प्रभु दर्शन

     प्रभु-मिलन के जितने भी साधन है उन साधनो मे सबसे श्रेष्ठ व उच्च स्थान प्रभु प्रेम को ही दिया गया है। यह प्रभु मिलन की सबसे उच्चतम सीढी कही गई है। जिस पर चढ कर भक्ति मार्ग पर चलने वालो को अपने लक्ष्य स्थान तक पहुँचाना होता है। सच्चा प्रेम ही एक ऐसा साधन है जिसमे सब ज्ञान व योग आदि साधन स्वयमेव आ जाते है। वर्षों की कठिन तपस्या से जो सफलता प्राप्त की जा सकती है; उसी लक्ष्य सिद्धि को सच्चा प्रेमी पलक भर मे प्राप्त कर लेता है। जैसे कि इस दृष्टान्त से स्पष्ट है।


vishnu bhagvan

      द्वापर युग की बात है। एक तपस्वी साधु यमुना नदी के तीर पर गोकुल ग्राम ने निकट ही एक रमणीय स्थान देखकर रहने लगे। उस समय भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी का अभी अवतरण न हुआ था। उस तपस्वी ने अपने सतगुरू से यह सुन रखा था कि इसी स्थान पर ही सोलह कला सम्पूर्ण भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी मर्त्यलोक मे प्रेम की विचित्र लीलाएँ करने के लिए अवतरित होगे। तब उस समय तुम उनके दर्शन करना। अपने सतगुरू से इस प्रकार के वचन सुनकर व उनकी प्रेममयी लीलाओ का दिव्यानन्द प्राप्त करने की लालसा से ही उस साधु ने गोकुल ग्राम के समीप ही आश्रम बनाया था। योग साधना और तपस्या करना यही उस का नित्यप्रति का नियम बन गया था। परन्तु इतनी कड़ी साधना करने के उपरान्त भी उसके मन की इच्छा पूर्ण न हुई।
      उसके पश्चात एक बार वे ऐसे समाधिस्थ हुए कि उन्हें बाहरी जगत का कुछ ज्ञान ही न रहा। लम्बी अवधि के पश्चात जब उनकी समाधि खुली और वे अपनी गुफा से बाहर आए तब इधर मर्त्यलोक मे भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी का अवतार हो चुका था तथा समस्त गोकुल ग्राम मे नित्यप्रति नई रास लीलाएँ व प्रेम के कौतुक होते रहते थे। एक दिन कुछ गोपिकाये पानी भरने के लिए तपस्वी बाबा जी की कुटिया के निकट ही आई और परस्पर भगवान की प्रेममयी सुन्दर लीलाओ की चर्चा कर रही थी। उन सरल हदय वाली गोपिकाओ का भगवान के प्रति जो अनन्य प्रेम था वह किसी से छिपा हुआ तो है नही। उस समय साधु ने प्रभु चर्चा सुनी और गोपिकाओ ने प्रणाम किया। फिर पूर्ववत प्रभु प्रेम की चर्चा करने मे तल्लीन हो गई। प्रेममयी बातें सुनकर उन्ही तपस्वी साधु ने गोपियो से पश्न किया – ‘क्या सचमुच ही श्रीकृष्णचन्द्र जी का गोकुल मे अवतार हो चुका है?’
      तब उन्होने बताया – हाँ! हम तो उनके प्रतिदिन ही साक्षात दर्शन पाती है तथा अनेक प्रकार की प्रेम लीलाये उनसे करने का सौभाग्य हमें प्राप्त है। पुनः आश्चर्य मुद्रा से पूछने लगी – क्या आपको उनके भूमण्डल पर अवतार लेने का भी पता नही ? आप कोनसी दूनिया मे रहते हो ? उनकी तो समस्त ब्रजभुमि मे घूम मची हुई है।
      तब उस तपस्वी बाबा ने कहा ‘मै तो चिरकाल से इस कन्दरा मे तपस्या कर रहा हूँ। हसलिए उनके विषय मे कुछ न जान सका।’
      गोपियाँ फिर कहने लगी – बाबा! यह तपस्या तुम किस लिए कर रहे हो ? हमारे भगवान तो प्रेमावतार है। उनके चरणो मे मन लगाओ और प्रेम का आनन्द प्राप्त करो।
      बाबा जी ने ठण्डी साँस भरकर कहा कि ‘हे गोपिकाओ! मेरे इतने सौभाग्य कहाँ! फिर भी मै उन्ही के दर्शन व सुन्दर लीलाएँ देखने के लिए बहुत आतुर हुँ। तपस्या भी इसी उददेश्य से कर रहा हुँ।  अच्छा  ! आप मेरा एक कार्य कर देवे तो मै आपका आजीवन कृतज्ञ बना रहूगा।’
       गोपियो ने पूछा, ‘वह क्या कार्य है आपका ?’
      तपस्वी महाराज बोले, ‘मुझे भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी के श्री दर्शन पाने की तीव्र अभिलाषा है। अतः जब तुम उनके दर्शन करने जाओगी तो मेरी ओर से युगल कर बाँधकर यह विनय करना कि अमुक स्थान पर एक बाबा आपके दर्शन पाने की लालसा में कई वर्षों से तपस्या कर रहा है। उसे कब आपके श्री दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा?’
      गोपियो ने बाबा जी को यह सन्देश श्री भगवान के चरणो मे पहुँचा देने का वचन दिया। तब वे तपस्वी पुनः बोले – वहाँ से जो उत्तर मिले वह भी मुझे शीघ्र आकर सुनाना।
      गोपियो ने वापसी उत्तर देने का भी वचन दिया और अपने अपने कलश उठा कर अपने घरो की ओर चलती बनी।
      सायंकाल की रास लीला के समय श्री भगवान के चरणो मे उस साधु के विषय मे गोपियो ने विनय की तथा उनका दिया सन्देश भी कह सुनाया। उत्तर मे श्री भगवान तनिक रूखाई से मुस्कराते हुए बोले, ‘हूँ, उसे कह दो कि कुछ समय अभी और तपस्या करे तब हमारे दर्शन होगे।’
      दूसरे दिन गोपिकाये तपस्वी के आश्रम पर गई और श्री भगवान जी द्वारा दिया हुआ उत्तर उन्होंने अक्षरशः कह सुनाया। तपस्वी ने जब गोपियो के मुँह से श्री भगवान जी के वचन सुने तो सुनते ही उसके संचित शुभ संस्कार जागृत हो उठे। वह प्रेमोन्मत्त हो प्रेमाश्रु बहाता हुआ हर्ष से नाचने लगा और उसी तन्मयता (मस्ती) मे यह गुनगुनाने लगा –
      ‘अहा ! मेरे भगवान कितने दयालु है कि उन्होने मेरी विनय स्वीकृत कर मुझ दास को दर्शन देना स्वीकार कर लिया है – चाहे कितना दीर्घकाल व्यतीत हो जाये। उन्होने मुझ अधम व पापी जीव को अपना दास तो समझ ही लिया। अहा ! कितने दयालु है मेरे प्रभु ! अहा !! तपस्वी महाराज इतने से ही असीम उल्लास का पान करने लगे और मस्ती मे उछल कूद कर भगवान की महिमा एवं गुणानुवाद गाने मे पूर्ण रूप से लीन हो गए।’
      तपस्वी बाबा की ऐसी प्रेमोन्मत्त दशा देखकर वे गोप बालाएँ चकित हो दाँतो तले अंगुली दबाने लगी। सहसा इतने मे क्या देखती है कि स्वयं भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी नगे पाँव दौड़ते हुए उसी दिशा मे चले आ रहे है। यहां तक कि उन्हें पीताम्बर की भी सुधि न रही। वे भागते हुए आश्रम पर आ पहुँचे और तपस्वी महाराज का कुछ समय तक नृत्य देखते रहे। तपस्वी तो अपनी सुधि खोये हुए था। इसलिए उसे भगवान के आगमन का कुछ भी भान न हुआ। वह पूर्ववत उसी भाँति ही नाचता, कूदता और गाता रहा। तब कुछ देर पश्चात भगवान ने आगे बढकर साधु बाबा को अपनी बाहो में भर लिया और बार-बार गले से लगाने लगे। श्री भगवान का मधुर स्पर्श पाते ही साधु महाराज अपनी वास्तविक अवस्था मे आ गये ओर अपने सम्मुख श्री भगवान को ही देखकर उनके पद-पंकजो मे जा गिरे और प्रेमाश्रुओ से लगे उन्हें सिंचित करने।
      गोपिकाये अब भी आश्चर्य चकित हो इस अदभुत दृश्य का आनन्द ले रही थी। प्रेमी-प्रियतम के मिलन के पश्चात गोपिकाओ ने प्रेम भरा उपालम्भ (उलाहना) देते हुए भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी से कहा, ‘क्यो जी ! आप तो बहुत असत्यवादी हो। हम से तो यह कहा कि इस तपस्वी को अत्यधिक तपस्या करने के पश्चात दर्शन होगे परन्तु आप तो अभी हमारे यहां होते ही पहुँच गये, यह क्या कारण है? हमे भी झूठा सिद्ध किया और स्वयं भी मिथ्याभाषी कहलाये।’
      भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी उनकी प्रेम भरी बाते सुनकर मुसकरा दिये और बोले – फिर क्या करता? विवश होकर प्रेम पाश के बन्धन मे बँधे होने के कारण ही मुझे शीघ्र ही यहाँ आना पड़ा। कारण, जब कोई मुझे प्रेम जंजीर से बाँध कर खींचता है तब मुझसे भी नही रहा जाता।
      गोपिकाओं ने पूछा – महाराज ! यदि आपने शीघ्र आना ही था तो हमे इनकी कड़ी साधना करने के विषय मे बात क्यो कही थी?
      श्री भगवान ने प्रत्युत्तर मे कहा – ‘वह भी मैने सत्य ही कहा था क्योंकि साधु बाबा जी जिस विधि से तपस्या कर रहे थे उसमे इतना समय लगना अनिवार्य ही था परन्तु अब जब कि तुमने इनको मेरा सन्देश सुनाया तो इनके पूर्व जन्मो के शुभ संस्कार जागृत हो उठे और ये एकदम ही च्यूँटी की चाल छोड़कर विहंगम गति पर आ गये। एकाएक इनके हदय सागर में प्रेम की लहरे उछालियाँ भरने लगी। अपने तन मन की सुधि को भुला कर प्रेम विभोर हो गये। तन्मयता की जिस दुर्लभ अवस्था मे पहुँचने की इन्हे कई वर्षों तक साधना की आवश्यकता थी, उसी मंजिल को सच्चे प्रेम के द्वारा इन्होने निमिषमात्र मे (क्षण भर मे) प्राप्त कर लिया है। वैसे तुम जानती ही हो कि सच्चे प्रेम और तड़प में कैसी शक्ति निहित है। तुमने भी तो मुझे प्रेम मन्त्र द्वारा अपने वशीभूत कर लिया है। केवल मात्र सच्चा और निर्मल प्रेम ही मुझे अपने अधीन कर सकता है। मुझे पाने की जो दुर्गम मंजिल है वह साधना करने के द्वारा कई जन्मो मे पूर्ण हो सकती है, उसी मंजिल को मेरा सच्चा व अनन्य प्रेमी प्रेम व सच्ची तड़प द्वारा पलक झपकते ही प्राप्त कर लेता है।’
      भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी के ये अनमोल वचन सुन कर गोपिकाओ का संशय जाता रहा और वे भगवान के प्रेम मे डूबी हुई भगवान व उनके भक्त के अलौकिक प्रेम की चर्चा करती हुई अपने अपने घरो की ओर लौट गई।
       तात्पर्य यह है कि भगवान का साक्षात्कार करने के लिए जिज्ञासु को आत्म-विस्मृति पैदा करने की परम आवश्यकता है। अनन्य प्रेम व सच्ची लगन का भाव होना ही चाहिये। प्रियतम से मिलने की तीव्र उत्कण्ठा जब जाग उठती है तब स्वयं ही प्रभु अपने प्रेमी को दर्शन दे देते है। वे जीव अति सौभाग्यशाली है – जिनके दिलो मे अपने इष्टदेव सदगुरू के प्रति सच्चा प्रेम चरम सीमा मे है – उनका जीवन ही संसार मे धन्य एवं प्रशस्त है।

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