पाप का मूल कारण लोभ


      सत्पुरूषो ने पाप का मूल लोभ को ही बताया है । लोभ के आधीन होकर बड़े बड़े विद्वान ज्ञानहीन हो जाते है । मनुष्य यह नही सोचता की जिस लोभ मे फँसकर वह अपने पतन के कार्य करता है क्या मरते समय यह धन उसके साथ जायेगा ? कदापि नही । माया के सामान धन दौलत अन्त मे बिछुड़ जाने वाले है तो फिर धन के लोभ मे पड़कर पाप कर्म करने से मनुष्य को क्या लाभ ? लोभ ऐसा प्रचण्ड शत्रु है कि जिसके हदय मे प्रवेश कर जाए तो फिर उस प्राणी की बुद्धि मलिन हो जाती है । जिससे वह हित-अनहित के परिणाम को उचित रूप से नही सोच सकता और अज्ञानता के गहरे गर्त मे जा गिरता है ।
      निम्नलिखित दृष्टान्त मे यह दर्शाया गया है कि एक पण्डित किस प्रकार लोभ के अधीन होकर तुच्छ कर्म करने को तत्पर हो गया, वह दृष्टान्त इस प्रकार है –
      एक समय की बात है कि कोई एक पण्डित काशी विश्व विद्यालय से वेद-वेदांगो कि विद्या प्राप्त करके बारह वर्ष उपरान्त अपने नगर में पहुँचा । एक दिन मार्ग मे एक अनपढ़ व्यक्ति से इसकी भेंट हुई । उसने कहा – पण्डित जी ! आप बड़े विद्वान मालूम होते है । मेरे एक प्रश्न का उत्तर तो दिजिये कि पाप का मूल कारण अर्थात् ???? पाप का गुरू कौन है ?
      उसके यह प्रश्न करने पर पंडित जी विचार करने लगे कि ‘पाप’ को तो मै जानता हूँ लेकिन पाप के उदगम स्थान को मै नही जानता । दिल मे लज्जित हुए की विद्याध्ययन के उपरान्त एक अशिक्षित व्यक्ति के द्वारा किये गए इस पहले ही प्रश्न का उत्तर मुझसे न बन पाया । कुछ देर सोचने के पश्चात उससे कहा कि तुम मेरे साथ घर चलो, मै तुम्हे सोचकर उत्तर दूँगा । घर आकर पंडित जी सब ग्रन्थों को खोल कर बैठ गये और लगे उस प्रश्न का उत्तर खोजने । अत्यन्त परिश्रम करने के बाद भी उन्हे सफलता न मिली जिससे वे उदासीन हो गये तथा वह व्यक्ति भी वहां से निराश होकर चला गया । उसी समय से पंडित जी इस प्रश्न के उत्तर पाने की खोज मे चिन्तातुर रहने लगे । 
      एक दिन पंडित जी अपने गाँव से किसी दूसरे गाँव मे गये । चूंकि इनके हदय मे पाप के मूल की समस्या कि खोज का विचार रहता था जिससे वे सदा निराश व उदासीन से बने रहते थे । उस गाँव मे मार्ग चलते-चलते इनकी एक हरिजन से भेटं हुई । यह हरिजन सत्संगी विचारों का था । सत्संगी सज्जन होने के साथ साथ वह धनाढ्य भी था ।
      दोनों की परस्पर भेंट होने पर वार्त्तालाप के मध्यान्तर उसने पण्डित जी से पूछा – महाराज ! आप उदास क्यो है ? 
      पहले तो पण्डित जी इधर उधर टालते रहे परन्तु हरिजन ने जब पुनः आग्रह किया – ‘कदाचित् मै आपकी कुछ सहायता कर सकूँ … यदि आपको कुछ बताने मे कुछ आपत्ति (एतराज) न हो तो मुझे बता दिजिये ।’
      हरिजन के एक-दो बार पूछने पर पंडित जी ने अपना प्रश्न और उत्तर पाने की समस्या उसे बताई । तब हरिजन बोला – पंडित जी ! इसका उत्तर तो बहुत ही सरल है लेकिन कुछ दिन आपको मेरे यहाँ ठहरना होगा । मै आपके रहने के लिए अलग मकान की व्यवस्था कर दूँगा । जिसमे गंगाजल छिड़कवाकर उसे पवित्र कर दूँगा । विश्राम के लिए स्वच्छ आसन और भोजन के लिए सीदा वगैरह भी आपको पहुँचा दिया जायेगा ।
      पण्डित जी को अपने प्रश्न का उत्तर पाने के लिए तीव्र लालसा थी । अतः उन्होने हरिजन के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और उसके साथ चल दिये । हरिजन ने पण्डित जी के लिए सब सुख सुविधाये जुटा ली । पंडित जी वही रहने लगे और अपने हाथ से ही भोजनादि बनाने लगे । हरिजन दोनो समय पण्डित जी के पास आता और कहता – महाराज ! आपको यहाँ भोजन बनाने मे कष्ट प्रतीत होता होगा । यदि आप स्वीकार करे तो मै पवित्र होकर आपके लिए भोजन बना दिया करूँ ।
      यह सुन पण्डित जी ने कहा – न भाई ! तुम्हारे द्वारा बनाया गया भोजन ग्रहण करने से मेरा धर्म भ्रष्ट होता है । मै ऐसा न करूँगा । 
      इस प्रकार नित्यप्रति दो तीन दिन हरिजन पण्डित जी के पास आता और उनसे कहता कि मेरी यह इच्छा है कि मै आपको भोजन बनाकर दिया करूँ । परन्तु पंडित जी ने उसकी इस बात को तब तक स्वीकार न किया जब तक कि हरिजन ने उनके सामने धन देने का प्रस्ताव नही रखा । अब तक तो वे अपने विप्र धर्म को समक्ष रख कर स्वयं ही भोजन बनाते रहे लेकिन जैसे ही हरिजन ने इनके आगे पाँच मोहरे प्रतिदिन भेंट करने को कहा तब पंडित जी किस प्रकार लोभ के पंजे में फँसकर अपने ब्राह्मणोचित्त धर्म से पतित होते है – अब पाठकगण उस वर्त्ता को भी ज्ञात कर लेवे । 
      चार-पाँच दिन के उपरान्त हरिजन ने बड़ी नम्रता के साथ पंडित से कहा – महाराज ! चार पाँच दिन से मै देख रहा हूँ कि आपको भोजन बनाने मे अत्यधिक कष्ट होता है, अपने अतिथि का यह कष्ट मेरे लिए असहनीय है । यदि आप स्वीकार करे तो मै गंगा जल से स्नान कर पवित्र हो धुले हुए वस्त्र पहन कर तथा चौका लीप कर आपके लिए भोजन बना दिया करूँ तथा पाँच मोहरे भी भेंट मे दिया करूँगा ।
      हरिजन की यह बात सुनकर पंडित जी विचारो की उधेड़-बुन मे लग गए । मन मे कहा – ‘भोजन बनाने मे तो सचमुच मे बहुत कष्ट होता है । दूसरा इस कष्ट की निवृत्ति का अब अच्छा अवसर भी हाथ लग रहा है । साथ ही हरिजन यह भी वचन ले रहा है कि गंगा जल से स्नान कर, स्वच्छ वस्त्र धारण करके भोजन बनाऊँगा, ऊपर से पाँच मोहरे भी भेंट रूप मे प्राप्त होगी । इसके अतिरिक्त मुख्य बात यह भी है कि यहां पर अपने गांव वाले अथवा जान पहचान वाले भी तो नही है जोकि बुरा भला कहेगे । ऐसी अवस्था मे जबकि सब और से सुविधाएँ उपलब्ध है, हरिजन से कार्य करवा लेने में क्या दोष है ?’ बस, लोभ ने पण्डित जी को आ दबोचा । मन की सम्मति से पंडित जी ने प्रत्यक्ष मे हरिजन को भोजन बनाने के लिए स्वीकृति दे दी ।

      हरिजन ने भोजन बनाया – परोस कर पंडित जी के सामने रखा । अभी पंडित जी ने थाली की और हाथ बढ़ाया ही था कि हरिजन ने थाली खींच ली और बोला – मुझे आपका धर्म भ्रष्ट करने की कोई आवश्यकता नही । मै तो केवल इस उपाय से आपके प्रश्न का उत्तर देना चाहता था, सो वह आपको मिल गया ।

      एक तो थाली के खींचे जाने से दूसरा हरिजन की बात ने (आपको प्रश्न का उत्तर मिल गया है) पंडित जी को आश्चर्य मे डाल दिया, उन्होने पूछा – मेरे प्रश्न का उत्तर मिल गया ?
      तब वह कहने लगा – महाराज ! आपने जिस बात से ब्रह्मणोचित कर्म करने का परित्याग कर मेरे हाथों का बना भोजन स्वीकार किया है । वह है केवल नित्यप्रति मोहरो के मिलने का ही लालच । यही प्रत्यक्ष लोभ का स्वरूप है और इसी लोभ से ही पाप की उत्पत्ति होती है ।
      पाण्डित जी हरिजन की बुद्धिमत्ता को आश्चर्यचकित हो गए तथा अपनी इस कृति पर लज्जित हो अपना सा मुँह लिए प्रश्नोत्तर पाकर अपने गाँव लौट आये ।
      अभिप्रायः यह है कि धन का लोभ ही ऐसा भयानक है जो कि जीव को मानवता के पथ से भटका कर नीच से नीच कर्म करने पर बाध्य कर देता है । लोभ लालच जीव को विचार शून्य कर जगह जगह भटकाता है । यहाँ तक की मनुष्य लोभाधीन हो इतना अन्धा अर्थात् ज्ञानहीन हो जाता है कि उसे अपने अच्छे-बुरे, मान-अपमान, कर्म-धर्म का भी विचार तक नही रहता । जैसे निम्नलिखित पंक्तियो से स्पष्ट होता है –

ज्ञानी तापस शूर कवि कोविद गुण आगार ।
केहि कै लोभ विडंबना, कीन्ह न इहि संसार ।। 

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