पथ प्रदर्थक की आवश्यकता

      परम संत श्री कबीर साहिब जी का कथन है कि किसी वस्तु की खोज करनी हो तो उस वस्तु के ज्ञाता (जानने वाले) को साथ लेना पड़ता है। अपने मन के विचारानुसार चलने वाला व्यक्ति कुमार्ग मे पड़ जाता है तथा जो मार्ग सुगम होता है भटक जाने से वही पथ दुर्गम हो जाता है। तभी तो कहा है कि पथ-प्रदर्शक को साथ लेकर यात्रा करनी चाहिए। यह निम्न दृष्टान्त मे चित्रित किया गया है कि किस प्रकार एक व्यक्ति भटक कर दुःखो के जाल मे फँस जाता है तथा अन्त मे पूर्ण सतगुरू ही कृपा करके उसे महान दुःखो से मुक्त कराते है। अगर पहले से ही आत्म-दृष्टि रखने वाले पूर्ण सन्त-सतगुरू से मार्ग पूछ कर कदम उठाया जाता तो फिर इस प्रकार के कष्ट न झेलने पड़ते। पूर्ण विवरण इस प्रकार है –
।। दोहा ।।
भेदी लीन्हा साथ करि, वस्तु देई लखाय ।
कोटि जन्म का पंथ था, पल मे पहुँचा जाए ।।
      एक बार कोई एक व्यक्ति शहर से निकलकर वन की और चला गया। उसने सुन रखा था कि एकान्त के जीवन मे मनुष्य को प्रसन्नता प्राप्त होती है परन्तु इसके गूढ़ रहस्य से वह मनुष्य अपरिचित था। उसने यह सुन रखा था कि ऋषि-मुनिजन जंगल मे ही आनन्द विभोर रहा करते थे। उन्हें दुनिया की किसी प्रकार की भी चिन्ता नही सताती। खाने-पीने की और से वे निश्चिन्त हुआ करते है क्योकि फल-फूल अथवा कन्द-मूल जंगलो मे सुगमता से प्राप्त हो जाते है।. वृक्ष के पत्तो व उनकी छाल से कपड़ो का काम लिया जा सकता है। पीने के लिए गिरी कन्दराओं से बहते हुए झरनों का मिठा-स्वादिष्ट सहज मे सुलभ होता है। किसी भी वृक्ष के नीचे घास का झोपड़ा बना लिया और उसमे रहकर एकान्तवास का आनन्द लिया परन्तु एकान्त मे रहकर किस कार्य की पूर्ति करनी है ? वह कौन सा काम है। जिसके लिए नगर या ग्राम छोड़कर वनों मे निवास किया जाता है ? इस तथ्य से वह व्यक्ति परिचित न था।
      केवल एकान्त के सुखो का ही आँखो के समक्ष चित्र खींच कर व उनसे प्रभावित होकर वह दूर जंगल की ओर चल पड़ा। कोसों की यात्रा की, निर्जन प्रान्त मे बहुत दूर निकल चुका था। दुर्भाग्य से उसका गुजर किसी मरूस्थल मे से हुआ जहाँ कई कोसो तक वृक्ष देखने को मिलता था। वह बेचारा भूख-प्यास से व्याकुल हो गया-बुहत घबराया। पाँव तले गर्म रेत, सिर पर तपता सूर्य, कदम-कदम पर धूप की तेजी मे उसे मृगतृष्णा का दृश्य दिखाई देने लगा। वास्तव मे वहाँ पानी न था। इस भ्रम व भूल से जल की तीव्र इच्छा से वह आगे को ही कदम बढ़ाता गया। सिवाय निराशा व कष्टो से उसे कुछ हस्तगत न हुआ।
      चलते-चलते वह एक स्थान पर पहुँचा जहाँ की भूमि पर घास-फूस की हरियाली दृष्टिगत हुई। उस घास मे गोखरू के कांटे भरे हुए थे। इन काटों से उसके पाँव छलनी हो गए। ज्यों-त्यों करके वह आगे बढ़ा तो उसे बिच्छू, सांप व कनखजूरे देखने मे आये। उनसे जान बचाकर आगे को बढ़ गया परन्तु जिस प्रकार की प्रचलित कहावत है ‘आगे कुआँ पीछे खाई’ अर्थात् आगे बनैले जन्तु-शेर, चीते, रीछ आदि दिखाई देने लगे। वह तो अत्यन्त भयभीत हो गया। बेचारा करे तो क्या करे, जाँए तो कहाँ जाए ? जैसे-तैसे प्रभु स्मरण करता हुआ अभी कुछ ही दूर गया था कि एक स्त्री पर उसकी दृष्टि पड़ी। उसने सोचा – यह मनुष्य जाति है, इसकी सहायता से भयानक वन से बाहर जाने की सहायता मिल सकेगी। उसने कुछ धैर्य धर उसकी और पाँव उठाया ही था कि देखते-देखते उसने तीन रूप बना लिये। यह क्या…….? बेचारा बड़ी असमंजस मे पड़ गया। वे तीनो आकृतियाँ कैसी थी? एक पूरी तरह से काली-कलूटी और डरावनी, दूसरी मध्य श्रेणी की कुरूपा साथ ही निर्लज्ज, तीसरी खूबसूरत दिल की कलुषित। वह इन तीनो से सहायता लेने के लिए जिसकी और भी जाता वही उसको हड़पने के लिए लपकती। बेचारा डरा और वहां से जान बचाकर भागा। पीछे से आवाज आई – तू हमसे भाग कर कहाँ जा सकता है? तू तो हमारा भोजन है। हम तीनों स्त्रियाँ तुझ जैसे भूले-भटके को मार कर दम ही दम मे चट कर जाती है। जैसे कहा भी है –
      पथिक ने समझा – यह डायन छलावा है और मायावी रूप बनाकर आदमियो को छलती रहती है। बेचारे को सिवाय भागने के और कुछ न सूझी। इसलिए उसने आगे पग बढाये। दूर हरे-भरे वृक्ष नजर आने लगे। सोचा सम्भव है मुझे यहाँ कुछ आराम मिले परन्तु वह हरियाला वन हिंसक पशुओ से भरा पड़ा था। शेर दहाड़ रहे थे, चीते गरज रहे थे, आह! हर तरफ परेशानी ही परेशानी – अकेली जान और उस पर हजारो बलाएँ। मगर इसको चैन कहाँ ‘जब तक श्वास है, तब तक आस है’ प्राण किसे प्रिय नही ? उस हिसंक वन से भाग निकला। कुछ और आगे चला कि उसकी दृष्टि सौभाग्यवश एक वट-वृक्ष पर जा पड़ी। उसने समझा कि यह स्थान सुरक्षित होगा जिस पर की बन्दर व पक्षीगण बैठे कोलाहल कर रहे थे। यह सोचता हुआ वह वट-वृक्ष के समीप पहुँचा की एक शक्तीशाली मदमस्त हाथी देखने मे आया, जिसके बारह दाँत निकले हुए थे। उसकी सूँड़ मे सात किंगरे थे एवं बारह दाँतो के अगले भाग दो प्रकार के सामयों से मढ़े हुए थे। यह सामया लोहे व चाँदी की थी और उसमे तीन सौ पैंसठ लकीरें पड़ी हुई थी। वह गजराज इस मनुष्य को देखकर चिंघाड़ने लगा। अब तो उसकी रही-सही जान भी निकल गई। मारे डर कर वह वृक्ष पर चढ़ गया तब हाथी भी उसे देखकर वृक्ष की तरफ बढ़ा। यह देख उसे नानी याद आने लगी। इस घोर विपदा मे वह भागे तो किधर ? सहायता के लिए बुलाये भी तो किसे ? हाथी से प्राणो की रक्षा करना सरल न था। उसकी दृष्टि बरगद की जटाओ पर गई जो नीचे एक शुष्क व बड़े से कुएँ मे लटक रही थी। उसने सोचा कि जटाओ को पकड़ कर नीचे कूप मे उतर जाने से इस जालिम हाथी से छूटकारा मिल सकता है। ऐसा सोच वह एक जटा के सहारे कुएँ मे नीचे को उतरा तो क्या देखता है कि कुएँ के अन्दर एक बड़ा भारी भयानक अजगर मुँह खोले बैठा है। उसे देखते ही यह नख-शिख तक काँप उठा। न ऊपर बचने की आशा और न नीचे मौत से छुटकाटा। वह बेचारा जब से घर से चला था हर कदम पर उसे दुःख व कष्टो का ही सामना करना पड़ा।
      विवश हो बरगद की जटा को पकड़े कुएँ के मध्य मे लटका रहा। मात्र यही उपाय उसे प्राण बचाये रखने का सूझा क्योकि बाहर मतवाला गज इसी प्रतीक्षा मे है कि कब वह बाहर निकले और मै उसे पाँव तले कुचल डालूँ। वट के वृक्ष पर शहद की मक्खियों ने एक मधू का छत्ता बना रखा था। उसमे से शहद की बूंदे रिस-रिस कर नीचे टपक रही थी। जहाँ वह खड़ा था ठीक उसके मुँह मे वह रस टपकने लगा और वह मधू-रस लेने लगा। मधू-रस मे मस्त हो उसे ऊपर का हाथी और नीचे का भयानक अजगर बिल्कुल ही भूल गया। 
      थोड़ी देर मे वृक्ष पर काले व सफेद रंग के दो चूहो पर उसकी दृष्टि पड़ी। यह चूहे उस जटा को कुतरने मे तत्पर थे जिस जटा को पकड़े हुए यह यात्री लटका हुआ था। अब तो उसे अपने प्राण निकलते नजर आने लगे। जब वे पूरी ही जटा कुतर डालेगे तो उसका नीचे गिरना सम्भव ही था। और फिर अजगर के मुँह से बचने का तो कोई उपाय ही न था। अन्त मे शहद के रस के विचार को दिल से दूर किया, उसकी सदबुद्धि जाग्रत हुई। इस विपत्ति की घड़ी मे ईश्वर से सहायतार्थ प्रार्थना करने लगा कि ‘ऐ प्रभु! आप सबके रक्षक है। आपने मुसिबत की घड़ी मे गजराज की मदद की, उसे ग्राह के पंजे से छुड़ाया, सभा मे चीर बढ़ा द्रोपदी की लाज रखी आदि-आदि। आप सर्वशक्तिमान है, इस कष्ट व विपदा से मेरी भी रक्षा किजिये।’ अन्तरात्मा से निकली हुई आर्त्त विनय सदैव सुनी जाती है।
      उसी समय एक अति सुन्दर हष्ट-पुष्ट एवं बलवान युवक हाथ मे गदा लिये हुए उस वृक्ष के निकट आया, जिसको देखकर हाथी जो कि यात्री पर प्रहार करने की प्रतीक्षा मे था भाग खड़ा हुआ। उस समय उस परोपकारी ने भय से सहमे हुए उस व्यक्ति को आवाज लगाई कि ‘तुम इस भयानक कुएँ से बाहर निकल आओ, किसी प्रकार का भय न करो, मै तुम्हे बचाने के लिए आया हुँ। मेरी बात पर विश्वास रखो! मै इस भयानक जंगल से तुम्हे बाहर कर दूँगा।’ इस प्रकार सान्त्त्वयुक्त आवाज सुन कर उस व्यक्ति की जान मे जान आई – ‘डूबते को तिनके का सहारा मिला।’ दोनो चूहे अब तक भी जटाओ को कुतरने मे व्यस्त थे। वह मनुष्य शीघ्रता से बाहर आया और आते ही रक्षक के पाँव पर गिर कर कहने लगा – आप मेरे रक्षक है। आपके बीना मेरी सहायता करने वाला दुनिया मे कोई नही है।
      यह सुन कर वह आदमी मुसकराया और उसका हाथ फकड़ कर उसे उस गहन विपदा से बाहर लाया और कहा – जाओ! अब तुम स्वतंत्र हो। फिर ऐसी भूल कदापि न करना। वैसे तो तुम्हे काफी अनुभव हो गया होगा।
      यात्री ने पूछा – भगवन! आप कौन है, जो मुसीबत के समय आपने मुझे सहारा दिया?
      वह आदमी बोला – इस प्रश्न के करने की तुम्हे क्या आवश्यकता है? यह क्या थोड़ा है कि तुम कष्ट-क्लेशो से मुक्त हुए और तुम्हे सुखमय नवजीवन प्राप्त हुआ है ?
      यात्री कृतकृत्य हो हाथ जोड़कर कहने लगा – मै आपका जीवनपर्यन्त कृतज्ञ बना रहूगा और आपका नाम सदैव मेरी जिवहा पर रहेगा।
      उस आदमी ने कहा – तेरा मेरा एक ही रूप है। तुम अपने हदय मे झांककर मुझे देखो। तुमने अपनी रक्षार्थ मुझे पुकारा और मैने साक्षात् आकर तुम्हे दुःखो से छुड़ा लिया यह मेरा स्वाभाविक धर्म है।

पूरे दृष्टान्त का चित्रण इस प्रकार है –
यात्री …………………….. जीव
जंगल ….. अपने विचारो से तप साधना करना
बिच्छू, साँप, कनखजूरे ….. काम, क्रोध, लोभ
शेर, चीते आदि ….. मोह, अंहकार आदि
प्यास …….. मनुष्य की इच्छाये 
बदसूरत स्त्रियाँ ……. स्थूल-सूक्ष्म-कारण माया
वट का वृक्ष ……. अहंकार द्वैतभाव
वट की जटाएँ ………. जीवन अथवा आयु
बन्दर व पक्षी …….. खुशी देने वाले विचार
बारह दाँतो वाला हाथी …… साल के बारह महीने 
सूँड के सात किंगरे ….. सप्ताह के सात दिन
तीन सौ पैसठ लकीरे ……… साल के दिन
सफेद व काले चूहे ……………….. दिन-रात
कुआँ …………………….. संसार
शहद का रस ………… इन्द्रियो के सुख व कामनाएँ
अजगर …………….. मृत्यु (महाकाल)
रक्षक ……………………. सदगरू
      इस दृष्टान्त का तात्पर्य यह है कि जीव को दुःखो से छुड़ाने वाले समय के सन्त सदगुरू ही है जो उनकी करूणा की पुकार सुनकर एवं दुःखो से घिरा हुआ देख अकारण कृपा करते है तथा संसार रूप भवसागर से निकालकर पार कर देते है। यद्यपि यह जीव भी सुख व आनन्द की प्राप्ति के लिए यहाँ आया था परन्तु संसार मे आकर माया जाल मे शारीरिक सुखो एवं कामनाओ के जाल के फंस गया है। जिस कारण वह दुःखी और परेशान है। इसलिए बीना पूर्ण सदगुरु का दामन पकड़े इस दुर्गम मार्ग से जाने मे इसको सफलता नही मिल सकती।
      अतएव जिस प्राणी को जब भी किसी नये पथ पर पग रखना हो तो पूर्व उस पथ के जानकार से सब कुछ ज्ञात कर लेना चाहिए। इसी प्रकार भक्ति-मार्ग पर भी चलने वाले जिज्ञासुओ को पूर्ण सन्त-सदगुरू को अपना पथ-प्रदर्शक बनाकर जीवन यापन करना चाहिये। जिससे की इस संसार मे सुख-शान्ति व आनन्द से जीवन व्यतीत हो और मृत्यु के उपरान्त भी रूह को चौरासी लाख योनियो के कष्ट न भोगने पड़े। मनुष्य इस विधि का अनुसरण करे जिससे उसका इस संसार मे आना सार्थक हो जाये।

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