परमात्मा सत्य है

।। दोहा ।।
सहजो भज हरिनाम कूँ, तजो जगत सूं नेह ।
अपना तो कोई है नही, अपनी सगी न देह ।।
    सन्त सहजोबाई जी मनुष्य को संसार मे आने के उद्देश्य की और प्रेरित करती हुई कथन करती है ‘ऐ जीव! यहाँ पर आकर सांसारिक मोह-ममता जो कि चौरासी लाख योनियों की दात्री है संसार मे रहते हुए उनसे निर्लिप्त रहकर अपने सच्चे इष्टदेव मालिक के चरणों से अपने हदय की प्रेम-तारें जोड़नी चाहिए। कारण, और तो और यह शरीर भी यही तक ही साथ देता है। आगे चलने के लिए यह भी अस्वीकृति (इन्कार) दे देता है। किये हुए कर्मो का फल तो जीव को भोगना ही पङता है।’ इसी प्रकार का ज्ञान भरा उपदेश निम्नलिखित दृष्टान्त मे एक प्रभु भक्ति-निष्ठ सेठानी अपने पति सेठ के प्रति करती है जो कि इस प्रकार से है –
      कोई एक सेठ बड़ा धनाढ्य था, जिसके पास धन-सम्पत्ति, ऐश्वर्य के समस्त पदार्थ, हाथी-घोड़े, नौकर-चाकर आदि सभी प्रचुर मात्रा मे थे। सेठ की धर्मपत्नी अत्यन्त भक्तिनिष्ठ एवं सन्त-सत्पुरूषो का संग करने वाली थी। इस दम्पत्ति के ग्रह मे कोई सन्तान न थी। सेठानी निष्काम भाव से हर समय भगवान की पूजा-आराधना एवं सत्संग के शुभ कार्यो मे व्यस्त रहती थी। इधर सेठ जी अपनी पत्नी के शुभ आचरण से नितान्त विपरीत कभी राम का नाम भूल कर भी अपनी रसना पर न लाते थे। सत्संग आदि के नाम से तो पहले ही उन्हे चिढ़ थी। पत्नी सरल स्वभाव की होने के कारण नित्य ही अपने पति को भजन-पूजन करने के लिए प्रेरणा देती कि – स्वामिन्! आप भी प्रातः समय पर उठ कर उस सच्चे मालिक की आराधना कुछ देर कर लिया करो। उनकी कृपा से ही हमे समस्त सुख-ऐश्वर्य के सामान व साधन उपलब्ध है। परन्तु पत्नी के लाख समझाने पर भी उसके कान पर जूँ तक न रेंगती थी।
      पत्नी के बार-बार समझाने पर भी सेठ जी एक उत्तर देते थे कि अभी तो जीवन मे बहुत समय पड़ा है। मै कौन सा बूढ़ा हुआ जा रहा हूँ। जब बुढ़ापा आयेगा तो देखा जायेगा। तुझको यह क्या भजनाभ्यास व आराधना की धुन लगी है जो सदैव लटठ् उठाये मेरे पीछे पड़ी रहती हो। सेठानी बेचारी पति से टका सा जवाब पाकर मूक हो जाती। वह सदैव इस बात के लिए चिन्तातुर रहती और प्रार्थना करती कि – ऐ परमात्मा! आप कब इन पर कृपादृष्टि करेंगे। कब इनकी क्रूर प्रकृति सरल रूप मे परिवर्तित होगी जिससे ये भी कुछ प्रभु-सुमिरण मे प्रवृत्त हाेवे। इस प्रकार वह अहर्निश अपने पति के कल्याण के लिए भगवान् से याचना करती रहती।
      एक बार अकस्मात् सेठ जी अत्यधिक रोग-ग्रस्त हो गए। डॉक्टर को चिकित्सा के लिए बुलाया गया। डॉक्टर रोग की जाँच करके उचित दवा देकर चला गया। दवाई लेकर सेठानी ने एक अलमारी मे रख दी। कुछ समय बीतने पर सेठ जी ने अपनी पत्नी को आवाज दी कि मुझे दवा पिलाओ – दवाई का समय हो गया है। सेठानी थी बड़ी भक्ति भाव वाली एवं समझ दार। उसने सोचा अब यही सही समय है – सेठ जी को समझाने का। कुछ क्षण पश्चात सेठ जी ने पुन: दवाई माँगने पर बोली – पतिदेव! पिलाती हूँ दवाई। कुछ समय बितने पर तीसरी बार सेठ जी ने फिर दवाई के लिए आवाज लगाई। तब प्रत्युत्तर मे स्त्री ने कहा – पिलाती हूँ महाराज! अभी तो बहुत समय पड़ा है।
      अन्त में सेठ खीजते हुए कड़क कर बोला – कब पिलाओगी, जब मै मर जाऊँगा ? तब सेठानी ने हँस कर उत्तर दिया – पतिदेव! अभी तो आपका यौवन है फिर आप पर मृत्यु कैसे आक्रमण कर सकती है ? क्या आपको भी मृत्यु की स्मृति हो आई है ? जब मै कभी भजन के लिए कहती थी तो आपके ये शब्द होते थे कि अभी तो समय बहुत पड़ा है, कौन सा मै मरा जाता हूँ, बाद मे भजन-पूजन कर लूँगा, इसका क्या कारण है ?
      सेठानी की बाते सुनकर सेठ जी चुप हो रहे। तब सेठ जी पर अपना प्रभाव पड़ता देख सेठानी ने अपनी बातों को जारी रखते हुए कहा कि पतिदेव शास्त्र तो हमे कितना अच्छा उपदेश देते है परन्तु हमारे दिल पर माया का पर्दा पड़ा होने के कारण हम इन पर ध्यान नही देते।
      अपनी पत्नी से इस प्रकार ज्ञान भरी बातें सुनकर सेठ जी के मन को अत्यधिक ठेस पहुँची। वे चौंक पड़े कि हाँ! मृत्यु भी कोई चीज है तथा उसका आना जीव मात्र के लिए अनिवार्य है। दूसरा यह निश्चित भी नही की कब आकर मनुष्य का गला दबोच ले। पत्नी के ज्ञान भरे वाक्यों ने सेठ जी की अज्ञान से बंद आँखे खोल दी। अब उनके हदय मे अत्यन्त वैराग्य हो गया। स्वस्थ होने पर वह भी अपनी पत्नी की भाँति सन्तो की संगति मे जाने लगा। उनसे नाम की दीक्षा लेकर व उनके पवित्र वचनों को श्रवण कर आनन्दित हुए। अब सेठ जी नित्य प्रति भजनाभ्यास व सत्संग मे रूचि बढ़ाने लगे। सेठ जी को इस प्रकार देखकर सेठानी के हर्ष की सीमा न रही। अब तो उनकी लगन ने और भी तीव्र रूप धारण कर लिया। दोनों प्रेम की प्रतिमा बनकर आनन्दपूर्वक जीवन यापन करने लगे।

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