परोपकारी सन्त

।। दोहा ।।
साध मिले दुःख सब गये, मंगल भये शरीर ।
वचन सुनत ही मिट गई, जन्म मरण की पीर ।।
पलटू तीर्थ हो गया, आगे मिल गये सन्त ।
एक मुक्ति की खोज थी, मिल गई मुक्ति अनन्त ।।

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        सन्त-महात्माओ का संसार मे आने का प्रयोजन परमार्थ व परोपकार के लिए हुआ करता है। वे जीवो को मोह-माया की दलदल से निकाल कर भक्ति व प्रेम का अमृत पिलाते है। सांसारिक जीवों की दुखित अवस्था देखकर उन्हे करूणा हो आती हैं। वह दिन-रात मोह के कार्य-व्यवहार मे इस प्रकार बंधता जाता है जैसे रेशम का कीड़ा। रेशम के कीड़े शहतूत के वृक्ष पर पलते है और उनके पेट से रेशम निकल निकलकर उनके शरीर पर लिपटता जाता है तब वो वृक्ष के नीचे गिरकर मर जाते है। इस प्रकार से प्रतिदिन सैकड़ो कीड़े शहतूत के वृक्ष के नीचे मरे पड़े मिलते है। रेशम के व्यापारी उन कीड़ो को चुन कर घर लाते है। ऊपर से रेशम के धागे उतार कर मरे हुए कीड़ो को फैंक देते है। इस प्रकार यह रोशम ही उनकी मृत्यु का कारण बना। ठीक इसी तरह से मोह-ममता के बन्धन जो इस मनुष्य की अपनी ही उत्पत्ति है। फिर स्वयं ही इसमे उलक्ष कर दुःखी व परेशान होता है।

      यह मोह ही सब दुःख का घर है और इस मोह का जाल दिन-प्रतिदिन जितना लम्बा होता जाता है। मनुष्य उतना ही ज्यादा उसमे आसक्त होता जाता है। कुटुम्ब-परिवार व रिश्ते-नातों का मोह, मकान व धन का मोह आदि सब का मोह दुखदायी है। मनुष्य की इस दुःखी अवस्था को देखकर सन्त सत्पुरूष इस मोह बन्धन से उसे मुक्त कराने की कोशिश करते है। इसी विषय पर नीचे एक दृष्टान्त दिया जा रहा है –
      किसी नगर मे एक सेठ रहता था। जिसके दो लड़के थे। उसका व्यापारिक क्षेत्र दिन-प्रतिदिन विस्तृत हुआ जा रहा था। कितने बड़े-बड़े नगरो मे सेठ की दुकानें थी। कहीं से लाभ की सूचना आ रही है तो कहीं से हानि का तार। पत्र-व्यवहार, लेन-देन का इतना अधिक काम बढ़ा हुआ था कि सेठ जी व उनके लड़कों, मुनीमो व नौकरों-चाकरो को सारा-सारा दिन अवकाश ही न मिल पाता था।
      एक दिन एक महात्मा जी विचरते हुए इसी सेठ की दुकान पर आ पहुँचे। देखा की सेठ जी अपने काम मे व्यस्त हुआ बैठा है। महात्मा जी वहाँ कुछ देर रूककर सेठ जी की तल्लीनता को देखते रहे और फिर उसके निकट जाकर बैठ गये, लेकिन सेठ जी तो अपने कार्य-व्यवहार मे इस सीमा तक ध्यान दे बैठा था कि उसको महात्मा जी के दुकान पर आने और पुनः अपने निकट बैठने तक का भी कुछ आभास न हुआ। आखिर थोड़ी देर पश्चात महात्मा जी ने सेठ जी को आवाज देते हुए कहा – ‘सेठ जी! राम राम।’
      इतने पर भी सेठ जी ने महात्मा जी की बात पर कान न दिये। तब महात्मा जी ने दोबारा ‘राम राम’ शब्द उच्चारण किये, परन्तु सेठ जी की व्यापारिक विचार-श्रृखला तनिक भी झंकृत न होने पाई, प्रत्युतर वह अपने विचारों मे पूर्ववत् खोये-खोये से बैठे रहे। अन्ततः तीसरी बार महात्मा जी ने सेठ जी का कन्धा बलपूर्वक झकझोरते हुए कहा – सेठ जी! आप तो अपनी सम्मूर्ण चित्तवृत्तियों को एकाग्र कर माया के धन्धो मे इस तरह उलझे हुए हो जैसे मरने के बाद आपने साथ ले जाने हो। सेठ जी! बताइये, क्या आपको मौत भी याद है या नही।
      यह सुन सेठ जी ने गुस्से से कहा – अभी मुझे अवकाश नही। जब मौत आयेगी तब देखा जायेगा। आप नाहक हमारा समय नष्ट करने का प्रत्यन मत किजिये। यह रूखा सा उत्तर पाकर महात्मा जी तो चले गये। तदुपरान्त सेठ जी ने अपने मुनीम व नौकरो से कहा – इनकी बातें सुनो ….. हमे तो अपने काम से अवकाश न होने के कारण खाना खाने का भी समय नही मिलता। ऊपर से ये लोग हमे और परेशान करने आ जाते है।
      यह सेठ जी प्रतिदिन समीपवर्ती दरिया पर स्नान करने जाया करते थे। नियमानुसार अगले दिन स्नानादि के लिए सेठ जी नदी पर गए।
      नोट – महात्मा जी चूँकि इच्छाधारी थे जो रूप बनाना चाहे तत्क्षण अपना वही रूप बना लेते थे।
      ठीक उसी समय जब सेठ जी दरिया के तट पर पहुँचे ही थे कि महात्मा जी ने मात्र सेठ जी के कल्याणार्थ सेठ जी का रूप बनाकर उनके जैसे ही वस्त्र शरीर पर धारण कर लिये और शीघ्रतातिशीघ्र डग भरते हुए सेठ जी के घर आ गये।
      सेठ जी को दरिया से जल्दी लौट आया देख लड़कों व ग्रहवासियो ने पूछा – “आज आप नहा कर जल्दी कैसे वापस आ गये ?”
      तब महात्मा जी (क्रत्रिम सेठ) ने कहा – हाँ आज मै जिस समय दरिया पर जा रहा था तो वहाँ पर मैने क्या देखा कि एक बहुरूपिया मेरी ही शक्ल का-सा वहाँ बैठा था। मैने उसे जैसे ही देखा तो उलटे पाँव घर की और भाग निकला। इतना कहते हुए बनावटी सेठ (महात्मा जी) गद्दी पर बैठकर काम-काज की बहियो के कागज उलटने पलटने लगे और लगे डाक की देखभाल करने।
      इतने मे यह असली सेठ भी आ गया और दुकान मे प्रवेश पाने लगा तभी महात्मा जी ने जिन्होने की सेठ का वेश धारण किया हुआ था शोर मचाना शुरू कर दिया ‘इसे मारो-मारो, भगाओ, भगाओ! यही बहुरूपिया है जिसके विषय मै मैने तुम्हे पहले ही बता दिया है।’
      यह सुन सेठ के लड़के व नौकर आदि इसको मारने व दुकान से बाहर करने लगे। वास्तविक सेठ ने लड़को से कहा – ‘मै तुम्हारा बाप हूँ।’ इस पर लड़को ने रोषपूर्वक कहा – ‘तू हमारा बाप कहाँ है? हमारे पिता जी तो दुकान के अन्दर बैठे है। तू तो बहुरूपिया है …. निकल जा यहाँ से।
      असली सेठ ने लड़कों से कहा – मैने तुमको पढ़ाया- लिखाया और तुम्हे इस कार्य व्यापार की प्रणाली मे पारंगत किया, फिर तुम्हारे विवाह किये और तुम हो की उन सब बातों का बदला मुझे इस रूप मे दे रहे हो कि बुढ़ापे मे मेरे अपने ही बनाए घर मे अब मेरा रहने मात्र तक का भी अधिकार नही रहा। 
      तब लड़कों ने गुस्से से गजरते हुए कहा – “होश संभाल कर बात करो। तुम्हारे साथ हमारा क्या प्रयोजन और कौनसी परिजनिता (रिश्तेदारी) बल्कि तूने तो हमारे पिता जी की शक्ल का स्वाँग बनाकर हमे ठगने का षड्यन्त्र रच रखा है।
      इन सब की बाते सुनकर महात्मा जी अन्दर से उठ कर आये और कृत्रिम क्रोध व प्रभुता मिश्रित शब्दो मे असली सेठ से कहने लगे – यह तो मेरा घर है। यह लड़के व दुकान भी तो मेरी ही है। तुम्हारी कैसी ? बता तो सही, कि तू कौन है और यहां किस प्रयोजन से आया है?
      प्रत्युत्तर मे असली सेठ ने कहा – आपका घर व ये लड़के आपके कैसे ? यह घर व लड़के मेरी ही सन्तान है। आखिर जब असली सेठ की उन सब के समक्ष दाल न गली तो वह निराश होकर न्यायालय मे जा पहुँचा और रिर्पोट लिखवाई। उनकी अपील को सुन न्यायधीश ने उन के घर से दूसरे सेठ को (महात्मा जी) को भी बुलवाया। वह भी न्यायालय मे आ पहुँचा। इसके आने पर न्यायधीश के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। कभी एक के मुँह को देखता तो कभी दूसरे को। दोनों की शक्ल व रंग-रूप एक सा। बेचारा न्यायधीश क्या निर्णय दे और किसे असली सेठ ठहराये। आखिर उसने बनावटी सेठ से पूछा – क्या वह घर और पुत्र आदि तुम्हारे है या कि इसके, सच सच बताओ ? क्योकि असली सेठ ने तो पहले ही सब रिपोर्ट लिखवा दी थी और वह परेशान व दुःखी भी तो जान पड़ता था।
      न्यायधीश के पूछने पर बनावटी सेठ ने कहा – अच्छा यदि यह कहता है कि इस घर का मालिक मै हूँ तो यह बता देवे कि बड़े लड़के और छोटे लडके के विवाह पर कितनी-कितनी धनराशि व्यय हुई ?
      यह सुन असली सेठ सकबका गया क्योकि उसे पुत्रो के विवाह पर व्यय की गई धनराशि मौखिक रुप से स्मरण न थी। अतः वह कहने लगा – मुझे याद नही, बहीखाते मे सब कुछ लिखा हुआ है। 
      इधर महात्मा जी (बनावटी सेठ) तो त्रिकालदर्शी थे। भला, उनसे कौन सी बात छिपी थी। जब न्यायधीश ने उनसे पूछा तो उन्होने तत्काल ही बता दिया कि बड़े लड़के के विवाह पर इतनी धनराशि व छोटे लड़के के विवाह पर इतनी धनराशि व्यय की। तत्पश्चात ही बही-खाते मगवाएँ गए तो महात्मा जी द्वारा बताई गई धनराशि की संख्या पूर्णतया सत्य-सत्य चरितार्थ हुई। यह देख वहाँ उपस्थित जनो को पूर्ण विश्वास हो गया कि यह व्यक्ति सचमुच ही असली सेठ (महात्मा जी) को छलने के लिए सेठ जी का स्वाँग बनाकर आया है। इसके अतिरिक्त महात्मा जी ने और भी कई प्रश्न उन से किये लेकिन असली सेठ को दुकान के हिसाब-किताब जबानी कण्ठ न थे। उसकी वाणी पर तो एक ही उत्तर था कि सब कुछ बही खाते मे लिखा हुआ है परन्तु इधर महात्मा जी तो बड़ी सतर्कता से प्रत्येक प्रश्न का समुचित उत्तर तपाक से दे देते। फलतः असली सेठ की कुछ पेश न चली, उसे तिरस्कृत कर वहाँ से निकाला गया। वह वहाँ से चलकर नदी के किनारे पर आया और दुःखी व असहाय होकर ईश्वर से आर्त्त निवेदन करने लगा।
      चूंकि सेठ जी ने अपने पूर्व जीवन मे ऐसे कष्ट कभी न देखे थे। इस कारण उस पर मानो इस समय दुःखो का पहाड़ ही टूट पड़ा हो। बेचारा पूरा दिन व रात भूखा ही पड़ा रहा और ठण्डी आहे भरता हुआ जमीन पर लोटता रहा। हर पल दिल मे यही विचारता कि ईश्वर ने मेरे साथ ऐसा अन्याय क्यो किया है – हे परमात्मा! तू दया कर!! वह कौन आदमी है जिसने मेरा ही प्रतिरूप बनाकर मेरे बेटो को बहका दिया है और यहाँ तक की मेरा घर भी मुझ से छीन लिया है। मुझे अब अपने द्वारा बनाये गए घर के रहने तक का भी अधिकार न रहा। अब तो ऐ परमात्मा! मुझे एक छोटी सी कोठी मिल जाए तो मै उसमे केवल आपकी भजन-बन्दगी के अन्य कोई काम न करूँगा। इस प्रकार रोते-बिलखते व ठण्डी आहें भरते तथा भगवान से प्रार्थना करते हुए आठ पहर बीत गए।
      दूसरे दिन प्रातः महात्मा जी अपने असली रूप (सन्त वेष) मे नदी तट पर गए। वहां पर पहुँच कर क्या देखा की सेठ जी नदी के किनारे बैठ मालिक के चरणों मे प्रार्थना कर रहे है और सच्ची दरगाह मे बारम्बार क्षमा याचना कर रहे है। यह देख महात्मा जी को सेठ पर दया हो आई क्योकि उन्होने मात्र सेठ जी के कल्याण करने हेतु ही इतना प्रपंच रचा था कि किसी उपाय से उनका मन भक्ति पथ की और प्रवृत्त हो जाए । निकट जा कर सेठ जी से कहने लगे – ‘सेठ जी! राम राम, कहो क्या हाल है ?’
      सेठ जी क्योकि इस समय वेराग्य की अवस्था मे थे, महात्मा जी के उक्त वचन सुनते ही उनके चरणों मे गिर पड़े और जो घटना एक दिन पूर्व सेठ जी के जीवन मे प्रत्यक्ष रूप से घटित हुई थी अक्षरशः रो-रो कर महात्मा जी को सुना दी। महात्मा जी ने कहा – सेठ जी! उस दिन तो आपको राम-राम कहने तक का भी अवकाश न था और अब आप कहते है कि मुझे इस समय अपनी दुकान पर बैठने तक का भी अधिकारी नही रहा। आपकी यह विचक्षण पहेली समझ नही आ रही है।
      तब सेठ जी ने निःश्वास छोड़ते हुए कहा – ‘हाँ महाराज! वस्तुतः ही कुछ ऐसी स्थिति बन गई है। जिस कारण अब मुझे सिवाय ईश्वर के कुछ अच्छा नही लगता। इस समय मेरी अन्तिम इच्छा यह है कि एकान्त मे एक कोठी मिल जाए तो उसमे आसन लगा कर दिन-रात मालिक का भजन-सुमरण किया करूँ तथा जो धन मैने कई पापों व दूसरो के साथ अन्याय कर अर्जित किया है वह सन्त-महापुरूषो की सेवा व सन्तो के लंगर में लगा कर एवं परमार्थ मे खर्च कर भक्ति का लाभ उठाऊँ। अब तो महात्मा जी आप कृपा करे। जिससे मुझे घर मे थोड़ी सी जगह मिल जाये और पेट भरने के लिए दो रोटी।’
      महात्मा जी ने मुसकराते हुए कहा  – दो-तीन दिन पूर्व तो आपको मौत तक भी याद न थी और तुम कहते थे कि हमें अभी अवकाश नही, जब मौत आयेगी तब देखा जायेगा। आप हमारा किमती समय खराब करने का कष्ट न करे। लेकिन अब तुम बिल्कुल विपरीत बातें कर रहे हो कि मुझे संसार की किसी वस्तु की इच्छा नही केवल भजन-भक्ति ही करनी है। यह तो ठीक है कि घर वालों के रूष्ट हो जाने से तुम्हे वैराग्य हो गया है परन्तु जब तुम दुकान पर जाओगे – घर के सामानो और परिजनों की और ध्यान देगे तब तुम इस समय जो त्याग की बातें कर रहे हो फिर उस समय तुम्हारी यह त्यागमयी बातें पंख फैला कर न मालूम कहां उड़ान भर जायेगी।

      सेठ जी ने हाथ बाँधकर गिड़गिड़ाते हुए कहा – महाराज! आप मुझे क्षमा करो तथा मुझ पर कृपा करे, आप विश्वास करे अब दुनियावी सामान मेरे मन पर अपना मोहक प्रभाव नही डाल सकते। मै अब अपने किये हुए प्रण को कदापि विस्मृत नही करूँगा। इतना कहते हुए सेठ जी के नेत्र अश्रु प्रवाहित करने लगे और महात्मा जी के चरणों मे गिर कर कहने लगा – महाराज! मुझ से बड़ी भारी भूल हुई जो कि मैने आपके वचनों की अवज्ञा की। ईश्वर ने उसी का ही मुझे दण्ड दिया है।

      महात्मा जी ने सेठ जी को आश्वासन देते हुए कहा – अच्छा, अब तुम घर जाओ। तुम्हारे बेटे अब तुम्हे कुछ न कहेगे और न ही तुम्हे घर से निकालेगे परन्तु ध्यान रखन! हमारे साथ किये हुए वायदे को माया की रंगरलियो मे पड़ कर कभी न भुलाना।
      महात्मा जी के इस प्रकार उपदेश देने से सेठ जी के मन से अज्ञानता का आवरण उठ गया। और उन्होने दोबारा महात्मा जी के चरणों मे प्रणाम किया – उन से भक्ति का मार्ग पूछा। तब सेठ जी की वैराग्य वृत्ति को देख कर महात्मा जी के साथ किये जाने वाले प्रण के अनुसार भजन करना व एकान्त मे रहना शुरु कर दिया। घर मे आये हुए सन्त महात्माओ की सेवा करने लगा। इस प्रकार महात्मा जी की अनुकम्पा से सेठ जी का जीवन सुधर गया।
      तात्पर्य –
।। चौपाई ।।
नहिं दरिद्र सम दुःख जग माहि ।
                      सन्त मिलन सम सुख कछु नाहि ।।
पर  उपकार  वचन मन  काया ।
                            सन्त सहज स्वभाव खगराया ।।

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