पाद पद्माचार्य की गुरू-सेवा

      संसार मे केवल पुस्तको के पढ़ लेने से आज तक किसी को आत्मिक देह न प्राप्त हुई है न होगी। जो जिज्ञासु आत्मिक ज्ञान प्राप्त करने की लालसा रखता है तो वह केवल समय के पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ सन्त-सदगुरू की अनुकम्पा का पात्र बनकर आध्यात्मिक विद्या का ज्ञान प्राप्त करना ही अति दुष्कर है। महापुरूषो की शरण ग्रहण कर एक-दो नही अपितु अनेको जिज्ञासु रूहानियत के प्रकाशमय पथ पर चलने लगते है। जिस प्रकार एक प्रज्वलित दीपक से अनेको दीपक ज्योति प्राप्त कर जाते है। इसी प्रकार सन्त-सत्पुरुष जोकि भक्ति के देदीप्यमान् दिवाकर सदृश संसार मे अवतरित होते है, उनकी दिव्य ज्योति से अनेंकों जिज्ञासु अपना तन-मन-धन समर्पित कर अनन्य भाव से सतगुरू की सेवा करते हुए रूहानियत के गूढ़ रहस्यो को जानने के अधिकारी बन जाते है।
      निम्नलिखित दृष्टान्त मे ऐसे ही एक श्रद्धालु एवं सदगुरू की प्राणपन से सेवा करने वाले सच्चे सेवक का वर्णन दिया जा रहा है –
      इस सेवक का नाम इतिहास मे ‘पाद पद्माचार्य’ नाम प्रसिद्ध है। यह संस्कृत का प्रकाण्ड पण्डित हुआ है तथा स्वामी शंकराचार्य जी का विशेष और प्रिय शिष्य था। जो स्थान श्री कबीर साहिब जी के शिष्यो मे धर्मदास को प्राप्त था अथवा जो स्थान महात्मा गौतम बुद्ध जी के शिष्यो मे ‘आनन्द’ को प्राप्त था, वही श्रेणी पद्माचार्य जी को स्वामी शंकराचार्य जी के सेवकों मे प्राप्त थी।
      पाद पद्माचार्य जी ‘विमल’ नामक ब्राह्मण के पुत्र थे। इनका निवास स्थान ‘कावेरी’ नदी के तट पर ‘चूला’ नामक नगर मे था। बाल्याकाल मे ही इन्होने अपनी विलक्षण प्रतिभा द्वारा वेद-शास्रो का ज्ञान तो प्राप्त कर लिया परन्तु आत्मा को फिर भी शान्ति प्राप्त न हुई। आत्मिक शान्ति प्राप्त करने के लिए कई वर्षों तक इन्होने नगर एवं निर्जन स्थान आदि छान डाले लेकिन इनको कही से भी वह वस्तु प्राप्त न हुई। इतने पर भी आशावादी होने के कारण इन्होने हिम्मत न हारी और निरन्तर खोज जारी रखी। इस द्विज कुमार को आदि से प्रेम-भक्ति की तीव्र लगन थी। इस कारण वे उसे शीघ्र पाने हेतु व्याकुल होकर उसकी खोज कर रहे थे।
      आखिर प्रत्येक वस्तु की कोई न कोई सीमा तो होती ही है। जब इनके हदय की तीव्र व्याकुलता से सीमातिक्रमण कर लिया तो परमात्मा की तरफ से उसकी पूर्ति का साधन भी आ उपस्थित हुआ। वैसे यह भी प्रसिद्ध ही है कि ‘जोइन्दा-याबिन्दा’ अर्थात् जो खोजता है वह पा लेता है।
      सो एक बार ये घूमते-घूमते कही जा रहे थे। वही मार्ग मे इनको स्वामी शंकराचार्य जी के दर्शन हुए। उनके आलौकिक तेज को देखकर इनका वर्षों से व्याकुल एवं संतृप्त हदय तत्क्षण शान्त हो गया तथा इन्हे विश्वास भी हो आया कि ये पूर्ण पुरुष है। इन्ही से ही मुझे शान्ति की प्राप्ति होगी। यह विचार कर पद्माचार्य जी ने दोनों हाथ जोड़कर उनके समक्ष सादर विनय कि – ‘स्वामिन्! मै संसार सागर की लहरों मे झकोले खा रहा हूँ। बहुत समय से वास्तविक शान्ति की निरन्तर खोज करते रहने पर भी वह मुझे प्राप्त न हो सकी परन्तु आ तो मेरे परम सौभाग्य जागृत हो उठे जो आप जैसे महापुरूषो को जो कि इस संसार सागर मे मेरे जीवन-पोत के कर्णधार है, मैने पा लिया है। अतएव आप मेरे गुण-अवगुणो की और दृष्टिपात न करते हुए मुझ पर अनुकम्पा किजिये। हे दयानिधान! अब शीघ्र ही मेरी जलती हुई आत्मा को आत्मिक शान्ति प्रदान कर प्रशान्त किजिये।’

      स्वामी शंकराचार्य जी उसे उत्तम संस्कारी रूह जानकर व इसकी भक्ति व प्रेम मिश्रित विनय सुनकर हदय मे अति प्रसन्न हुए। इसकी विनय को स्वीकार कर उसे अपना शिष्य बना लिया तथा इसका नाम ‘सनन्दन’ रखा। सनन्दन जी के मन मे अपने सतगुरू के प्रति अत्यन्त प्रेम व अगाध श्रद्धा थी। उनकी पावन सेवा से ये पूर्ण श्रद्धा व विश्वास से करते थे कि देखने वाले चकित रह जाते। वैराग्य तो इनमे चरम-सीमा को भी लाँघ चुका था। अपनी समस्त इच्छाओ का दमन कर इष्टदेव के चरणो मे स्वयं को इस प्रकार न्यौछावर कर दिया था जिस प्रकार शमा को देखते ही परवाना उसकी लौ (ज्वाला) पर मर मिटने को अपने जीवन की परवाह न करते हुए उस पर बलिदान हो जाता है। उसी तरह सनन्दन जी भी सदैव अपने सदगुरू की आज्ञा व मौज पर स्वयं की परवाह न करते हुए आज्ञा पालन मे तत्पर रहे। इन्हें तो केवल हर समय यही धुन सवार रहती थी कि मुझसे आज्ञा व वचन मानने मे कोई त्रुटि न रह जाये। वे तो सच्चे आशिक थे। जैसे कहा भी है –
      यह स्थिति सनन्दन जी की भी हो गई थी। जब भी सतगुरूदेव जी इन्हे बुलाते उस समय यह जिस भी अवस्था अथवा स्थिति मे होते हाथ बाँधे उनके चरणों मे आ उपस्थित होते। असावधानी व प्रमाद तो इनसे कोसो दूर थे। स्वामी शंकराचार्य जी इनसे हार्दिक प्यार करने लगे क्योकि इनकी शुद्ध भावनाएँ सब सेवको मे से उत्तम व श्रेष्ठ थी।
      सन्त-महापुरुष अपने सेवको की भक्ति को सुदृढ़ करने के लिए आदि काल से उन्हे परीक्षा की कसोटी पर परखते आये है। जिस प्राकार सुनार स्वर्ण की परीक्षा आँच व चोट द्वारा करता है। जो स्वर्ण इन दोनो प्रहारों को सहन कर लेता है वही कसौटी पर खरा (शुद्ध) उतरता है और आभूषण बनाने के योग्य होता है। इसी प्रकार सन्त सदगुरू भी अपने श्रद्धालु शिष्यो को अपनी श्री आज्ञा व मौज रूपी कसौटी पर चढ़ा कर उनकी भक्ति की परिक्षा कर उन्हे और भी उच्च भक्ति प्रदान करते है। इस सिद्धान्तानुसार शंकराचार्य जी की सनन्दन सेवक की उत्कट सेवा व विमल भक्ति देखकर उसकी भक्ति-परीक्षा लेने की मौज उठी।
      एक बार शंकराचार्य जी के निकटवर्ती क्षेत्रो मे भक्ति व रूहानियत का प्रचार कर रहे थे। उस समय अनेको शिष्यो के साथ सनन्दन जी भी गुरुदेव के साथ ही थे। एक दिन की वार्त्ता है कि स्वामी शंकराचार्य जी गंगा नदी के दूसरे किनारे पर खड़े थे और सेवक गण इस पार ठहरे थे। गंगा जी को लहरें तीव्र वेग से उछालियां भर रही थी। पानी सपाटे से भागा जा रहा था। इतने मे शंकराचार्य जी ने सेवकों को आवाज लगाई कि ‘धोती दे जाओ।’ इधर गंगा जी के प्रबल वेग को देखकर सभी सेवको के दिल बैठ गये। किसी का भी साहस न बँध रहा था कि सुसरिता के अथाह वेग को पार कर कैसे गुरूदेव के निकट पहुँचे? धोती पहुँचाने के लिए कौन अपने प्राणों पर खेले ? इस प्रकार सभी एक दूसरे का मुंह ताकने लगे।
      इतने मे ही सनन्दन जी ने गुरूदेव की धोती को अपने सर पर बाँध लिया तथा उच्च स्वर मे अपने गुरूदेव के चरणों में विनय कि की ‘जी महाराज! अभी लाया!’ कह कर दिल मे विचारने लगा कि जिन पूर्ण गुरुदेव की शिक्षा ने जीव को भवसागर से पार करना है। क्या उनकी आज्ञा से मै गंगा पार नही जा सकता ? अवश्य जा सकता हूँ। यह सोचकर भक्ति पथ के उस वीर ने अदम्य साहस एवं विश्वास का आदर्श स्थापित करते हुए गंगा की लहरो मे छलाँग लगा दी।
      कथाकारो का कहना है कि इनके इस दृढ़ विश्वास के प्रताप से गंगा जी ने सनन्दन जी के पाँव के नीचे थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कमल पुष्प पैदा कर दिये जिनपर पांव रखते हुए वे सुगमता से शीघ्र ही नदी के उस पार जा पहुँचे।
      सनन्दन जी ने आकर गुरूदेव जी को धोती अर्पण कर चरणों मे सिर झुका दिया। स्वामी शंकराचार्य जी ने अपने सच्चे सेवक के सिर पर करूणा भरा हाथ फेरा।
      उसी दिन शंकराचार्य जी ने प्रसन्न होकर इनका शुभ नाम ‘पाद पद्माचार्य’ रखा। कमल के पत्तो पर चलकर इन्होनें गंगा नदी पार की थी इसलिए इनका नाम पाद पद्माचार्य रखा गया। इसके पश्चात इन्होंने अत्यधिक संख्या मे पुस्तकों की रचना की और उन्हें गुरु चरणों मे समर्पित भी किया। स्वामी शंकराचार्य जी इनकी भक्ति से इतने प्रसन्न थे कि इनको अपना दाहिना हाथ भी कहा करते थे। शंकराचार्य जी के बाद भी पद्माचार्य जी ने आयुपर्यन्त गुरूदेव के वचनों का पालन करने मे कोई त्रुटि न आने दी तथा अपने पीछे समूचे जगत् मे भक्ति के आदर्शमय जीवन का सुरम्य आदर्श सदैव के लिए स्थापित कर गये।                                  

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