      प्रश्न करने पर महात्मा जी ने पुनः फरमाया कि – जब दुनिया की कोई नश्वर वस्तु भी बिना मूल्य के उपलब्ध नही हो सकती तो क्या मालिक का सच्चा प्रेम बिना मूल्य के प्राप्त हो जायेगा ?
      यह सुनकर वह और भी विस्मित हुआ। कुछ देर मौन रहने के पश्चात उसने कहा – महाराज! आप प्रेम का मूल्य बता दे। यदि मेरे पास धन-राशि होगी तो अवश्य ही दूँगा।
      वास्तव मे वह जिज्ञासु मालिक के प्रेम का मूल्य सांसारिक धन ही समझ रहा था। महात्मा जी ने जिज्ञासु के ‘प्रेम’ की कीमत पूछने पर कहा – ‘हमने धनाढ़य व निर्धन दोनों के लिए प्रेम का मूल्य एक समान रखा है परन्तु कोई उस कीमत को अधिक समझ कर प्रेम को छोड़ जाते है और कोई उसको सस्ता समझ कर खरीद लेते है। जैसे बाजार मे कोई दुकानदार कपड़े या बर्तन का मूल्य अपनी तरफ से उचित बताता है किंतु जिस किसी को वह कीमत अधिक प्रतीत होती है तो वह उस वस्तु को नही खरीदता।’

      जिज्ञासु ने पुनः विनय की – ‘आप प्रेम का मूल्य बताने की कृपा करे।’ तब महात्मा जी ने कहा की ‘हमने अपनी प्रेम-भक्ति की दुकान पर ‘प्रेम’ का मूल्य ‘सिर’ रखा हुआ है। जो प्रेम को पाना चाहता है वह बदले मे अपना सिर दे जाये।’

      यह सुनकर वह जिज्ञासु घबड़ाकर पूछने लगा – किसका सिर ?
      तब महात्मा जी ने कहा कि प्रेमी! जो प्रेम लेवे उसी का ही सिर।
      वह सज्जन जो कि अभी इस प्रेम-भक्ति मार्ग के गूढ़ रहस्य को नही जानता था चकित हो गया। वह अपने शारीरिक सिर को ही प्रेम का मूल्य समझ कर घबराया हुआ सा बोला कि – मुझे तो ऐसा व्यापार नही करना। यदि मै अपना सिर ही दे दूँ तो प्रेम लेने वाला ही न रहेगा।
      महात्मा जी ने कहा – ठीक है! प्रेम का मूल्य इससे कम नही हो सकता। इसके लिए आप विचार कर लिजिये।
      यह सुन वह जिज्ञासु वहाँ से उठ खड़ा हुआ। मार्ग मे अपने दिल मे सोचता जाता कि आज तक ऐसा तो कही नही देखा और न ही सुना कि प्रभु-प्रेम के बदले मे किसी ने अपना सिर काट कर दिया हो। मुझे तो महात्मा जी की बात समझ नही आई। सत्य तो यह है कि –
।। दोहा ।।
प्रेम  पियाला  जो पिये, सीस दक्षिणा देय ।
लोभी सीस न दे सके, नाम प्रभु का लेय ।।
      अर्थात् प्रभु-प्रेम के मार्ग मे अपने आपको न्यौछावर करना पड़ता है जो संसारी आदमी के लिए कठिन है लेकिन पूर्ण व सच्चे जिज्ञासुओ के लिए तो यह साधारण सी बात है।  
      तत्पश्चात उसके जाने पर महात्मा जी ने दूसरे प्रेमी को बुलाया। उस प्रेमी ने भीतर आकर अति दीनतापूर्वक चरणों मे सीस झुकाया और भेंट के लिए जो वस्तु लाया था वह समर्पित की। तब महात्मा जी ने पूछा – कैसे आये हो प्रेमी ?
      जिज्ञासु ने विनय कि – प्रभु! मै आपके दिव्य प्रेम की चाह लिये स्वयं ही खिंचा चला आया हूँ। महात्मा जी के पूछने पर की तुम क्या चाहते हो? प्रेमी ने अत्यन्त विनम्र हो दोनों हाथ बाँधकर विनय की – महाराज! आप अपने दिव्य प्रेम से मेरा आँचल भर दो।
      महात्मा जी ने कहा – पता है तुमको! इस प्रेम के बदले मे तो मूल्य चुकाना पड़ता है ? पुनः महात्मा जी ने मुसकराते हुए कहा कि मालिक का प्रेम प्राप्त करने मे तो सिर को समर्पित करना पड़ता है। क्या यह तुम्हे स्वीकार है ? जैसे पतंगा अपने प्राणो की आहुति दे दीप-शिखा पर मर मिटता है, उसी प्रकार इस प्रेम के मार्ग मे भी आत्म-समर्पण करना आवश्यक है।
      यह वचन सुनकर प्रेमी ने विनय कि – प्रभु! आपकी आज्ञा सिर आँखो पर धरता हूँ। क्योकि –

      महाराज! इस नश्वर शरीर के आत्म-समर्पण से यदि मुझे अमृत की खान – सतगुरू का दिव्य अलौकिक प्रेम प्राप्त हो जाये तो यह कितना सस्ता व्यापार है। आप तो एक सिर देने की बात कह रहे है, यदि लाखो सिर भी देने पड़े तो भी सच्चे प्रेम का मूल्याकंन नही किया जा सकता। इतना प्रार्थना कर वह भक्त गुरू-चरणों पर नत-मस्तक हो गया और उसकी आँखो से प्रेम की अश्रुधारा बह चली। सत्य यह है कि –

।। दोहा ।।
प्रेम छिपाया न छिपे, जा घट परगट होय ।
जो मुख पै बोले नही, नैन देत है रोय ।।  
      यही वास्तविक प्रेमी की पहचान है। सुबकते हुए उस प्रेमी को महात्मा जी ने प्यार से उठाया और हार्दिक आशीर्वाद दिया, फिर अपनी बाकीं चितवन डार कर उसे मन्त्रमुग्ध कर दिया। यह यथार्थ सत्य है कि प्रेम मे अपनेपन को खो देना होता है।
      साराशं यह है कि उत्तम संस्कार वाले जीव सन्त-सत्पुरूषो की शरण मे जाकर अपने जीवन को प्रभु-प्रेम के दिव्य-रंग मे रंग लेते है। महापुरूषो के दिल मे तो सब जीवो के प्रति प्रेम की भावना होती है, परन्तु जिज्ञासु की श्रद्धा व भाव जिस प्रकार का सतगुरु से होगा उसी प्रकार का ही उसे सतगुरू का पावन प्रेम उपलब्ध हो सकेगा।                             

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